शब्द बीज हैं!
बिखर जाते हैं,
जिस माटी में ,
उगा देते हैं कुछ न कुछ.
संवेदित, ऊष्मोर्जित
रस पगा बीज कुलबुलाता
फूट पड़ता ,
रचता नई सृष्टि के अंकन !
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शब्द बीज हैं!
बिखर जाते हैं,
जिस माटी में ,
उगा देते हैं कुछ न कुछ.
संवेदित, ऊष्मोर्जित
रस पगा बीज कुलबुलाता
फूट पड़ता ,
रचता नई सृष्टि के अंकन !
*
मानव रचना का वृहत् कार्य कर ,सृष्टि निरख हो कर प्रसन्न.
अति तुष्टमना सृष्टा लीलामयि सहचरि के साथ मग्न
देखा कि मनुज हो सहज तृप्त, हो महाप्रकृति के प्रति कृतज्ञ
आनन्द सहित सब जीवों से सहभाव बना रहता सयत्न .
वन, पर्वत, सरिता, गग,न पवन से साँमंजस्य बना संतत,
ऋतुओं से ,कालविभागों के अनुकूल सदा नियमित संयत
जड़-चेतनमय जग जीवन को करता चलता सादर स्वीकृत,
तब विधना धरती के मानव से बोल उठा यों स्नेह सहित -
मानव तुम मुक्त विहार करो यह सब अधीन हैं संरक्षित
इन सब के साथ चले जीवन, सबका हित ही हो अपना हित.
ये गिरि मालाएँ वन शाद्वल,ये हरित द्रोणियाँ ,उच्च शिखर
तुम इन सबके संरक्षक हो, जगजीवन हो सुखमय सुन्दर.
वसुधा कुटुम्ब है, जड़-चेतन.संसार यही है सर्वभूत,
तू जी, औरों को जीने दे ,सुविधाएँ सबके हित प्रभूत.
नत-शीश मनुज बोला, उपकृत हूँ पा इतनी सार्थ्य देव!
हम महाप्रकृति की संतानें लघुतम या दीर्घाकार जीव.
हो गयी धरा वरदानमयी ,फिर चलने लगा सृष्टि का क्रम,
सीखता रहा धीरे-धीरे सुखमय जीवन का कर उपक्रम.
सदियाँ बीतीं, होता जाता था वह प्रबुद्ध औ' कर्म-कुशल,
लेकिन अति सुख-सुविधाओँ का लोभी बनकर हो गया विकल.
तब शेष जगत के लिए मनुज होता ही गया सँवेदहीन,
अधिकाधिक अधिकारों के हित औरों का हिस्सा रहा छीन.
अति हुई और हिल उठी धरा ,आकाश थरथरा गया सहम,
सागर उफनाए रुद्ध दिशाएँ आर्तनाद से भरा पवन.
भऱ अहंकार में लगा रहा कैसे अनिष्ट के महादाँव.
हो चकित विधाता देख रहा क्या बदल गया मानव-स्वभाव!
हो रम्य प्रकृति से दूर ,सृष्टि का अनुशासन कर रहा भंग,
स्वच्छंद और अतिचारी होता जाता है दिन-दिन प्रचंड.
चर-अचर सभी पर मनमाना अपना अधिकार अबाध मान
व्यवहार-क्रूरता औ' अनीति से कर देता कम्पायमान.
भूधर की रीढ़ें तोड़-फोड़ ,जल के स्रोतों में ज़हर घोल,
आकाश दिशाएँ धुआँ-धुआँ,भूगर्भों तक गहरे खखोल.
बेचारे पशुपक्षी निरीह, वञ्चित अशरण हो गए दीन,
आतंक मनुज का छाया प्रकृति मलीन,विवश अति शान्तिहीन.
अब तो इतना चढ़ गया, आदमी हुआ आदमी का बैरी ,
अपने विनाश का कारक ही बन बैठा चालें चल गहरी.
भृकुटी टेढ़ी कर विधना ने तब लिखी मनुज के लिए मियति ,
अब तक तू ही तू रहा ,किन्तु अब कर पापों का प्रायश्चित्.
बेबस निरीह, तन-मन से रोगी,परम विकल ज्यों शापग्रस्त.
तू नेपथ्यों में रह जा कर यह विश्व हो सके पुनः स्वस्थ.
रे घोर पातकी, तेरे पापों ने जो दूषण फैलाया है
उसके निस्तारण हेतु प्रकृति का निर्णय सम्मुख आया है.
अपने जीवन का समाधान अब तो तुझ पर ही है निर्भर
संयत-संयम धर सुधर या कि फिर घिसट एड़ियाँ रगड़-रगड़!
