बुधवार, 29 अप्रैल 2020

कितने जन्म..

*
मैं उतने जन्म धरूँ तेरी गोदी में ,
तुम बिन बीतें जितनी सुबहें-संध्यायें ........'
उच्छल लहरों में खिलखिल हँसता रह तू
इन साँसों का सरगम तुझको ही गाए,

जाना आसान नहीं है दूर कहीं भी ,
मैं रहूँ कहीं भी लौट-लौट आऊँगी,
तेरे पावन दर्शन का संबल पा कर ,
खारे जल से कलुषों को धो जाऊँगी.

 सम्मोहन से मन बाहर कब आ पाया ,
मृगतृष्णाओँ से प्यास बुझी कब कोई,
इस मानस में जो गहरे उतर समाए  ,
उन सपनों की भी थाह नहीं है कोई 

तू एक प्रेरणा है इस अंतर्मन की,
जो सदा जगाती रही भटकते मन को.
तेरा निरभ्र नभ प्रतिबिंबित प्राणों में
आश्वस्ति सतत देता अतृप्त जीवन को.

श्यामला धरा के हरे-भरे आँचल में
नाचो, मदमस्त धान की बालों नाचो
चिरतृप्ति समेटे अपनी उर्वरता में 
जीवन के अणु-अणु को करुणा से पागो !
*

12 टिप्‍पणियां:

  1. वाह निर्जीव से होते समय का सजीव सृजन

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  2. सादर नमस्कार,

    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा शुक्रवार (01-05-2020) को "तरस रहा है मन फूलों की नई गंध पाने को " (चर्चा अंक-3688) पर भी होगी। आप भी
    सादर आमंत्रित है ।

    "मीना भारद्वाज"

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  3. बहुत ही प्रेरक और भावपूर्ण, प्रतिभा जी।

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  4. आत्मबोध के सूक्ष्म तत्त्वों का अन्वेषण करती विचारणीय अभिव्यक्ति।

    जीवन की गति आरोह-अवरोह के साथ अपनी लय में निबद्ध रहती है।

    सुंदर सृजन।

    बधाई एवं शुभकामनाएँ

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  5. सपने देखते रहेंगे तो आशा और इच्छा बलवती रहेगी ...
    और एक दिल इन माटी के पावन चरणों में जीवन मिल जाएगा ... बहुत ही सुन्दर सृजन ...

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  6. सील को छूती सुंदर रचना, प्रतिभा दी।

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  7. I am really happy to say it’s an interesting post to read APJ Abdul Kalam Quotes in Hindi this is a really awesome and i hope in future you will share information like this with us

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  8. सम्मोहित करती रचना .... रचयिता भी ।

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  9. जाना आसान नहीं है दूर कहीं भी ,
    मैं रहूँ कहीं भी लौट-लौट आऊँगी,
    तेरे पावन दर्शन का संबल पा कर ,
    खारे जल से कलुषों को धो जाऊँगी.

    सम्मोहन से मन बाहर कब आ पाया ,
    मृगतृष्णाओँ से प्यास बुझी कब कोई,
    इस मानस में जो गहरे उतर समाए ,
    उन सपनों की भी थाह नहीं है कोई

    बहुत ही सुन्दर रचना ,मन को भा गई , आप बहुत ही अच्छा लिखती हैं ,आपकी लेखनी को सादर नमन

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