शनिवार, 5 फ़रवरी 2022

वाणी-विनय.

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कल्याणमयी माँ ,भारति हे ,शुभ श्रेय-प्राप्ति वर दो! 

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उज्ज्वल तन, धवल ज्ञान-दीपित,दिव्यता-बोधमय दृष्टि प्रखर;

हे सकल कला-विद्या धारिणि, तुमसे ही दिशा-दिशा भास्वर.

 हो ताप-क्लेश-दुख  शमित,  राग-रस से सिंचित कर दो!

शुभ श्रेय-प्राप्ति वर दो! 

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ज्योतित स्वरूप उजियारा भर, कर दे विलीन तम का कण-कण; 

शतदल मकरन्द अमन्द धरे, धरती-नभ हो आनन्द मयम् .

वाणी,विशुद्ध संधानमयी, वे अमल-सरल स्वर दो !

शुभ श्रेय-प्राप्ति वर दो! 

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 अवतरो देवि ,जग-जीवन में, कण-कण  मुखरित हों गान रुचिर ;

अग-जग झंकृत हो पुण्य-राग, प्राणों में जागे ज्योति प्रखर .

जागें संस्कार सुभग,गति-मति निर्मला, कलुष-हर हो !

शुभ श्रेय-प्राप्ति वर दो! 
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शुक्रवार, 31 दिसंबर 2021

विश्व-मंगल हेतु उतरो धरा पर, नव वर्ष !

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 विश्व-मंगल हेतु उतरो धरा पर, नव वर्ष !

इस अधीरा मही को आश्वस्ति से भर दो, 

चर-अचर को  सुमति मंत्रित प्रीतिमय स्वर दो.

कूट-कलुष मिटे मनुजता को मिले उत्कर्ष .

उतरो धरा पर, नव वर्ष !

श्वेत पंखों से झरें सुख-शान्ति के मधु स्वन,

सुकृति -शील सु-भाव से मण्डित रहे जन-मन,

नवल संवत्सर पधारो, सहित सुस्नेह सहर्ष!  

उतरो धरा पर, नव वर्ष !

दग्ध मानव-हृदय को दो ,आस्था के स्वर ,

विखण्डन सारे सहज परिपूर्णता से भर.

कर्ममय जीवन बने, संकल्प सुदृढ़-समर्थ!

उतरो धरा पर, नव वर्ष !

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सोमवार, 15 फ़रवरी 2021

चन्दन क फूल -

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चँदन केर बिरवा मइया तोरे अँगना
कइस होई चँदन क फूल !
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कनिया रहिल माई बाबा से कहलीं ,
चलो, चलो मइया के दुआर !
केतिक बरस बीति गइले निहारे बिन
दरसन न भइले एक बार !
हार बनाइल मइया तोहे सिंगारिल ,
चुनि-चुनि सुबरन फूल !
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जइहौ हो बिटिया, बन के सुहागिनि ,
ऐतो न खरच हमार ,
आपुनोई घर होइल आपुन मन केर
होइल सबै तेवहार !
बियाहै गइल , परबस भइ गइली ,
रे माई तू जनि भूल !
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ना मोर पाइ धरिल एतन बल ,
ना हम भइले पाँखी !
कइस आइल एतन दूरी हो
कइस जुड़ाइल आँखी !
कोस-कोस छाइल गमक महमही ,
पाएल न चँदन क फूल !
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आपुनपो लै लीन्हेल गिरस्थी,
अब मन कइस सबूरी !
चँदन फूल धरि चरन परस की -
जनि रह आस अधूरी !
विरवा चँदन ,गाछ बन गइला
मइया अरज कबूल !
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सोमवार, 16 नवंबर 2020

कायस्थ

 


                                                                 ।।ॐ श्री चित्रगुप्ताय नमः।।


कायस्थ -

श्री चित्रगुप्त का अंशज जो मसिजीवी,विधि का अनुगाता.

पुस्तिका सहचरी,वर्ण मित्र,लेखनि से जनम-जनम नाता, 

जीवन अति सहज,निराडंबर अनडूबा लोभों-लाभों में ,

अनुशासन शिक्षा संस्कार स्वाधीन-चेत रह भावों में.


व्यवहार,आचरण, खान-पान ,काया संसारोचित स्वभाव,

पर अंतर  का अवधूत, परखता अपने ग्राह्य-अग्राह्य सतत,

सब में रह कर भी सबसे ही कुछ विलग भिन्न-सा रह जाता,

इस चतुर्वर्ण में गण्य न जो, कायस्थ वही तो कहलाता !

 - प्रतिभा

(चित्र- गूगल से साभार)

गुरुवार, 1 अक्तूबर 2020

लोग

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  आज फिर एक डायन ,
बाँसों से खदेड़-खदेड़ यातनायें दे ,
 मौत के घाट उतार दी गई ।
 इकट्ठे हुये थे लोग
 यंत्रणाओं से तड़पती
नारी देह से उत्तेजित आनन्द पाने !

