शुक्रवार, 10 मार्च 2017

हिन्दी पढ़ना भूल गए -


ये मेरे भारत के सपूत अब हिन्दी पढ़ना भूल गए , 
हिन्दी की गिनती क्या जाने, वो पढ़े पहाड़े भूल गए !

सारे विशेष दिन भूल गए त्यौहार कौन सा कब होता,
क्रिसमस की छुट्टी याद कि जैसे पट्टी पढ़ लेता तोता ,
लल्ला-लल्ली से ज्यादा अपने लगते हैं पिल्ला-पिल्ली ,
अंग्रेजी,असली मैडम है ,हिन्दी देसी औरत झल्ली.
रह गये नकलची बंदर बन वह मौज मस्तियाँ भूल गए !

दादी-नानी ये क्या जाने सब इनकी लगती हैं ग्रम्मा
मौसा फूफा क्या होते हैं,,चाची मामी में अंतर ना 
फागुन और चैत बला क्या है कितनी ऋतुएं कैसी फसलें,
 कुछ अक्षर जैसे ठ ढ़,ण अब श्रीमुख से कैसे निकलें 
ञ,फ ,ङ,क्षत्रज्ञ बिसरे ,अंग्रेज़ी पढ़ कर फूल गए !

करवा पर टीवी का बतलाया ठाठ सिंगार सुहाता है 
पर गौरा की पूजा कैसे हो कहाँ समझ में आता है ,
मामा-काका की संताने बस हैं उनके कज़िना-कज़नी,
जीजा-भाभी के नाते इन-लॉ लग कर बन जाते वज़नी,
उनसठ-उन्तालिस-उन्तिस का अन्तर क्या जाने, कूल भए !

इन-लॉ बन कर सब हुआ ठीक ,बिन लॉ के कोई बात नहीं .
है सभी ज़ुबानी जमा-खर्च रिश्तों में खास मिजाज़ नहीं.
ये अँग्रेज़ी में हँसते हैं ,इँगलिश में ही मुस्काते हैं, 
इंडिया निकलता है मुख से भरत तो समझ न पाते हैं 
वे सारे अक्षर ,लघु-गुरु स्वर ,मात्राएँ आदि समूल गए  !

 हा,अमरीका में क्यों न हुए ,या लंदन में पैदा होते
क्यों नाम हमारा चंदन है ,डंकन होते ,विलियम होते 
आँखें नीली-पीली होतीं ,ये केश जरा भूरे होते ,
ये वेश हमारा क्यों होता ,क्यों ब्राउन हैं गोरे होते 
हम काहे भारत में जन्मे, क्यों हाय जनम के फ़ूल भये !
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बुधवार, 8 मार्च 2017

नारी


*
मरणमय देह लेकर मैं तुम्हारी अंशिका हूँ, माँ 
*
अनेकों  नाम  अनगिन रूप धर  मैं ही प्रवर्धित हूँ 
जहाँ तक क्रमित संततियाँ वहाँ तक मैं प्रवर्तित हूँ .
अनेकों पात्र रच-रच मैं जगत के मंच पर धरती ,
हुई अनुस्यूत सब में ही पृथक् अस्तित्व धर कर भी,
तुम्हारी लोल लीला की अनुकृत मंचिका हूँ, माँ !  
*
बना नारीत्व को गरुआ ,अधिक गुण-सूत्र दे तुमने ,
तुम्हारे भाव हैं सारे जगत के नाट्य प्रकरण में .
तुम्हारी दिव्यता के निदर्शन की भूमिका पा कर ,
तुम्हारी छाँह धरती पर पड़ी जिस रूप में आकर
उसी चिद्रूप की मैं मृण्मयी अनुरंजिका हूँ, माँ !
*
सृजन का भार दे तुमने हृदय में मोह ममता भर ,
लचक भर झूम कर झुकना सिखाया है फलित हो कर.
विसर्जित हो रही हर बार सर्जन के विहित क्रम में,
अधिक विस्तार पाने को स्वयं का अतिक्रमण करने,.
तुम्हारी सृष्टि-वीणा की लघुत्तम तंत्रिका हूँ,माँ ! 
*

शुक्रवार, 17 फ़रवरी 2017

मौसम की वर्दी

*

तुम बार-बार क्यों लौट  रही हो सर्दी ,
कोहरा तो भाग गया , दे अपनी अर्जी.
*
गद्दे रजाइयाँ सभी खा चुके धूपें ,
बक्से में जाने से बस थोड़ा चूके
हमने भी अपनी जाकेट धो कर धर दी,
तुमने यों आकर कैसी मुश्किल कर दी.
*
ये तीन महीने बीते सी-सी करते,
अब जाकर तन के बोझ हुए थे हलके,
सुबहों  में जल्दी लगा जागने सूरज,
नदियाँ प्रसन्न हो गईं हटा कर चादर.    
फैलाओ अब मत  अपनी दहशतगर्दी.
*
शिवरात्रि आ रही पीने दो ठंडाई, 
घोटेंगे भाँग सिलों पर लोग-लुगाई .
तुम नाक बहाती, खाँसी-खुर्रा लेकर ,
क्यों घूम रही हो यहाँ लगाती चक्कर,
आराम करो, मत लादो अपनी मर्ज़ी. 
*
दिन बड़ा हो गया आने को है होली ,
मौसम में जैसे घुली भाँग की गोली.
त्योहारों को ऐसे मत धता बताओ, 
बुढ़िया माई,कंबल  ओढ़ो सो जाओ,

मौसम भी बदल चुका है अपनी वर्दी!
*


मंगलवार, 7 फ़रवरी 2017

घास हँसती है .

