बुधवार, 29 अप्रैल 2020

कितने जन्म..

*
मैं उतने जन्म धरूँ तेरी गोदी में ,
तुम बिन बीतें जितनी सुबहें-संध्यायें ........'
उच्छल लहरों में खिलखिल हँसता रह तू
इन साँसों का सरगम तुझको ही गाए,

जाना आसान नहीं है दूर कहीं भी ,
मैं रहूँ कहीं भी लौट-लौट आऊँगी,
तेरे पावन दर्शन का संबल पा कर ,
खारे जल से कलुषों को धो जाऊँगी.

 सम्मोहन से मन बाहर कब आ पाया ,
मृगतृष्णाओँ से प्यास बुझी कब कोई,
इस मानस में जो गहरे उतर समाए  ,
उन सपनों की भी थाह नहीं है कोई 

तू एक प्रेरणा है इस अंतर्मन की,
जो सदा जगाती रही भटकते मन को.
तेरा निरभ्र नभ प्रतिबिंबित प्राणों में
आश्वस्ति सतत देता अतृप्त जीवन को.

श्यामला धरा के हरे-भरे आँचल में
नाचो, मदमस्त धान की बालों नाचो
चिरतृप्ति समेटे अपनी उर्वरता में 
जीवन के अणु-अणु को करुणा से पागो !
*

शनिवार, 18 अप्रैल 2020

अरी गिलहरी -

*
अरी भाग मत,रुक जा पल भर कर ले हमसे बात, गिलहरी . 

बना पूंछ को अपनी कुर्सी पीपल छैंया बैठ दुपहरी .

धारीदार कोट फ़रवाला किससे नपवा कर सिलवाया ,
ये दमदार ,निराला कपड़ा कौन जुलाहे से बुनवाया 
सजा दिया है बड़ी दिज़ाइनदार और झबरीली दुम से
हमको नाम बता दो जिसने यों पहनाया नेह  जतन से 
सुन्दर भूरे श्यामल तन पर कितनी प्यारी  रेख रुपहरी .

साफ़ और सुथरा रख  हरदम झाड़-पोंछ कैसे कर पाती,
चिट्चिट् चिट्चिट् करती करती झट नौ-दो-ग्यारह हो जातीं 
चना-चबेना ,कंद-मूल तुझको मिल जाता है सब कुछ तो 
 डाली की अधपकी दशहरी कुतर-कुतर कर गिरा रही क्यों,
बिना संतुलन खोये दुम को खूब नचाती  देह छरहरी.

लंका तक का पुल-रचने में तूने भी तो किया बहुत श्रम ,
तुझे सराहा स्वयं राम ने हाथ पीठ पर फेरा जिस क्षण 
अंगुली की वह छुअन खींचती गई वहाँ रेखाएँ चमचम.
कितना शोभित तब से ही हो गया तुम्हारा नन्हा सा तन
प्यारी सी ,न्यारी सी गिल्लो, जग जाती तू बड़ी सुबह री .

इतनी झब्बेदार पूंछ के साथ,बड़ी तू प्यारी लगती .
 बैठी हो तो भोली-भाली बड़े सलीकेवाली लगती
कैसे आहट पा जाती है  बड़े चाव से आते जब हम  
सरसर चढ जाती ऊँची शाखों पर दौड़ लगाती हरदम,
हाथों में ले बड़े ठाठ से खाती दाना और फलहरी.

*

बुधवार, 15 अप्रैल 2020

दिगम्बरी.

कोई तोहमत जड़ दो औरत पर ,
कौन है रोकनेवाला ?
कर दो चरित्र हत्या ,
या धर दो कोई आरोप !
सब मान लेंगे .
बहुत आसान है  रास्ते से हटाना.
*
हाँ ,वे दौड़ा रहे हैं सड़क पर
'टोनही है यह ',
'नज़र गड़ा चूस लेती है बच्चों का ख़ून!'
उछल-उछल कर पत्थर फेंकते ,
चीख़ते ,पीछे भाग रहे हैं ,
खेल रहे हैं अपना खेल !
अकेली औरत ,चीख रही है 
भागेगी कहाँ भीड़ से ?
चोटों से छलकता खून
प्यासे हैं लोग .