खा गई पति को ,
 राँड है !
जादू-टोना कर चाट जाती बच्चों को ,
नज़र लगा कर ,चौपट कर दे जिसे चाहे ,
काली जीभ के कुबोल इसी के !

अकेली नारी !
बेबस ,असहाय !
कौन सुने उसकी ?
कहीं, कोई नहीं !

कोंच रहे हैं अंग-प्रत्यंग,
जितनी दारुण यातना ,
उतनी ऊँची किलकारियाँ !
ख़ून से लथपथ,
मर्मान्तक पीड़ा से
ऐंठता शरीर ठेल-ठेल ,
ठहाके लगाते लोग !
उन्मादग्रस्त भीड़ और
 अकेली औरत !

बदहवास भागती है !
 जायेगी कहाँ !
कहाँ जायगी, डायन ?
दर्दीली चीखों से रोमांचित-उत्त्तेजित
पत्थर फेंक-फेंक हुमस रहे लोग !
प्राणान्तक यंत्रणायें देते
असह्य सुख में
किलकारियाँ मारते लोग !

कौन सी नई बात !
सदियों से हर बरस
यही लीला देखने
 इकट्ठा होते हैं -बड़े चाव से लोग  !

वही पुरानी कथा -
आती है एक नारी,
स्वयं -प्रार्थिता ,
नारीत्व की सार्थकता हेतु ,
पुरुष की कामना लिये !
और शुरू हो जाता है तमाशा !

प्रर्थिता को एक दूसरे के पास फेर रहे
कंदुक सा बार-बार !
(पुरुष कहाँ अकेला ,
सब साथ होते हैं उसके !)
हो गई विमूढ़ , हास्य-पात्र ,
स्वयं-प्रार्थिता !
ऊपर से तिरस्कार की मनोव्यथा !
लोग रस विभोर !
उठ रहा है रोर !

क्रोध -औ'विरोध,
कटु वचनों के कशाघात,
और आत्म-श्रेष्ठता-ग्रस्त पौरुष का वार.
अंग-भंग कर संपन्न महत्-कार्य ,
मनुजता तार-तार!
समवेत अट्टहास !
गूँजते जयकार  !

 मुख विवर्ण-विकृत ,
लिखी पीड़ा अपार,
 ऐंठता देहाकार !
ठहाके लगाते लोग !

रक्त-धारायें बहाता तन ,
घोर चीत्कार करती ,
भागती है वह, 
अति आनन्द से हुलसते
नाच उठते हैं लोग !

 सदियों से,साल-दर साल
यही मनोरंजन होता आया है.,
 उत्सव यही देखने
 अब भी तो आते हैं ,
वीभत्स आनन्द के प्यासे लोग!

गुरुवार, 3 सितंबर 2020

हम चिर ऋणी ..

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प्रिय धरित्री,
इस तुम्हारी गोद का आभार  ,
पग धर , सिर उठा कर जी सके .
तुमको कृतज्ञ प्रणाम !
*
ओ, चारो दिशाओँ ,
द्वार सारे खोल कर रक्खे तुम्हीं ने .
यात्रा में क्या पता
किस ठौर जा पाएँ  ठिकाना.
शीष पर छाये खुले आकाश ,
उजियाला लुटाते ,
धन्यता लो !
*
पञ्चभूतों ,
समतुलित रह,
साध कर धारण किया ,
तुमको नमस्ते !
रात-दिन निशिकर-दिवाकर
विहर-विहर निहारते ,
तेजस्विता ,ऊर्जा मनस् सञ्चारते ,
नत-शीश वन्दन !
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हे दिवङ्गत पूवर्जों ,
हम चिर ऋणी ,
मनु-वंश के क्रम में
तुम्हीं से  क्रमित-
 विकसित एक परिणति -
 पा सके  हर बीज में
अमरत्व की सम्भावना ,
अन्तर्निहित  निर्-अन्त चिन्मय भावना .
श्रद्धा समर्पित !!!
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- प्रतिभा.

गुरुवार, 20 अगस्त 2020

जयति-जय माँ,भारती -

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शारदा,शंकर-सहोदरि ,सनातनि,स्वायम्भुवी,

सकल कला विलासिनी , मङ्गल सतत सञ्चारती.


ज्ञानदा,प्रज्ञा ,सरस्वति , सुमति, वीणा-धारिणी

नादयुत ,सौन्दर्यमयि ,शुचि वर्ण-वर्ण विहारिणी.


कलित,कालातीत,,किल्विष-नाशिनी,कल-हासिनी

भास्वरा, भव्या,भवन्ती ,भाविनी भवतारिणी


शुभ्र,परम निरंजना,पावन करणि,शुभ संस्कृता

अमित श्री,शोभामयी हे देवि, नमन, शरण प्रदा,


धवल कमलासीन,ध्यानातीत धन्य,धुरन्धरा

शब्दमयि,सुस्मित,स्वरा सौम्या सतत श्वेताम्बरा.


जननि,शुभ संस्कार दो ,दृढ़मति, सतत,कर्मण्य हों

राष्ट्र के प्रहरी बने  जीवन हमारा धन्य हो,

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