सब-कुछ पाकर भी चूक गया ,सब किया धरा हो गया वृथा.
मानव की यह विकास-गाथा या कहें पतन की विषम-कथा?
इस कालचक्र के घूर्णन में ,नव उदय, विकास, समापन दे
अविराम कथाएं रचती रहती नियति नटी अपने क्रम से!
- प्रतिभा सक्सेना.
*
नयन अनायास भर आते हैं कभी,
यों ही बैठे बैठे!
नहीं ,
कोई दुख नहीं ,
कोई हताशा नहीं ,
शिकायत भी किसी से नहीं कोई.
क्रोध ? उसका सवाल ही नहीं उठता .
जाने क्यों बूँदे झर पड़ती है ,
बस ,यों ही चुपचाप बैठे .
कारण कुछ नहीं !
मन ही तो है!!
यों ही उमड़ पड़े कभी,
कभी बादल कभी धूप
कहाँ तक रहे बस में !
जाने दो !
मन को मन ही रहने दो ,
जीवन यों ही चलता है
*
पधारो श्री गणपति मोरे अँगना ,
पग धारो माँ गौरा, हमारे अँगना .
तुम्हरी कृपा सों मंगल कारज,चन्दन चौकी विराजो अंगना !
लाई गंगाजल सोने के कलसा ,चुन-चुन बेला चमिलिया के फुलवा ,
होवे कुलचार हमारे अँगना !
मंगल मिलि सौभागिनि गावें, सखि मिलि मोतिन चौक पुरावें .
बाजे ढोलक-मँजीरा, हमारे अँगना .
गणपति रिधि-सिधि संग लै अइयो ,लाभ-सुभहिं हँकार बुलइयो !
विहरैं दोऊ आवैें हमार भवना .
बाधा-विघन दूरि करि डारौ, गणपति सब विधि काज सँवारो.
सब विधि हम भए , तुम्हारी सरना !
सब सुख पावैं आरुषि-केतन सफल सारथक होवै जीवन
करो पूरन कामना, माँ पुरणा !
गौरा-गणेश कृपालु भए रे, रिधि-सिधि सब ही काज निबेरे .
सजे मंगल साज , हमारे अँगना !
*
एक दिन
एक दिन अति शान्त मन ,*
एक बरस बीत गया,
जीवन-घट जल अधिकांश बीत, रीत गया
पहुँचे सभी को प्रणाम और जुहार विनत ,
बोले-अनवोले मीत,पांथ-पथिक संग-नित, ,
देखे-अनदेखे संग चलते मुखर-मौन भले
उन सब को मेरा हृदय से प्रेम-भाव मिले,
कह न सकूँ जो भी पर मन तो भरा आता है
सबसे जुड़ा रास्ते का अनकहा-सा नाता है .
उसके ही बल पर कभी मै बोलती रही
अपने को, कभी और को भी तोलती रही
*
कोई जो कहता कान खोल सुन लेती हूँ
बहुतेरी बार कुछ कहे बिन गुन लेती हूँ
हम सब सुदूर कहीं यों ही बह जायेंगे /
पतझर के पत्तों से, कभी न साथ आएँगे!
कहा-सुना भला बुरा यहीं छूट जाएगा
समय के साथ मीत, सभी बीत जाएगा!
हाथ जोड़ मेरी इस विनती का मान धरें
मुझसे दुख पहुँचा हो,, कृपया, क्षमादान करें !
*
ओ नारी ,
अब जाग जा,
उठ खड़ी हो !
कब तक भरमाई रहेगी?
मिथ्यादर्शों का लबादा ओढ़,
कब तक दुबकी रहेगी,
परंपरा की खाई में ?
*
चेत जा,
उठ खड़ी हो!
मार्ग मत दे ,
निरा दंभी , मनुजता का कलंक
कुछ नहीं बिगाड़ सकेगा तेरा
अहंकारी हो कितना भी .
अपने आप में क्या है?
जान ,समझ!
पहचान अपने को ,
सृजन सार्थक कर !
*
किसका भय ?
तू दुर्बल नहीं ,
तू विवश नहीं ,
तू नगण्य नहीं
धरा की सृष्टा,
निज को पहचान!
*
अतिचारों का कैंसर,
पनप रहा दिन-दिन,
विकृत सड़न फैलाता कर्क रोग.
निष्क्रिय करना होगा
तुझे ही वार करना होगा ,
निरामय सृजन के
दायित्व का वास्ता !
*
लोरी में भर जीवन-मंत्र ,
पीढ़ियाँ पोसता आँचल का अमृत-तंत्र ,
तू समर्थ हो कर रह ,
अपनी कोख लजा मत !
