गुरुवार, 3 सितंबर 2020

हम चिर ऋणी ..

 *

प्रिय धरित्री,
इस तुम्हारी गोद का आभार  ,
पग धर , सिर उठा कर जी सके .
तुमको कृतज्ञ प्रणाम !
*
ओ, चारो दिशाओँ ,
द्वार सारे खोल कर रक्खे तुम्हीं ने .
यात्रा में क्या पता
किस ठौर जा पाएँ  ठिकाना.
शीष पर छाये खुले आकाश ,
उजियाला लुटाते ,
धन्यता लो !
*
पञ्चभूतों ,
समतुलित रह,
साध कर धारण किया ,
तुमको नमस्ते !
रात-दिन निशिकर-दिवाकर
विहर-विहर निहारते ,
तेजस्विता ,ऊर्जा मनस् सञ्चारते ,
नत-शीश वन्दन !
*
हे दिवङ्गत पूवर्जों ,
हम चिर ऋणी ,
मनु-वंश के क्रम में
तुम्हीं से  क्रमित-
 विकसित एक परिणति -
 पा सके  हर बीज में
अमरत्व की सम्भावना ,
अन्तर्निहित  निर्-अन्त चिन्मय भावना .
श्रद्धा समर्पित !!!
*
- प्रतिभा.

गुरुवार, 20 अगस्त 2020

जयति-जय माँ,भारती -

*

शारदा,शंकर-सहोदरि ,सनातनि,स्वायम्भुवी,

सकल कला विलासिनी , मङ्गल सतत सञ्चारती.


ज्ञानदा,प्रज्ञा ,सरस्वति , सुमति, वीणा-धारिणी

नादयुत ,सौन्दर्यमयि ,शुचि वर्ण-वर्ण विहारिणी.


कलित,कालातीत,,किल्विष-नाशिनी,कल-हासिनी

भास्वरा, भव्या,भवन्ती ,भाविनी भवतारिणी


शुभ्र,परम निरंजना,पावन करणि,शुभ संस्कृता

अमित श्री,शोभामयी हे देवि, नमन, शरण प्रदा,


धवल कमलासीन,ध्यानातीत धन्य,धुरन्धरा

शब्दमयि,सुस्मित,स्वरा सौम्या सतत श्वेताम्बरा.


जननि,शुभ संस्कार दो ,दृढ़मति, सतत,कर्मण्य हों

राष्ट्र के प्रहरी बने  जीवन हमारा धन्य हो,

*



गुरुवार, 13 अगस्त 2020

ओ ,बाँके-बिहारी !

 ओ ,बाँके-बिहारी !

[तुम्हारी जैसी ही नटखट,मोहक, निराली विधा, नचारी में तुम्हारी महिमा गा रही हूँ ,इसकी बाँकी मुद्रा तुम्हारे त्रिभंगी रूप से खूब मेल खाएगी. अर्पित करती हूँ ,तुम्हारे श्री-चरणों में यह नचारी-]

*

दुनिया के देव सब देवत हैं माँगन पे ,

और तुम अनोखे ,खुदै मँगिता बनि जात हो !

अपने सबै धरम-करम हमका समर्पि देओ ,

गीता में गाय कहत, नेकु ना लजात हो !

*

वाह ,वासुदेव ,सब लै के जो भाजि गये,

कहाँ तुम्हे खोजि के वसूल करि पायेंगे !

एक तो उइसेई हमार नाहीं कुच्छौ बस ,

तुम्हरी सुनै तो बिल्कुलै ही लुट जायेंगे! 

*

अरे ओ नटवर ,अब कितै रूप धारिहो तुम ,

कैसी मति दीन्हीं महाभारत रचाय दियो !

जीवन और मिर्त्यु जइस धारा के किनारे खड़े,

आपु तो रहे थिर ,सबै का बहाय दियो !

*

तुम्हरे ही प्रेरे, निरमाये तिहारे ही ,

हम तो पकरि लीन्हों तुम छूटि कितै जाओगे !

लागत हो भोरे ,तोरी माया को जवाब नहीं,

नेकु मुस्काय चुटकी में बेच खाओगे !

एक बेर हँसि के निहारो जो हमेऊ तनि ,

हम तो बिन पूछे बिन मोल बिकि जायेंगे ! 

