बुधवार, 19 अप्रैल 2017

देवनागरी -

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ब्राह्मी से उद्भव ले विकसे जो देवनागरी के आखऱ, 
अक्षर अक्षरशः सार्थक हैं, पीढ़ी-पीढ़ी का वैभव भर. 
यह परम-ज्ञान संचय की लिपि, रच आदि-काव्य गरिमा मंडित.
ऋषि-मुनियों की संस्कृति संचित, हो विश्व निरामय संकल्पित.

मानव वाणी का यह चित्रण, धारे सारे स्वर औ'व्यंजन , 

अवयव सम्मत यह वर्गकरण, लघु-दीर्घ मात्राओं के सँग
स्वर-व्यंजन सब की अपनी गति,अनुस्वार विसर्ग करें मंडन 
कितने प्रयास-कौशल से हो पाया होगा ध्वनि का अंकन

इसमें न कहीं कोई संभ्रम, समरूप पठन हो या लेखन ..

ले घोष-अघोष सभी ध्वनियाँ ,संवृत औ' विवृता स्थितियाँ ,
क्रमबद्ध वाक् का विश्लेषण ,अविकृत स्वरमाला का गुंथन , 
मानव-मुख निस्सृत जैसी ध्वनि, उसके ही नाम वही प्रतिध्वनि.

लिपि देह, मनस् है शब्द-बोध दर्पणवत् निर्मल प्रतिबिंबित , 

पंचम स्वर नासिक-ध्वनि सम्मित करता गुंजन से अभिमंत्रित 
गहरे चिन्तन अनुभावन से ,ध्वन्यात्मक अक्षर-माल ग्रथित. 
एकाग्र-चित्त हो रच डाली निर्मला गिरा आराधन हित .

वाणी के किसी तपस्वी ने  ये दिये मंत्र जैसे उचार 
आरोहण-अवरोहण क्रम से,इन बावन वर्णों को सँवार
कितनी संगत,संयत,अविकृत,सुरचित,तार्किक ध्वनि-संयोजित. 
परिपूर्ण सहज,सुगठित लिपि,मानव-मेधा की अनुपम परिणति

भारति की मानस-वीणा से निस्सृत,अंबर में गये बिखर

चुन-चुन कर लिपि में समा लिये जिज्ञासु साधकों ने ,वे स्वर
ये देवगिरा, ये वज्राक्षर , भारती संस्कृति-धर अगाध 
बोधित शब्दों के सार्थवाह, निर्बाध निरंतर हो प्रवाह,!
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शनिवार, 8 अप्रैल 2017

बुद्ध या प्रबुद्ध -


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स्त्रियाँ भी रोग झेलती हैं ,
बूढ़ी होती , मर जाती हैं .
कुछ नहीं कहतीं;
सब की सुख-सुविधा 
का दायित्व निभाते ,
एक दिन ,
चुपचाप संसार से बिदा हो जाती हैं.
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सुहागिन मरी:बड़े भागोंवाली थी,
(क्वाँरी के भागों सुहागिन मरती है न!)
विधवा मरी: चलो छुट्टी हुई. 
कुँवारी मरी: अरे ,एक बोझ हटा सिर से .
होली के माँगनेवाले असीसते आते -
'होली-होली इटियाँ ,मरें तुम्हारी बिटियाँ.'
(और अगली लाइन  में).'.. जियें तुम्हारे पूत-भतार' 
 लकड़ी,पैसा पाते हँसते -
अरे हाँ ,औरत की क्या बिसात!
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और पुरुष ?
अपने पर बन आती जब,
घबरा कर भाग निकलता 
आत्म-संवेदन विगलित,
सारे संबंध-अनुबंध तोड़,
मुक्ति खोजता अपनी. 
कोई अपराध-बोध नहीं सालता -
बुद्ध हो या प्रबुद्ध !
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