सोमवार, 12 सितंबर 2022

एक सूचना

ब्लाग-जगत से संबद्ध सभी सुधी जनों को सूचित करना चाहती हूँ कि मेरे द्वारा लिखित उपन्यास कृष्ण-सखी,शवेतवर्णा प्रकाशन से प्रकाशित हो कर आ गया है. पुस्तक क्रय करने के लिये संपर्क-Shwetwarna Prakashan,232,B1, Lok Nayak Puram,New Delhi -110041. Mobile:+91 8447540078 Email:shwetwarna@gmail.com पुस्तक पर आपकी प्रतिक्रिया जानने की उत्सुकता रहेगी. - प्रतिभा सक्सेना.

रविवार, 14 अगस्त 2022

तेरी माटी चंदन !

 

*
तेरी माटी चंदन !

तेरी माटी चंदन ,तेरा जल गंगा जल ,
तुझमें जो बहती है वह वायु प्राण का बल ,
ओ मातृ-भूमि, मेरे स्वीकार अमित वंदन !

*
मेरे आँसू पानी , मेरा ये तन माटी ,
जिनने तुझको गाया .बस वे स्वर अविनाशी !
मैं चाहे जहाँ रहूँ ,मन में तू हो हर दम !

*
नयनों में समा रहे .तेरे प्रभात संध्या ,
हर ओर तुझे देखे मन सावन का अंधा ,
तेरे आँचल में आ युग उड़ता जैसे क्षण !

*
तेरे आखऱ पढ़लूँ फिर और न कुछ सूझे
जो अधरों पर आये मन व्याकुल हो उमँगे,
लिखने में हाथ कँपे वह नाम बना सुमिरन!

*
तेरा रमणीय दरस धरती का स्वर्ग लगे
तेरी वाणी जैसे माँ के स्वर प्यार पगे,

अब तेरे परस बिना कितना तरसे तन-मन !
*
मेरी श्यामल धरती ,तुझसा न कहीं अपना ,
मैं अंतर में पाले उस गोदी का सपना ,
जिस माटी ने सिरजा ,उसमें ही मिले मरण !

*
मुझको समेट ले माँ ,लहराते आँचल में ,
कितना भटके जीवन इस बीहड़ जंगल में ,
अब मुझे क्षमा कर दे, मत दे यों निर्वासन !

*

सोमवार, 11 जुलाई 2022

चलो , कहीं निकल चलें ,

 चलो,  कहीं निकल चलें !

जल-थल से अंबर से मन का संवाद  चले 

तरुओँ  की पाँत  जहाँ नीले आकाश तले 

बँध कर  रहें न इन कमरों-के घेरों  में ,

दरवाज़े खोलें , चलें खुले आसमान तले!


 शाला के बाहर जीवन की कार्यशाला है ,

खुली सभी कक्षाएँ नहीं कहीं ताला है ,

नये पाठ सीखने का मित्र, यही मौका है

नयी दिशा देखने से किसने हमें रोका है

 काहे अकेले रहें सभी से हिलें-मिलें!


देखो तो फैली कितनी विशाल धऱती है

हर मौसम में एक नया रूप धऱती है 

नई फसल फूल-फल उगाती सँवारती है ,

जीवन के पोषण  का हर प्रयास करती है

मिले घनी छाँह , सुने कलरव का गान चलें!


लहराती डालें मनभावन हवाएँ हैं, 

झाड़ियों के झुर्मुट है,ललित लताएँ हैं.

फूल वहाँ हँस-हँस बजा रहे हैं तालियाँ

कब से बुला रहे हमें हिला-हिला डालियाँ.

भूतल के वैभव को समझें समीप चलें!


पेड़ फलोंवाले झरबेरियाँ करौंदे भी

आम के टिकोरे और जामुनी फलैंदे भी 

तुमने अमरूद कभी,तोड़-तोड़ खाये क्या 

इमली शहतूत कैथ तुम्हें नहीं भाये क्या .