घास हँसती है .
*
ओस की बूँदें बिछा राँगोलियाँ पूरीं ,हरित पट पर लिख दिये नव-रूप  के अंकन 
महकता चंदन लगा  पुलकित पराग धरे,  पूर  चुटकी से कहीं हल्दी कहीं  कुंकुंम
सूर्यमुखियों के बहुत लघु संस्करण हुए , छत्र साजे  पीतवर्णी पाँखुरी मंडल 
खिल उठे अनयास इस एकान्त की लय में ,प्रार्थना करते हुए -से वन्य ये शतदल 
*
  धरा का आँचल धुला-सा नम हुआ रहता, बाँसुरी-सी भोर की  सरगम खनक जाती
 टार्च चमका पूर्व से आ झाँकता सूरज  वनस्पतियाँ कुनमुना कर  पलक झपकातीं
 यह लुनाई ,सुघरताई यह प्रणत मुद्रा लिख गई मृदु भावना  के व्यक्त पुष्पाक्षर 
चित्रकारी कर सजाया  रेशमी रंग ले , वाग्देवी के पधारें चरण  इस तल पर .
*
धवल वसना दिव्यता का अवतरण क्षिति पर, किरण-किरण पराग स्वर्णिम ,शुभ्र कमलासन
घास का सौभाग्य,हर तृण पुलक से पूरित , हंस और मयूर उतरेंगे इसी आँगन .
रंगशाला खोल मधु-ऋतु कर रही सज्जा ,तिलक केशर का लगा कर निरखती अपलक 
फूल पग-पग पर बिछाये पाँवड़े रच कर ,पाग बाँधे द्वार पर  तैय्यार टेसू तक.
*दूर तक फैली हुई कोमल गलीचे सी , दूब अपनी धन्यता का भास करती है ,
घास हँसती है !
*

मंगलवार, 31 जनवरी 2017

मनोकामना पूरो भारति !

*
सुकृति -सुमंगल  मनोकामना ,पूरो भारति!  
नवोन्मेषमयि ऊर्जा ,ऊर्ध्वगामिनी मति-गति  !
*
तमसाकार दैत्य दिशि-दिव में  , भ्रष्ट  दिशायें ,
अनुत्तरित हर प्रश्न , मौन   जगतिक  पृच्छायें ,
राग छेड़ वीणा- तारों में स्फुलिंग  भर-भऱ ,
विकल धूममय दृष्टि - मंदता करो निवारित !
मनोकामना पूरो भारति !
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निर्मल मानस हो कि मोह के पाश खुल चलें ,
शक्ति रहे मंगलमय,मनःविकार धुल चलें .
अ्मृत सरिस स्वर  अंतर भर-भर  
विषम- रुग्णता  करो विदारित !
मनोकामना पूरो भारति !
*
हो अवतरण तुम्हारा  जड़ता-पाप क्षरित हो ,
 पुण्य चरण  परसे कि वायु -जल-नभ प्रमुदित हो.
स्वरे-अक्षरे ,लोक - वंदिते ,
जन-जन पाये अमल-अचल मति !
मनोकामना पूरो भारति !
(पूर्व रचित)
*
- प्रतिभा.

शनिवार, 31 दिसंबर 2016

नव-वर्ष पर -


*
नया वर्ष मन में उछाह भरे ,
पथ के अवरोध हरे .
सन्मति से भरे लोक .जागे कल्याण बोध 
शान्तिमय हुलास की उजास चहुँ ओर झरे !
*

शुक्रवार, 18 नवंबर 2016

अनुष्ठान .

*
पुराने जर्जर होते नक़्शे से 
एक नई तस्वीर बन रही है -
चल रहा है 
 नवोदय का
 अनुष्ठान !
*
पुनर्निर्माण पूर्व की 
अवश्यंभावी उठा पटक.
हट जाये कूड़-कबाड़,
सदियों की जमी हुई कलौंच छुटे ,
दाग-धब्बों से रहित 
धुंध -धूल से स्वच्छ ,
निर्मल हो थल-जल-मनस्तल .
*
खलल पड़ेगा बहुतों के आराम में 
अवरोध खड़े होंगे ,
व्यवधान पड़ेंगे,   
 बाधायें बहते प्रवाह में .
 लेकिन महायज्ञ कहाँ संभव,
 समिधायें डाले  बिना .
*
आस्था का तेल ,
श्रम की बाती 
और विश्वास की लौ निष्कंप जले !
रोशनी से दमक उठे कोना-कोना.
हमारा सौभाग्य कि 
साक्षी-सहभागी हैं ,
इस  आयोजन में .
*
मंत्र-पाठ चल  रहा है 
सर्व कल्याण के विधान का,
आज की शंकाओं से आगे 
आगत संतानो के समाधान का .
हव्य पाने उठ रहीं
हवन की लपटें .
यह आँच ,
कष्टमय भी ,वरेण्य है.
*