काहे से बात को घुमाय अरुझाय रहे ,

तू जो पुकारे पाँ पयादे दौरि आयेंगे !

*

- प्रतिभा.


शनिवार, 8 अगस्त 2020

शिलान्यास के शुभ अवसर पर -

*

 प्रभु, श्रीराम पधारो!

इस साकेतपुरी में, मन में ,रम्य चरित विस्तारो!

*

बीता वह दुष्काल सत्य की जीत हुई,

नया भोर दे,तिमिर निशा अब बीत गई, 

विष-व्यालों के संहारक तुम गरुड़ध्वजी,

मातृभूमि के पाश काटने, धनुर्भुजी ,

 भानु-अंश, तम हरने को पग धारो !  

*

युग-युग के दुष्पाप शमित हो, रहे शुभम् 

सुकृति-सुमति से पूरित हो तन-मन जीवन 

कुलांगार कर क्षार ,भाल   चंदन धर दो 

राष्ट्र-पुरुष का माथ तिलक से मंडित हो ,

मनुज लोक में पुण्य-श्लोक संचारो!

*

सहस बरस बीते  अँधियाते, टकराते

रहे सशंकित ,पग-पग पर  धक्के खाते,

 इस भू से कलंक चिह्नों को निर्वारो,

परित्राण दो,क्षिति-तल के संकट टारो,

परम वीर ,हे महिमावान पधारो .

*

दुर्मद-दुर्मति का निष्कासन संभव हो 

मिटा दैन्य ,सामर्थ्य नवोर्जाएँ  भर दो ,

भूमा का वरदान ,विश्व में शान्ति रहे 

बाधाएँ हट जायँ न कोई भ्रान्ति रहे,

करुणामय , निज जन के काज सँवारो !

*

कर्मों में रत जीवन ,जब निस्पृह  जीता ,

शीश वहीं पर अखिल विश्व का नत होता -

सिद्ध किया तुमने निज को दृष्टान्त बना ,

दिव्य कर दिया पञ्चभूतमय तन अपना.

आ ,साक्षात् विराजो,  निज लीला धारो!

 अब, श्री राम पधारो !

*

- प्रतिभा.

सोमवार, 8 जून 2020

मैं कविता हूँ -

मैं कविता हूँ --

कविता हूँ  मुक्त विचरती हूँ,मैं मानव होने का प्रमाण ,  
 पहचान बताऊं कैसे मैं ,हर भाव ,रंग में विद्यमान .
अवरुद्ध पटों को खोल,वर्जनाहीन अकुण्ठित बह चलती,
जो सिर्फ़ उमड़ता बोझिल सा, मैं सजल प्रवाहित कर  कहती.  

प्रकटी अरण्य ऋषि-चिन्तन में पाने जीवन का दिव्य मूल,
ऋक्सामयजुर् में प्रकटी बन मानव-प्रज्ञा का धवल फूल .
विश्वानुभूति के स्वर भरती समभाव लिए विचरण करती ,
भावना लोक की वासी हूँ संवेदन में साँसें भरती.

सागर के सीने मे उफान ,फूलों में वर्ण-वर्ण बिखरी,
सरिताओं में लहराई भी  ,निर्झर सी औचक  फूट पड़ी. 
विधना ही प्रथम सिरफिरा कवि, लिख शून्य पटलपर लिपि विचित्र,
मनमौजी,रचता  दृष्य-काव्य चलते-फिरते अनगिन चरित्र.

तापस की करुणा छंद बनी, सात्विक आवेगों  की पुकार, 
कविता का स्रोत बह चला लौकिक जीवन का रस ले अपार .
मैं लोकगीत बन ,धऱती  पर आकाश नया ही रच देती, 
लालित्य राग बिखराता तो,मैं बनी विश्व मोहन बंसी.

दुख में जन्मी अभावमें पल, आँसू से सिंच पल्लवित हुई  
अंतर्सत्यों की व्याप्ति,गिरा की भेंट,सुकृति-साधनामयी,
मैं  युद्ध क्षेत्र में गीता हूँ  उलझे प्रश्नों का समाधान ,
हो जन्म-मरण के आर-पार मैं रही निरंतर विद्यमान . 