सहने की सीमा पार ,
जिजीविषा भभक उठी खा-खा कर वार !
भागी नहीं ,चीखी नहीं ,
धिक्कार भरी दृष्टि डालती
सीधी खड़ी हो गई.
मुख तमतमाया क्रोध-विकृत !
आँखें जल उठीं दप्-दप् ,
लौट पड़ी वह !
नीचे झुकी, उठा लिया वही पत्थर
आघात जिसका उछाल रहा था रक्त.
भरी आक्रोश
तान कर मारा पीछा करतों पर .
'हाय रे ',चीत्कार उठा ,
'मार डाला रे !'
भीड़ हतबुद्ध, भयभीत .
और  वह दूसरा पत्थर उठाये दौड़ी.

अब पीछा वह कर रही थी ,
भाग रही थी भीड़ .
फिर फेंका उसने ,घुमा कर पूरे वेग से !
फिर चीख उठी .
उठाया एक और 
भयभीत, भाग रहे हैं लोग .
कर रही है पीछा,
अट्टहास करते हुये
प्रचंड चंडिका .

धज्जियां कर डालीं थीं वस्त्रों की
उन लोगों ने ,
नारी-तन बेग़ैरत करने को .
सारी लज्जा दे मारी उन्हीं पर !
पशुओं से क्या लाज ?
ये बातें अब बे-मानी थीं .
दौड़ रही है ,निर्भय उनके पीछे ,हाथ में पत्थर लिये.
जान लेकर भाग रहे हैं लोग ,
भीत ,त्रस्त ,
सब के सब ,एक साथ गिरते-पड़ते ,
अंधाधुंध इधर-उधर .
तितर-बितर .

थूक दिया उसने 
उन कायरों की पीठ पर !
और -
श्लथ ,वेदना - विकृत,
रक्त ओढ़े दिगंबरी ,
बैठ गई वहीं धरती पर .
पता नहीं कितनी देर .
फिर उठी , चल दी एक ओर .

अगले दिन खोज पड़ी
कहां गई चण्डी ?
कहाँ गायब हो गई?
पूछ रहे थे एक दूसरे से ।
कहीं नहीं थी वह !
उधर कुएँ में उतरा आया था मृत शरीर .

दिगंबरा चण्डी को वहन कर सके जो
वहां कोई शिव नहीं था ,
सब शव थे !
*
[एक मनोरंजन: एक कौतुक !
स्त्री के नाक-कान काटते वीरों की जय-जयकार !
 साल दर साल मंचन ,रक्त बहते तन की  भयंकर पीड़ा से  रोमांचित  भीड़ !
मानी हुई बात  -औरत है, अवगुन आठ सदा उर रहहीं -सतत ताड़ना की अधिकारी !
शताब्दियाँ साक्षी हैं इस लीला की !]


शुक्रवार, 10 अप्रैल 2020

देखो न -

 देखो न -
अंततः इन जीवों को पता चल गया 
विस्तृत पटल पर उनका भी पूरा हिस्सा है ,
धरती की नियामतों में,  
वे बराबर के भागीदार हैं.
इस इन्सान ने ,
छीन लिया है,बरजोरी से जो,
अधीन समझ कर सबको.
जो बदल डालना चाहता है ,
सृष्टि के नियम .

 लो,
एक झटका दे, स्वंतत्र हो गए वे.
धरती मुक्त,वायु निर्मल, दर्पण सा जल, 
दिशाएँ दीप्त और गगन उज्ज्वल,
चाँद-तारे खिल उठे .
वनस्पतियाँ लहर-लहर गुनगुनाईं .
अरसे बाद विश्व स्वास्थ लाभ करने लगा . 

पर अब इन्सान क्या करे?
कैसे बचे,
जाए, तो जाए कहाँ ?
भयभीत ,भाग कर
दुबक गया अपनी ही खोह में ,
बन्दीखाने में पड़ा ,
लाचार छटपटा रहा है.

नहीं, अब नहीं!
बदलेगा खुद को,
बदलना पड़ेगा.
सही कहा है -
भय बिन होय न प्रीत!
- प्रतिभा.