गुरुवार, 11 जनवरी 2018

जब बोला चलता हुआ वर्ष -

*
जब नये साल से बोला चलता हुआ वर्ष -
जाते-जाते यह उचित लगा ओ मीत, तुम्हें कर दूँ सतर्क -

 मैं भी था अतिथि ,एक दिन तुम सा ही आदृत,,
ऐसे ही चाव कोलाहल सँग मैने भी पाया था स्वागत
अपने आने के उत्सव में मैं भी था मगन परम पुलकित 
अपने आने पर की धूम-धाम से कौन नहीं होता प्रमुदित,

 सोचा था मेरे संग बढ़ रहे, राहें नई  बनायेंगा 
जीवन के मूल्य मान सीढ़ी दर सीढ़ी चढ़ते जायेंगा. 
 हर बरस नया उत्साह लिये ,अपना कर्तव्य निबाहेगा 
ये मनुज नये कुछ निश्चय ले कुछ लक्ष्य पूर्ण कर पायेगा .

 तब सोचा था यह अवधि दान ले आना सार्थक हुआ यहाँ ,
रँग-रोगन जरा हटा, तो पाया  बड़ी ढोल में पोल यहाँ .
देखा कि ढपोरशंख  जैसे बन लोग दुआएँ बाँट रहे,
ओ नये साल, यह दे ,वह ला ,सारा कुछ हम पर लाद रहे .

 कोई मर्यादामान नहीं,  शुचिता , संस्कार ,सुवास नहीं,
इस कर्मप्रधान जगत में अपनी क्षमता पर विश्वास नहीं.
 ये चाह रहा कामना पूर्ति बस होती जाये  अनायास ,
क्षमताएँ पा पर-हित-साधन का किया न कोई भी प्रयास.

फल सके वर्ष ,पर मिले भेंट में मन के शुभ-संकल्प कहाँ?
नव आगत को  अर्पित कर दें ऐसे शुभकर्म विकल्प कहाँ? 
बस अपने सुख के हेतु,विश्व- जीवन के द्रोही बने आज
इस महासृष्टि गाथा में ,उद्धत खलनायक का वेश साज.

 अब कथासूत्रता आगे की ओ मित्र, तुम्हारे हाथ रही
 ऊर्ध्वारोहण की शुभ-यात्रा किस अंध कुहर में भटक गई.
कह दिया बहुत कुछ थोड़े में,अब कर लेना पूरा विमर्ष .
जब नये साल से बोला, कुछ उदास-सा,  चलता हुआ वर्ष.
*
- प्रतिभा सक्सेना.

शनिवार, 30 दिसंबर 2017

एक शुभ संकल्प -

*    
नया संवत्सर खड़ा है द्वार-देहरी ,
एक शुभ संकल्प की आशा लगाये .

अर्थ का विस्तार कर सर्वार्थ कर दो
आत्म का घेरा बढ़ा परमार्थ कर दो,
बूंद-बूंद भरे, कृतार्थ समष्टि -सागर
त्रिक् वचन-मन-कर्मयुत संकल्प धर दो !
दिग्भ्रमित मति ,
नये मंगल-आचरण का भाष्य पाये !
*
- प्रतिभा. 

रविवार, 10 दिसंबर 2017

आदमी ऐसा क्यों होता है ?

*
हड्डी चिंचोड़ने की आदत 
अपने  बस में कहाँ  कुत्तों के .
मांस देख ,मुँह से टपकाते लार
वहीं मँडराते ,सूँघते .
तप्त मांस-गंध से हड़की
लालसा रह-रह,
आँखों में  लपलपाती , 
अाकुल पंजे रह-रह काँपते ,
टूट पड़ते मौका देख .

 बाप ,भाई, फूफा, मामा ,चाचा ,
रिश्ते ,बेकार सारे .
बताओ ,बेटी-बहन किधर से 
गर्म गोश्त नहीं होतीं  ?
फिर तो अहल्या हो ,उपरंभा हो ,
निर्भया या कोई नादान बाला ,
क्या फ़र्क पड़ता है ?

भयभीत हो दबा ले भले  
टेढी दुम ,
कौन सीधी कर पाया आज तक ?
बाज़ आया  कभी 
 अपने कुत्तेपन से !

आदमी ऐसा क्यों होता है ?
*
- प्रतिभा.

शनिवार, 19 अगस्त 2017

तुम्हारा दृष्टि भ्रम होगा.


( अपनी मित्र कल्पना की एक कविता यहाँ प्रस्तुत करने का लोभ नहीं संवरण कर पा रही हूँ. - प्रतिभा. )

मैं नहीं रोई , तुम्हारा दृष्टि भ्रम होगा.

