शनिवार, 11 मई 2013

तुम प्रणम्य !


*
हे,मातृ रूप हे विश्व-प्राण की नियामिका,
तव परम-भाव इस भूतल, पर आ छाया बन  करुणा-ममता.
केवल अनुभव-गम्या, रम्या धारणा-जगतके आरपार
तुम मूल सृष्टि, बन तृप्ति-पुष्टि, सरसातीं जग में अमिय-धार
*
इस अखिल सृष्टि के नारि-भाव उस महाभाव के अंश रूप
उस परम रूप की छलक, व्यक्त नारी-मन में जो रम्य रूप,
भगिनी का नेह अपार, सहोदर बंधु सदा पाता जैसे .
पुत्री का मृदु वात्सल्य, पिता के हेतु उमड़ आता जैसे
*
गृहिणी का हृदय थके पंथी के हेतु सदय हो  अनायास ,
भूखे बालक को करुणाकुल,हो वितरित करता तृप्ति-ग्रास.
जो स्वयं काल से लड़ जाती ,भार्या बन सत्यवान के हित
अगणित परिभाषाहीन भाव नारी-अंतर में चिर संचित.
*,
श्री-मयी, ज्योति सौन्दर्य सुखों रागों -भोगों से जग सँवार ,
हो बिंब और-प्रतिबिंब असंख्यक रूप- भाव ऊर्जा अपार,
अपनी ही द्युति से दीप्तिमयी, तुमसे ही जीवन बना धन्य.
सब रूपों में तुम ही अनन्य, तुम धन्य चिन्मयी, तुम प्रणम्य !
*
- प्रतिभा.
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बृहस्पतिवार, 2 मई 2013

देह-उपल.


*
धार में हम बह नहीं सकते !
* उपलमय यह देह,
अटकाती रही हर बार !
तरलता अंतर सिमट कर रह गई -
बरबस बिखर कर 
ढह नहीं सकते .
*
हवाओं के साथ ,
कुछ संदेश लहरें दे गईँ ,
लिख छोड़तीं  गीली लकीरें .
लौट कर फिर बह गईं .
जमे तट पर ,
फेन औ' स्फार भरते
माटियों के जटिल रूपाकार .
बुद्बुदों  में छोडते निश्वास 
थिर हो रह नहीं सकते !
*
तलों की रेत मथती है ,
उमड़ते वेग की 
असमान गतियों में .
सिहरते,कसकसाते कण उमड़ते ,
फिर समा जाते वहीं चुपचाप .
खुल कर बह नहीं सकते !
*
जमे रहना ही  नियति
इस धार को देते सहारे.
जा रहा  बढ़ता अरोक प्रवाह ,
जल हिलकोरता  
छल- छल सम्हाले .
रुको पल भर  -  
टेर कर  कह यह नहीं सकते,
*
उपलमय यह देह,
सारे बोध पहरेदार .
जागते अटका रहे हर द्वार .
चाहो लाख लेकिन 
वेग के उत्ताल नर्तन
झेलते चिर रह नहीं सकते !
साथ में पर , 
बह नहीं सकते !
*

बुधवार, 24 अप्रैल 2013

शुरुआत.