*
शीष उठा कर रह
सहज, अकुंठित स्वरूप में .
अन्यथा
विषगाँठ का पसरता दूषण,
और धरती का छीजता तन ,
मृत पिंड सा
टूटता -बिखरता अंतरिक्ष में
विलीन हो जाएगा !
*
*
शत-शत वन्दन प्रभु हे,चित्रगुप्त त्राता,
विधि के मानस-पुत्र, कर्मगति निर्णायक,
अवधपुरी में प्रकट धर्महरि विख्याता!
कर्म-विपाक सृष्टि का निर्भर प्रभु, तुम पर
काल-पृष्ठ पर अंकित करते हस्ताक्षर ,,
रूप-स्वरूप,विजय,यश मति का सम्वर्तन,
सुर-नर मुनि कर रहे तुम्हारा अभिनन्दन !
शुभ संस्कार प्रदान करो,हर लो जड़ता!.
राम पधारे स्वयम् धर्महरि के मन्दिर ,
क्षमा-माँगने गुरु वशिष्ठ के सँग सादर ,
देव, कृतार्थ करो हम पर हो दृष्टि कृपा,
न्याय-व्यवस्था धरो, क्षमा दो हे मतिधर!
नमन तुम्हें शत कोटि नमन हे ,प्रभु त्राता!
द्युतिमय श्यामल देह दिव्यता से दीपित
तत्पर द्वादश पुत्र मातृद्वय पोषित नित
कुल-भूषण हों देव तुम्हारी संततियाँ ,
तिलक मनुजता के बन पावें शुभ गतियाँ
मसिधर-असिधर प्रभुवर तुम कर्ता-धर्ता
प्रभु,आशीष तुम्हारा हम पर सतत रहे ,.
विद्या विनय नीतिमय जीवन राह रहे
कभी न हो दूषित कुतर्क रचना मन में ,
सहज-सरल श्रद्धामय मति हो जन-मन में.
सन्मति ,शुभगति दो प्रभु, तुम ही सम्वर्ता!
*
बस,अपने साथ .
इसी आपा-धापी में कितना जीवन बीत गया -
अरे, अभी यह करना है ,
वह करना तो बाकी रह गया ,
अरे ,तुमने ये नहीं किया?
तुम्हारा ही काम है ,
कैसे करोगी ,तुम जानो!
दायित्व थे .
निभाती चली गई,
समय नहीं था कि विश्राम कर लूँ.
गति खींचती रही .
थकी अनसोई रातें कहती रहीं थोड़ा रुको,
कि मन का सम बना रहे .
बार-बार उठती रही ,
सँभलती, अपने आप को चलाती रही.
ध्यान ही नहीं आया -
मुझे भी कुछ चाहिये.
अब रहना चाहती हूँ अपने में ,
कोई आपा-धापी न हो,.
कोई उद्विग्नता मन को न घेरे.
बाहरी संसार एहसानो का बोझ लादता
फिऱ मुझे घेर कर
हावी न होने लगे मुझ पर !
फिर शिकायतों का क्रम न चल पड़े.
पाँव मन-मन भर के, बहुत असहज कर दे मुझे,
अनचाहे व्यवधान नहीं चाहियें अब,
धूप भरी बेला बीत जाने के बाद,
शान्त-शीतल प्रहर,
आत्म-साक्षात्कार के क्षण,
मेरे अपने हैं,
बिना किसी दखल के.
निराकुल मन.
अब -
बस अपने साथ रहना चाहती हूँ !
*
*
*
चलो, कहीं निकल चलें !
बँध कर रहें न इन कमरों-के घेरों में ,
दरवाज़े खोलें , चलें खुले आसमान तले!
शाला के बाहर जीवन की कार्यशाला है ,
खुली सभी कक्षाएँ नहीं कहीं ताला है ,
नये पाठ सीखने का मित्र, यही मौका है
नयी दिशा देखने से किसने हमें रोका है
काहे अकेले रहें सभी से हिलें-मिलें!
देखो तो फैली कितनी विशाल धऱती है
हर मौसम में एक नया रूप धऱती है
नई फसल फूल-फल उगाती सँवारती है ,
जीवन के पोषण का हर प्रयास करती है
मिले घनी छाँह , सुने कलरव का गान चलें!
लहराती डालें मनभावन हवाएँ हैं,
झाड़ियों के झुर्मुट है,ललित लताएँ हैं.
फूल वहाँ हँस-हँस बजा रहे हैं तालियाँ
कब से बुला रहे हमें हिला-हिला डालियाँ.
भूतल के वैभव को समझें समीप चलें!