देसी फल खरा स्वाद नहले पर दहले


गुलमोहर,अमलतास इनके क्या कहने हैं,

ऐसे सजीले पेड़ पृथ्वी के गहने हैं

खग-मृग सरोवर बड़े ही खूबसूरत हैं 

झरने वन पर्वत तो जैसे नियामत हैं

जंगल में मंगल मनायें लग जाय गले 


बाहर खुले में कहीं छाँह कहीं धूप है

तोते की टियू-टियू कोयल की कूक है 

प्यारी गिलहरी मजे से बैठ जाती है ,

दोनों हाथो में थाम कुतर-कुतर खाती है 

 शाखों में झूमे  परिन्दों  के घोंसले !


गोदी में पलते हैं चंचल खरगोश ,हिरन 

कैसे विचरते हैं होकर निश्चिंत मगन

देखो गौरैया है, मैना है कबूतर हैं ,

नाचते हैं मोर  कहीं नटखट से बन्दर है 

जीवित खिलौने हैं वनों में पले खिले

तरल जल तरंगों में आनन्द संगीत चले


धरती उगाती जो ,इनका भी हिस्सा है,

भूख-प्यास सबमें, हम सब का वही किस्सा है

 इस तल के जीवन के प्राणी हम सारे हैं 

सुख-दुख में ये सब भी संगी हमारे हैं 

 बाँट कर खायें और सबसे हिलें-मिलें


आस-पास के भी,चलो हल-चाल ज्ञात करें

अपने पड़ोसी से सुख-दुख की बात करें

यहाँ व्यवहार और दुनिया की बातें हैं ,

दिन है परिश्रम का, चाँद सजी रातें हैं

 सबसे पहचान बने, स्नेह सहित नाम लें 


 हर इक दिशा का निराला एक रूप है

धरती की उर्वरा प्रयोजना क्या ख़ूब है

नई फसल फूल-फल उगाती सँवारती है ,

जीवन के पोषण के साधन सँचारती है

सँवलाए आँचल में आस-विश्वास मिले . 


सबको पालती है ,मोह-छोह और ममता से  

कितनी सहनशील और स्नेहमयी वसुधा है 

इस माँ ने माटी से रचा और पाला है 

ऋतुओं के शीत-ताप सहकर सँभाला है 

हम भी कृतज्ञ रहें ,माने जो सीख मिले


जीवन को कितने जतन से सँवार रही

हर पल हमारे हित साधन विचार रही

अन्न- फल-फूल भरे आँचल में धार हमे

तोष-पोष देती है पल-पल सँवार हमें.

  इस उदार धऱणी के और और पास चलें.


उर्वरा ,सुरम्य, स्वस्थ ,सुस्थिर, अचिन्त्य रहे

अपनी वसुन्धरा नित शोभन ,प्रसन्न रहे

 शान्ति सद्भाव बढ़े एैसा व्यवहार करें

अपनी धरा को चले नत-शिर प्रणाम करें,

 घनी नेह-छाँह मिले मन को विश्राम मिले !

चलो वहीं निकल चलें!

*











शनिवार, 5 फ़रवरी 2022

वाणी-विनय.

 *

कल्याणमयी माँ ,भारति हे ,शुभ श्रेय-प्राप्ति वर दो! 

*

उज्ज्वल तन, धवल ज्ञान-दीपित,दिव्यता-बोधमय दृष्टि प्रखर;

हे सकल कला-विद्या धारिणि, तुमसे ही दिशा-दिशा भास्वर.

 हो ताप-क्लेश-दुख  शमित,  राग-रस से सिंचित कर दो!

शुभ श्रेय-प्राप्ति वर दो! 

*

ज्योतित स्वरूप उजियारा भर, कर दे विलीन तम का कण-कण; 

शतदल मकरन्द अमन्द धरे, धरती-नभ हो आनन्द मयम् .