*
 पाँच साल की बच्ची !
सब सामने घट रहा है ,दूसरी ओर मन का आक्रोश उफान बन कर निकल रहा है.
वह पाँच साल की बच्ची !अपनी बेटी याद आती है .हृदय तड़प उठता है. कितनी बार, कितनी घटनाएँ, कब तक,कहाँ तक?कभी लगने लगता है सब कहने-सुनने की बातें हैं .कोई घटना घटती है, शोर मचता है,फिर अगली बार तक चुप बैठ जाते हैं लोग.
आज पाँच साल की बच्ची का दुख मन को मथ रहा है .पर समाज में फैली ये मानसिक सड़न बहुत पुरानी है जो अब अधिकाधिक बदबू देने लगी है .हर क्षेत्र में किसी-न-किसी रूप में दिखाई देने लगी है. ऐसे लोगों का प्रतिशत बहुत कम होते हुए भी ऐसे  शातिर, कि व्यवस्था की कमियों का पूरा लाभ उन्ही को मिलता है.विचारवान जन काम में व्यस्त,अपने आप में लीन जब ऐसा कुछ घट जाता है तब कुछ देर को जागते हैं.
सामान्यतः मानसिकता कुछ ऐसी ढाल दी गई कि मर्द मर्द है, औरत उसकी इच्छा-पूर्ति का माध्यम .उसे अपने हिसाब से चलाना मर्द का अधिकार है .और इच्छाओं को निरंतर हवा देनेवाले माध्यम सिनेमा,अश्लील गाने,टीवी आदि मीडिया के असंयमित भोगवादी आइटम और उकसाते रहते हैं  .हर जगह यही देखने को मिलता है .आज के राज-नेता सरे आम घोषित करते हैं,'पुरानी पत्नी मज़ा नहीं देती' .तो उनकी छाँह पाये पिछलग्गुओं को क्या कहें!
स्त्री आगे न आये तो बेवकूफ़ कही जाये, सचेत हो कर आगे आये और अपनी अस्मिता के लिए अड़ने लगे,अपनी इयत्ता स्वयं निर्धारित करना चाहे तो उसे पाठ पढ़ाने की कोशिश.शताब्दियों की वर्जनाएँ झेलने के बाद परंपराएं बदलने की कोशिश में कहीं त्रुटियां होना स्वाभाविक है .पर तब सहयोग और सहारा देने के बजाय उसके सोच को  चुनौतियां देने का कोई औचित्य नहीं. क्या पढ़े-लिखे क्या अनपढ़ ,सामान्यतया अपनी श्रेष्ठतावाली पुरुषत्व की ग्रंथि से उबर नहीं पाते.यहाँ भी अहं आड़े आ जाता है.तरह-तरह से हँसी उड़ाना,फ़िकरे कसना ,वाणी का संयम खो कर व्यक्तिगत आक्षेपों से आहत कर , हीनतासूचक शब्दों  की बौछार कर समझते है कि उसकी छवि धुँधली कर रहे है. अगर सीधे यौन-व्यवहार में नहीं खींच पायें तो गालियाँ कहीं चली गई हैं क्या ? शब्दों से छीलते हैं, अश्लील शब्दावली में घसीट कर अपनी मनोवृत्ति दर्शाते हैं - कहीं अभिव्यक्ति में कहीं आचरण  में,पालिश्ड या जाहिल सब अपने ढंग के अनुसार . कहीं घर का आदमी कह देता है ,'जहाँ चाहो चली जाओ ,यहाँ रहो तो ऐसे ही रहना है.' मंचों पर भी मत-भिन्नता होने पर ऐसा व्यक्ति  कुछ तो भी बकने लगता है विचलित करने का हर प्रयत्न. या तो स्त्री भी  उनके स्तर पर उतरे, नहीं सहन कर सकती तो घर बैठे,(क्यों आईं हमारे बीच  दफ़ा हो जाओ).'
 यही मानसिकता पहले शब्दों में व्यक्त होती है फिर व्यवहार में उतरने लगती है. .ऊपर से सभ्यता ओढ़े रहनेवाले, असभ्य,जाहिल,अश्लील ,बर्बर आदि अनेक स्तरों पर इसी समाज के लोग हैं.,जिनका उद्देश्य एक ही - स्त्री को हीन सिद्ध कर ,उसे प्रताड़ित कर, शारीरिक मानसिक आघात पहुँचा कर आत्म-तृप्ति पाना .किसी भी क्षेत्र का कोई व्यक्ति उसी क्षेत्र की महिला के लिए हिकारत भरी,अभद्र और कभी-कभी अश्लील भाषा तक का प्रयोग करे,उसे आहत कर आत्म-सुख का अनुभव करे तो यह उसे अपना पुरुषोचित अधिकार लगता है.अन्य लोग दर्शक  बन कर देखते हैं, मज़ा लेनेवाले भी जमा हो जाते हैं. पुरुष की भौतिक और सामाजिक सामर्थ्य के आगे नारी विवश हो जाती है(काश नैतिक बल भी उसी अनुपात में रहता, पर  अक्सर ऐसा नहीं होता.) संस्कारशील लोगों की कमी नहीं है पर वे बीच में पड़ने से बचते हैं.लेकिन जब समाज का दूषण इतना भयावह हो उठे तो उनका दायित्व बनता है कि वे सक्रिय हों .
अगर सचमुच ये बातें चुभती हैं तो सजग हो कर पहले अपने क्षेत्र के विकार हटाने को आगे बढ़ें,बाद का रास्ता आसान हो जाएगा. अन्य क्षेत्रों के समान इस समाज का एक लघु-संस्करण यह 'ब्लाग-लोक' भी है,जिसका का लोक-जगत भी उसी समाज का प्रतिनिधित्व करता है.और इसका क्षेत्र बहुत व्यापक है ,हर जगह उसकी पैठ है.यहाँ प्रबुद्ध-जनों की कमी नहीं है.अपने क्षेत्र में ही सचेत हो जाएँ ,थोड़ा प्रयत्न करते रहें -झाड़-बुहार करते हुए, तो मानसिक प्रदूषण में कमी आए और संचित सड़ाँध का भी उपचार होने लगे .
 कहना सिर्फ़ यह है कि कहीं से तो शुरूआत  हो !
जनता सावधान हो जाए फिर तो शासन और क़ानून-व्यवस्था को सचेत होना पड़ेगा ही!
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बृहस्पतिवार, 18 अप्रैल 2013

वर्ण-विकृतियाँ .