पेड़ फलोंवाले झरबेरियाँ करौंदे भी
आम के टिकोरे और जामुनी फलैंदे भी
तुमने अमरूद कभी,तोड़-तोड़ खाये क्या
इमली शहतूत कैथ तुम्हें नहीं भाये क्या .
देसी फल खरा स्वाद नहले पर दहले
गुलमोहर,अमलतास इनके क्या कहने हैं,
ऐसे सजीले पेड़ पृथ्वी के गहने हैं
खग-मृग सरोवर बड़े ही खूबसूरत हैं
झरने वन पर्वत तो जैसे नियामत हैं
जंगल में मंगल मनायें लग जाय गले
बाहर खुले में कहीं छाँह कहीं धूप है
तोते की टियू-टियू कोयल की कूक है
प्यारी गिलहरी मजे से बैठ जाती है ,
दोनों हाथो में थाम कुतर-कुतर खाती है
शाखों में झूमे परिन्दों के घोंसले !
गोदी में पलते हैं चंचल खरगोश ,हिरन
कैसे विचरते हैं होकर निश्चिंत मगन
देखो गौरैया है, मैना है कबूतर हैं ,
नाचते हैं मोर कहीं नटखट से बन्दर है
जीवित खिलौने हैं वनों में पले खिले
तरल जल तरंगों में आनन्द संगीत चले
धरती उगाती जो ,इनका भी हिस्सा है,
भूख-प्यास सबमें, हम सब का वही किस्सा है
इस तल के जीवन के प्राणी हम सारे हैं
सुख-दुख में ये सब भी संगी हमारे हैं
बाँट कर खायें और सबसे हिलें-मिलें
आस-पास के भी,चलो हल-चाल ज्ञात करें
अपने पड़ोसी से सुख-दुख की बात करें
यहाँ व्यवहार और दुनिया की बातें हैं ,
दिन है परिश्रम का, चाँद सजी रातें हैं
सबसे पहचान बने, स्नेह सहित नाम लें
हर इक दिशा का निराला एक रूप है
धरती की उर्वरा प्रयोजना क्या ख़ूब है
नई फसल फूल-फल उगाती सँवारती है ,
जीवन के पोषण के साधन सँचारती है
सँवलाए आँचल में आस-विश्वास मिले .
सबको पालती है ,मोह-छोह और ममता से
कितनी सहनशील और स्नेहमयी वसुधा है
इस माँ ने माटी से रचा और पाला है
ऋतुओं के शीत-ताप सहकर सँभाला है
हम भी कृतज्ञ रहें ,माने जो सीख मिले
जीवन को कितने जतन से सँवार रही
हर पल हमारे हित साधन विचार रही
अन्न- फल-फूल भरे आँचल में धार हमे
तोष-पोष देती है पल-पल सँवार हमें.
इस उदार धऱणी के और और पास चलें.
उर्वरा ,सुरम्य, स्वस्थ ,सुस्थिर, अचिन्त्य रहे
अपनी वसुन्धरा नित शोभन ,प्रसन्न रहे
शान्ति सद्भाव बढ़े एैसा व्यवहार करें
अपनी धरा को चले नत-शिर प्रणाम करें,
घनी नेह-छाँह मिले मन को विश्राम मिले !
चलो वहीं निकल चलें!
*
८
*
कल्याणमयी माँ ,भारति हे ,शुभ श्रेय-प्राप्ति वर दो!
*
उज्ज्वल तन, धवल ज्ञान-दीपित,दिव्यता-बोधमय दृष्टि प्रखर;
हे सकल कला-विद्या धारिणि, तुमसे ही दिशा-दिशा भास्वर.
हो ताप-क्लेश-दुख शमित, राग-रस से सिंचित कर दो!
शुभ श्रेय-प्राप्ति वर दो!
*
ज्योतित स्वरूप उजियारा भर, कर दे विलीन तम का कण-कण;
शतदल मकरन्द अमन्द धरे, धरती-नभ हो आनन्द मयम् .
वाणी,विशुद्ध संधानमयी, वे अमल-सरल स्वर दो !
शुभ श्रेय-प्राप्ति वर दो!
*
अवतरो देवि ,जग-जीवन में, कण-कण मुखरित हों गान रुचिर ;
अग-जग झंकृत हो पुण्य-राग, प्राणों में जागे ज्योति प्रखर .
जागें संस्कार सुभग,गति-मति निर्मला, कलुष-हर हो !
*
विश्व-मंगल हेतु उतरो धरा पर, नव वर्ष !
इस अधीरा मही को आश्वस्ति से भर दो,
चर-अचर को सुमति मंत्रित प्रीतिमय स्वर दो.