वाणी,विशुद्ध संधानमयी, वे अमल-सरल स्वर दो !

शुभ श्रेय-प्राप्ति वर दो! 

*

 अवतरो देवि ,जग-जीवन में, कण-कण  मुखरित हों गान रुचिर ;

अग-जग झंकृत हो पुण्य-राग, प्राणों में जागे ज्योति प्रखर .

जागें संस्कार सुभग,गति-मति निर्मला, कलुष-हर हो !

शुभ श्रेय-प्राप्ति वर दो! 
*

शुक्रवार, 31 दिसंबर 2021

विश्व-मंगल हेतु उतरो धरा पर, नव वर्ष !

*

 विश्व-मंगल हेतु उतरो धरा पर, नव वर्ष !

इस अधीरा मही को आश्वस्ति से भर दो, 

चर-अचर को  सुमति मंत्रित प्रीतिमय स्वर दो.

कूट-कलुष मिटे मनुजता को मिले उत्कर्ष .

उतरो धरा पर, नव वर्ष !

श्वेत पंखों से झरें सुख-शान्ति के मधु स्वन,

सुकृति -शील सु-भाव से मण्डित रहे जन-मन,

नवल संवत्सर पधारो, सहित सुस्नेह सहर्ष!  

उतरो धरा पर, नव वर्ष !

दग्ध मानव-हृदय को दो ,आस्था के स्वर ,

विखण्डन सारे सहज परिपूर्णता से भर.

कर्ममय जीवन बने, संकल्प सुदृढ़-समर्थ!

उतरो धरा पर, नव वर्ष !

*

सोमवार, 15 फ़रवरी 2021

चन्दन क फूल -

*

चँदन केर बिरवा मइया तोरे अँगना
कइस होई चँदन क फूल !
*
कनिया रहिल माई बाबा से कहलीं ,
चलो, चलो मइया के दुआर !
केतिक बरस बीति गइले निहारे बिन
दरसन न भइले एक बार !
हार बनाइल मइया तोहे सिंगारिल ,
चुनि-चुनि सुबरन फूल !
*
जइहौ हो बिटिया, बन के सुहागिनि ,
ऐतो न खरच हमार ,
आपुनोई घर होइल आपुन मन केर
होइल सबै तेवहार !
बियाहै गइल , परबस भइ गइली ,
रे माई तू जनि भूल !
*
ना मोर पाइ धरिल एतन बल ,
ना हम भइले पाँखी !
कइस आइल एतन दूरी हो
कइस जुड़ाइल आँखी !
कोस-कोस छाइल गमक महमही ,
पाएल न चँदन क फूल !
*
आपुनपो लै लीन्हेल गिरस्थी,
अब मन कइस सबूरी !
चँदन फूल धरि चरन परस की -
जनि रह आस अधूरी !
विरवा चँदन ,गाछ बन गइला
मइया अरज कबूल !
*

सोमवार, 16 नवंबर 2020

कायस्थ

 


                                                                 ।।ॐ श्री चित्रगुप्ताय नमः।।


कायस्थ -

श्री चित्रगुप्त का अंशज जो मसिजीवी,विधि का अनुगाता.

पुस्तिका सहचरी,वर्ण मित्र,लेखनि से जनम-जनम नाता, 

जीवन अति सहज,निराडंबर अनडूबा लोभों-लाभों में ,

अनुशासन शिक्षा संस्कार स्वाधीन-चेत रह भावों में.


व्यवहार,आचरण, खान-पान ,काया संसारोचित स्वभाव,

पर अंतर  का अवधूत, परखता अपने ग्राह्य-अग्राह्य सतत,

सब में रह कर भी सबसे ही कुछ विलग भिन्न-सा रह जाता,

इस चतुर्वर्ण में गण्य न जो, कायस्थ वही तो कहलाता !

 - प्रतिभा

(चित्र- गूगल से साभार)