अचानक यों उमड़ कर क्यों  हृदय  आवेग धारेगा,
किसी भी भावना के बस, उचित-अनुचित विचारेगा
मनस् की चल तरंगों का सरल उपक्रम रहा होगा.
 तुम्हारा दृष्टि भ्रम होगा

करो विश्वास ,ले कर शान्त-मन जाओ,
न इस बाज़ार में कोई कहेगा और रुक जाओ ,
किसी उद्दाम झोंके ने बहक धोखा किया होगा.
 तुम्हारा दृष्टि भ्रम होगा

यहाँ सुकुमार भावों पर किसी का बस नहीं चलता ,
कभी अनयास हीअनुताप मन का यों नहीं छलता,
अचेतन कामना का  देहधर्मी अतिक्रमण होगा
 तुम्हारा दृष्टि भ्रम होगा

क्षणिक आवेग में बहकी लहर योंही उछल जाये .
अकारण वाष्प के कण आ नयन के पटल पर छायें ,
बड़ी सी ज़िन्दगी के लिये तो वह बहुत कम होगा.
तुम्हारा दृष्टि भ्रम होगा.

अभी जो देय बाकी हैं उन्हे चुपचाप भरना हैं ,
विगत अनुबंध के सब रिक्त खाँचे पूर्ण करना हैं
इसी में रीत जाने को मिला ये ही  जनम होगा
तुम्हारा दृष्टि भ्रम होगा.

 न रोई मैं यही सच  है  इसी को मान लेना तुम
 जरा सी देर में ही  बदल जाती काल की सरगम 
इसी में डूब कर खोया अजाना क्षण रहा होगा.
तुम्हारा दृष्टि भ्रम होगा.
*
- कल्पना.

रविवार, 13 अगस्त 2017

चल रे हर सिंगार ,तुझे मैं साथ ले चलूँ.

.*
चल रे हर सिंगार तुझे मैं साथ ले चलूँ.
 चंदन कुंकुंम धारे तरु डालों पर जगतीं दीप शिखाएँ  ,
संध्या के रेशमी पटों में शीतल सुरभित श्वास समाये
इस जीवन से माँग-जाँच कर थोड़ा-सा मधुमास ले चलूँ

यह उल्लास भरा उत्सव-क्रम मधुवर्षी लघुतम जीवन का 

किसी  प्रहर को रँग से भऱ  दे , उज्ज्वल ,निर्मल हास सुमन का 
अपने सँग अपनी माटी का नेह भरा आभास ले चलूँ.

सौरभमय सुकुमार रँगों में संध्याओं से भोर काल तक

आंगन की श्री-शोभा संग रातों के झिलमिल-से उजास तक  
  थोड़ा़ यह आकाश ले चलूँ ,अति प्रिय यह वातास ले चलूँ  .
चल रे हर सिंगार ....
*

शुक्रवार, 30 जून 2017

समय का हिसाब -

*
कूड़े के ढेर पर
बिखरा पड़ा कितना सामान,
किसी ज्योनार का फिंका खाना तमाम.
जूठन लगी पेपर प्लेटें,
पिचकी बोतलें, गिलास,
पालिथीन की ,मुड़ी-चुड़ी थैलियाँ .
और बहुत-कुछ एक  साथ.
मक्खियों के संग
मँडराती खट्टी-सी गंध.

दो बच्चे ,उम्र आठ-दस बरस ,
कंधे पर झोली टाँगे ,छडी़ से मँझा रहे हैं
बजबजाते अंबार को.
पतली-पतली टाँगों से फलाँग-फलाँग
छड़ी से उकत-पुकत कर रहे हैं ढेर.
उठाते ,कुछ खाते कुछ झोली में डालते,
चिपकते हाथ पीछे पोंछते
टुकड़ों  में तृप्ति बटोरते,
हँसते हैं.
(काश ,पहले मिल गया होता !)

किसने फेंका ?
हिसाब चुकाना पड़ेगा एक दिन.
कितना समेटा, बढ़-चढ़ के जोड़ लिया
और बर्बाद कर दिया पल भर में.
बहुत तृप्त हुआ मन ?

पर यहाँ हर चीज़ का,
हरेक का हिस्सा तय है.
एक-एक अन्न जतन से सँजोती है धरती  ,
पूरे मौसम की फ़सल .
फोकट में नहीं मिलता अन्न-जल !
(ईश्वर न करे कभी  तुम्हारी संतान को तरसना पड़े यों ही.)

याद रखना -
समय बख्शता नहीं किसी को,
हिसाब 
पूरा कर छोड़ता है !
*
(कुछ दिनों की छुट्टी)

रविवार, 4 जून 2017

माँ -


*
 थक गई है माँ ,
 उम्र के उतार पर लड़खड़ाती,
 अब समय के साथ चल नही पाती .
 बेबस काया पर
बड़प्पन का बोझ लादे,
झुकी जा रही है माँ. 
*
त्याग के, गरिमा के ,पुल बाँधे, 
 चढाने बैठे हैं लोग
 पार नहीं पाती, 
 घिसी-गढ़ी मूरत देख अपनी 
जड़ सी हो जाती मा्ँ, 
दुनिया के रंग बूझती 
चुपचाप झुराती है .

सुविधाओं की दुराशा ले 
दुविधाओं में फँसी ,
निस्तार न पा, 
गुहराती,' हे,भगवान ,मेरे कागज कहाँ खोये हो , 
निकालो अब तो .'
किसी और से 
कुछ कह नहीं पाती,माँ. 
*