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बावन आखर थे यहाँ ,अब गायब हैं चार,(ऋृ,लृ,लृ+ृ,ष)
सुध लेवा कोई नहीं ,कइस लोक-व्यवहार !
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कुछ वर्णों का रूप तो दिया और में ढाल,
ष या  श,ख जो  कहो , एक रूप  तत्काल. (लषन को लखन और विष्णु को विश्णु कहते हैं )
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श्र का रूप विकृत किया ,जोड़ी और रकार,('श्रृंगार' कर दिया )
अब कैसे उच्चरोगे ,श पर दो-दो भार .(सिर्फ़ ृ का काम  था - शृ)
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ऋषि कर गए बन-गमन ,हमें दे गये चिह्न,
लोग  बिगाड़े दे रहे बन कर परम प्रवीण !(लोग गृह-घर-  को  ग्रह -आकाशीय पिण्ड- लिखते हैं
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क्या पा लोगे विद्व-जन,खो कर पञ्चम वर्ण,
ध्वनियों के उच्चार का अनुशासन  कर भंग . (पञ्चम वर्ण की जगह ,अनुस्वार प्रयोग बड़ा गड़बड़ कर देता है)
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उच्चारण होगा वही ,मानो भले न मित्र,
जो सदियों से सिद्ध था ,अब क्यों हुआ विचित्र!
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अरे, ज़रा तुम देख लो ,शासन   का अभिमान,
रोल-गोल मुँह आ घुसा सिर पर टोपा तान !(ऑ)
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हुआ आक्रमण देश पर ,चले नये व्यवहार,(क़.ख़.ग़)
गर-गर खर-खर कर रहे , उठती गले खखार.
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पग में रोड़े आ पड़े फिसल गये दो-चार, (क़,ख़,ग़)
गला गरगरा कर करो अब उनका उच्चार!
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 लुढ़के- रड़के दो जने ,ड.ढ गूमड़दार, (ड़,और ढ़ हो गए )
सारा ढंग बदल गया,  जैसे ठेठ गँवार.
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कंकड़ पग में यों पड़े, गये लड़खड़ा वर्ण ,
क़ख़ग़ के साथ ही बिगड़ गये कुछ अन्य .
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ज फ भी तो छूत के ऐसे हुए शिकार,(ज़,फ़)
ज़ोर दिखा कर  फूल को  'फ़ूल' किया  लाचार.
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जो कुछ सिद्ध ,विहित रहा ,अब हो गया निषिद्ध
भाषा का दुर्भाग्य यह , रहा न शुद्ध-अशुद्ध.
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यहाँ बेतुकी गलतियाँ ,छूट न जाएँ मित्र,
देखें अगली पीढ़ियाँ, हँसी बनेगी नित्य !
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मंगलवार, 9 अप्रैल 2013

एक सोरठा भी..

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1. दही बेच री ग्वालिनी  इसे न देना छूट, 
    ये तो छलिया जनम का घट ही लेगा लूट. 
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2. सीवनहारे अस सियो कपड़ा फट-फट जाय,
    टाँका भर भी फाँक ना इस सीवन पर आय!
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3. वर्ण -वर्ण पर लिख गया तेरा ही तो नाम ,
    छुअत लेखनी रँग गई  ,हो गई मैं गुमनाम .
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4. ऐसा हुआ कमाल ,सभी पसंगा बन गया ,
    कोई पुरसा हाल, रहा न इस संसार में .
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5. हल्दी से रँग हाथ को सौंप दिया चुपचाप ,
   कौन करे बिसबास फिर,अब तक कोरा गात.
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6. वह चरचा मत ना करो मेरा जी अकुलाय,
    गहरी डूब समा गई अब तो साँस न आय.
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7. कुंज-बिहारी तुम कहाँ ,बन-बन डोलूँ टेर,
   उमर किनारे आ गई ,अब काहे की देर .
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(नं. 4. वाला छंद सोरठा है -शेष छह दोहे हैं. )

शुक्रवार, 29 मार्च 2013

मन


जान रही हूँ तुम्हें ,समझ रही हूँ ,
तुम वह नहीं जो दिखते हो!
वह भी नहीं -
ऊपर से जो लगते रूखे ,तीखे,खिन्न!
चढ़ती-उतरती लहरों के आलोड़न ,
आवेग-आवेश के अथिर अंकन
अंतर  झाँकने नहीं देते !
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तने जाल हटते  हैं जब, 
आघातों के वेगहीन होने पर , 
सारी उठा-पटक से परे,
एक सरल-निर्मल सतह  
की ओझल खोह से
झाँक जाता है,
शान्त क्षणों में बिंबित 
दर्पण सा मन !
ऊपरी तहों में लिपटे भी  ,
कितने  समान हम !
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सोमवार, 25 मार्च 2013

होली के दोहे.


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एक रंग है प्रीत का, बाकी सब तो स्याम,
अक्षर-अक्षर तू लिखा, मैं रह गई अनाम .
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जो जंगल सुलगा रहे, वही पलाश बटोर,
घोल रंग होली किया, दहक रहा हर पोर .
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उसी आग के रंग से, चूनर रँग दे श्याम ,
तन-मन ताप समा गया, अब संसार हराम .
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क्यों साबुन रगड़े सखी,चढ़ा श्याम का रंग
फीका कैसे होयगा ,जब हो रहा अनंग.
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मेरा  तन मत नाप रे , साजन से ले पूछ,
दरजी, तब  पोषाक में रहे न कोई चूक.
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