कूट-कलुष मिटे मनुजता को मिले उत्कर्ष .
उतरो धरा पर, नव वर्ष !
श्वेत पंखों से झरें सुख-शान्ति के मधु स्वन,
सुकृति -शील सु-भाव से मण्डित रहे जन-मन,
नवल संवत्सर पधारो, सहित सुस्नेह सहर्ष!
उतरो धरा पर, नव वर्ष !
दग्ध मानव-हृदय को दो ,आस्था के स्वर ,
विखण्डन सारे सहज परिपूर्णता से भर.
कर्ममय जीवन बने, संकल्प सुदृढ़-समर्थ!
उतरो धरा पर, नव वर्ष !
*
चँदन केर बिरवा मइया तोरे अँगना
।।ॐ श्री चित्रगुप्ताय नमः।।
कायस्थ -
श्री चित्रगुप्त का अंशज जो मसिजीवी,विधि का अनुगाता.
पुस्तिका सहचरी,वर्ण मित्र,लेखनि से जनम-जनम नाता,
जीवन अति सहज,निराडंबर अनडूबा लोभों-लाभों में ,
अनुशासन शिक्षा संस्कार स्वाधीन-चेत रह भावों में.
व्यवहार,आचरण, खान-पान ,काया संसारोचित स्वभाव,
पर अंतर का अवधूत, परखता अपने ग्राह्य-अग्राह्य सतत,
सब में रह कर भी सबसे ही कुछ विलग भिन्न-सा रह जाता,
इस चतुर्वर्ण में गण्य न जो, कायस्थ वही तो कहलाता !
- प्रतिभा
*
प्रिय धरित्री,*
शारदा,शंकर-सहोदरि ,सनातनि,स्वायम्भुवी,
सकल कला विलासिनी , मङ्गल सतत सञ्चारती.
ज्ञानदा,प्रज्ञा ,सरस्वति , सुमति, वीणा-धारिणी
नादयुत ,सौन्दर्यमयि ,शुचि वर्ण-वर्ण विहारिणी.
कलित,कालातीत,,किल्विष-नाशिनी,कल-हासिनी
भास्वरा, भव्या,भवन्ती ,भाविनी भवतारिणी
शुभ्र,परम निरंजना,पावन करणि,शुभ संस्कृता
अमित श्री,शोभामयी हे देवि, नमन, शरण प्रदा,
धवल कमलासीन,ध्यानातीत धन्य,धुरन्धरा
शब्दमयि,सुस्मित,स्वरा सौम्या सतत श्वेताम्बरा.
जननि,शुभ संस्कार दो ,दृढ़मति, सतत,कर्मण्य हों
राष्ट्र के प्रहरी बने जीवन हमारा धन्य हो,
ं
ओ ,बाँके-बिहारी !
[तुम्हारी जैसी ही नटखट,मोहक, निराली विधा, नचारी में तुम्हारी महिमा गा रही हूँ ,इसकी बाँकी मुद्रा तुम्हारे त्रिभंगी रूप से खूब मेल खाएगी. अर्पित करती हूँ ,तुम्हारे श्री-चरणों में यह नचारी-]
*
दुनिया के देव सब देवत हैं माँगन पे ,
और तुम अनोखे ,खुदै मँगिता बनि जात हो !
अपने सबै धरम-करम हमका समर्पि देओ ,
गीता में गाय कहत, नेकु ना लजात हो !
*
वाह ,वासुदेव ,सब लै के जो भाजि गये,
कहाँ तुम्हे खोजि के वसूल करि पायेंगे !
एक तो उइसेई हमार नाहीं कुच्छौ बस ,
तुम्हरी सुनै तो बिल्कुलै ही लुट जायेंगे!
*
अरे ओ नटवर ,अब कितै रूप धारिहो तुम ,
कैसी मति दीन्हीं महाभारत रचाय दियो !
जीवन और मिर्त्यु जइस धारा के किनारे खड़े,
आपु तो रहे थिर ,सबै का बहाय दियो !
*
तुम्हरे ही प्रेरे, निरमाये तिहारे ही ,
हम तो पकरि लीन्हों तुम छूटि कितै जाओगे !
लागत हो भोरे ,तोरी माया को जवाब नहीं,
नेकु मुस्काय चुटकी में बेच खाओगे !
*
एक बेर हँसि के निहारो जो हमेऊ तनि ,
हम तो बिन पूछे बिन मोल बिकि जायेंगे !
काहे से बात को घुमाय अरुझाय रहे ,
तू जो पुकारे पाँ पयादे दौरि आयेंगे !
*
- प्रतिभा.