होकर विषाद आच्छन्न मनुज उद्विग्न मनस् होता विषण्ण,
 मैं ही  विराग का लेप लगा फूंकती कान में कर्म-मर्म.
 रुक सकती नहीं दिवारों से,मैं हथकड़ियों में और प्रबल ,
शत-शत आयुध कर निष्प्रभाव, रह जाती सरल तरल निश्छल.

जीवन-वेदी पर जो अर्पित ,यश बन  पीछे-पीछे चलती ,
भू- नभ की माप करे यौवन तो रीझ बलाएं मैं लेती. 
पर्वत से फूट निकलती ऐसी व्याकुलता सिरधरे कौन ,
पागल हो जिये और अपनी पीड़ा न कह सके रहे मौन.


कहते-कहते रह जाती किसी महिम की गाथा के कुछ पल 
आगत प्रेमीजन को कोई अनुचित संदेश न करे विकल.
कल्पना सखी का योग माँग कुछ का कुछ करती बात बदल
दुष्यंत शापवश भूल गया था, न  था प्रेम में कोई छल.

सर्पिल राहें चलते-चलते, पा किसी बिरछ की छाँह सघन
जाने क्या-क्या  घिर आता मुझ पर मुँद जाते ये थके नयन 
हाँ ,कभी अकेलेपन में कोई तान विरह की ले लेती, 
पर अंतर के भीगे स्वर,जग के नाम  सुरक्षित कर देती.

अवरुद्ध द्वार खोलूँ उर के, हर वातायन से झाँक सकूँ ,
यह मेरे लिए विहित कि कहाँ कितनी गहराई, आँक सकूँ .
रो लेती बिलखाते शिशु सँग, वेदना देख कर बह आती  
अन्याय देख जल उठती मैं, दुर्धर्ष विपथगा बन जाती.

मीरा सँग गाती विरह-गीत, प्रमदा हित मैं  उर्वशी बनी,
सूरा के माखनचोर सजा,जय में अर्जुन की रथी बनी .  
कल्पना जगा, रच नई सृष्टि, जीवन को रस से प्लावित कर ,
संताप दग्ध मानस को करती स्निग्ध, तरलता भावित कर.

चन्दन में भरती आग ,अस्थियाँ वज्रों में करती परिणत  ,
जल-थल-अंबर में रणित ज्योतिकण अपने स्वर में अंतर्हित  
वाणी की निर्मल धारा हूँ मैं सरस्वती का व्यक्त रूप,
युग-युग की अंतर्धारा बन मैं प्रवहमान ,अविरल,अविरत.

रोना न, प्रेम का दिखा स्वांग ,स्वाहा होना सिखलाती हूँ , 
जीवन-यज्ञों की समिधाएँ अभिमंत्रित करती जाती हूँ .
निमिषों में गिन देती युग को,पर कुछ पल ,सदियों तक गाती,  
कविता हूँ ,रच जीवन्त  चित्र, जीवन के रँग बिखराती हूँ !
*

रविवार, 17 मई 2020

प्रायश्चित -

*
मानव रचना का महत् कार्य कर, सृष्टि निरख हो कर प्रसन्न ,
अति तुष्टमना  सृष्टा ने मायामयि सहचरि के साथ मग्न. 
देखा कि मनुज हो सहज तृप्त ,हो महाप्रकृति के प्रति कृतज्ञ,
आनन्द सहित सब जीवों से सहभाव बना रहता सयत्न  ,

वन,पर्वत सरिता,गगन पवन से सामंजस्य बना संतत .
ऋतुओँ से कालविभागों के अनुकूल सदा  नियमित संयत   ,
जड़-चेतनमय जग जीवन को करता चलता सादर स्वीकृत.
तब विधना धरती के मानव से बोल उठे यों स्नेह  सहित -

मानव, तुम मुक्त विहार करो ये सब अधीन हैं संरक्षित ,
इन सबके साथ चले जीवन सबका हित ही हो अपना हित. 
 ये गिरि मालाएँ ,वन शाद्वल ,ये हरित द्रोणियाँ , उच्च शिखऱ ,
तुम इन सबके संरक्षक हो जग जीवन हो सुखमय सुन्दर ,

 वसुधा कुटुम्ब है  जड़-चेतन संसार यही है सर्वभूत 
तू जी, औऱों को जीने दे सुविधायें सबके हित प्रभूत
नत-शीश मनुज बोला - उपकृत हूँ ,पा इतनी सामर्थ्य देव
इस महा प्रकृति की संताने ,लघुतम या दीर्घाकार जीव,

हो गई धरा वरदानमयी फिर चलने लगा सृष्टि का क्रम,
सीखता रहा धीरे-धीरे , सुखमय जीवन का कर उपक्रम
सदियाँ बीतीं,होता जाता था वह प्रबुद्ध और कर्म-कुशल,
लेकिन अति सुख-सुविधाओं का रोगी बन कर हो गया विकल.

तब शेष जगत के लिए मनुज होता ही गया  संवेदहीन, 
 औरों का हिस्सा, अधिकाधिक अधिकारों के हित रहा छीन.
अति के कारण हिल उठी धरा ,आकाश थरथरा गया सहम,
सागर उफनाए ,रुद्ध दिशाएँ,आर्तनाद से भरा  पवन .

निज अहंकार में लगा रहा  कैसे अनिष्ट के महादाँव,
हो चकित विधाता देख रहा क्या बदल गया मानव स्वभाव!
 हो रम्य प्रकृति से दूर, सृष्टि का अनुशासन कर रहा भंग, 
स्वच्छंद और अतिचारी होता जाता है दिन-दिन प्रचंड.

चर-अचर सभी पर मनमाना अपना अबाध अधिकार मान, 
व्यवहार क्रूरता और अनीति से कर देता कंपायमान,
भूधर की रीढ़ें तोड़-फोड़,जल के स्रोतों में ज़हर घोल.  
आकाश-दिशाएँ धुआँ-धुआँ, भूगर्भों तक गहरे खखोल.

बेचारे पशुपक्षी निरीह,वंचित,अशऱण हो गए दीन,  
आतंक मनुज का छाया जड़-चेतन मलीन औ'शान्तिहीन.  
अब तो इतना चढ़ गया, आदमी हुआ आदमी का बैरी 
अपने विनाश का कारक ही बन बैठा चालें चल गहरी.

भृकुटी टेढ़ी हो गई क्रोध से भरी नियति ने कहा कि ले,
अब तक तू ही तू था, अब पापों का प्रायश्चित भी कर ले.
बेबस ,निरीह, अपनी दुविधाओं में डूबा रह भीत-त्रस्त, 
तू नेपथ्यों में रह जा कर,यह विश्व हो सके पुनः स्वस्थ.

रे घोर पातकी, तेरे पापों ने जो दूषण फैलाया है
उसके निस्तारण हेतु नियति ने निर्णय यह बतलाया है.
अपने जीवन का समाधान अब तो तुझ पर ही है निर्भर  , 
संयत-संयम धर और सुधर या घिसट एड़ियाँ  घिस-घिस कर.

सब कुछ पाकर भी चूक गया  सब किया धरा हो गया वृथा
मानव की यह विकास गाथा ,या कहें पतन की महाकथा .
इस काल-चक्र के घूर्णन में, नव-उदय विकास समापन दे,
अविराम कथाएँ रचती रहती नियति नटी अपने क्रम से .
*
- प्रतिभा सक्सेना.

बुधवार, 29 अप्रैल 2020

कितने जन्म..

*
मैं उतने जन्म धरूँ तेरी गोदी में ,
तुम बिन बीतें जितनी सुबहें-संध्यायें ........'
उच्छल लहरों में खिलखिल हँसता रह तू
इन साँसों का सरगम तुझको ही गाए,

जाना आसान नहीं है दूर कहीं भी ,
मैं रहूँ कहीं भी लौट-लौट आऊँगी,
तेरे पावन दर्शन का संबल पा कर ,
खारे जल से कलुषों को धो जाऊँगी.

 सम्मोहन से मन बाहर कब आ पाया ,
मृगतृष्णाओँ से प्यास बुझी कब कोई,
इस मानस में जो गहरे उतर समाए  ,
उन सपनों की भी थाह नहीं है कोई 

तू एक प्रेरणा है इस अंतर्मन की,
जो सदा जगाती रही भटकते मन को.
तेरा निरभ्र नभ प्रतिबिंबित प्राणों में
आश्वस्ति सतत देता अतृप्त जीवन को.

श्यामला धरा के हरे-भरे आँचल में
नाचो, मदमस्त धान की बालों नाचो
चिरतृप्ति समेटे अपनी उर्वरता में 
जीवन के अणु-अणु को करुणा से पागो !
*