शुक्रवार, 28 नवंबर 2014

गौरा का सुहाग.

*
 गौरा बिदा हुई चललीं  , धूम भइ तिहुँ खण्डा ,
नैना भरे माई दिहिले, सुहाग भरि- भरि हंडा.
फैली खबर, सब हरषीं ,मेहरियाँ दौरि  परलीं,
गौरा के चरनन लगि-लगि ,सुहाग जाँचन$ लगलीं !
*
खेतन ते भागीं, पनघट से भगि आईं, घाटन से दौरी  धुबिनियाँ,
गोरस बहिल, ऐसी लुढ़की मटकिया तौ हूँ न रुकली बवरिया.
दौरी भड़भूँजी, मालिन, कुम्हारिन ,बढ़नी उछारि  कामवारी,
गौरा लुटाइन सुहाग दोउ हाथन, लूटैं जगत के नारी !
 *
 ऊँची अटारिन खबर भइली,   साज साजै लागीं घरनियाँ,
करिके सिंगार,घर-आँगन अगोरे तक,बचली फकत एक हँडिया.
चुटकी भरि गौरा उनहिन को दिहला, 'एतना रे भाग तुम्हारा,
दौरि-दौरि लूटि-लूटि लै गईं लुगइयाँ, जिनके सिंगार न पटारा !
*
' एही चुटकिया जनम भर सहेजो, मँहगा सुहाग का सिंदुरवा.
तन-मन में पूरो, अइसल सँवारो रंग जाये सारी उमरिया !'
गिनती की चुरियाँ,बिछिया,महावर,सिंदुरा,सहेजें कुलीना ,
गौरा की किरपा कमहारिन पे तिनको सुहाग नित नवीना!
*
भुरजी, कुम्हरिन ते माँगे #दुआरे जाइ , आँचल पसारि गुहरावें ,
मंगल बियाह-काज इन बिन न पुरवै, कन्या सुहाग-भाग पावे .
 गौरा का सेंदुर अजर-अमर भइला, उन जइस को बड़भागिन रे,
इनही से पाये सुहाग-सुख-दूध-पूत, तीनिउँ जगत की वासिन रे !
*
( $ जाँचन= याचना करना ,माँगना .
# यह  एक रिवाज़ है कि विवाह से पहले स्त्रियाँ सुहाग की याचना करने भड़भूँजिन , कुम्हरिन आदि के पास जाती हैं , वही कन्या को चढ़ाया जाता है .). 
*

बुधवार, 12 नवंबर 2014

नचारी - गौरा की बिदाई .

*
तोरा दुलहा जगत से निराला उमा, मैना कहिलीं,
कुल ना कुटुम्व, मैया बाबा, हम अब लौं चुप रहिलीं !
कोहबर्# से निकसे न दुलहा ,बरस कुल बीत गइला !
सिगरी बरात टिक रहिली  बियाही जब से गौरा.
*
रीत व्योहार न जाने बसन तन ना पहिरे ,
अद्भुत उमा सारे लच्छन, तू कइस पतियानी रे !
भूत औ परेत बराती, सब हि का अचरज होइला,
भोजन पचास मन चाबैं तओ भूखेइ रहिला !

*
रीत गइला पूरा खजाना कहाँ से खरचें बहिना ,
दिन-गिन  बरस बितावा परिल कब लौं  सहना ?
पारवती सुनि सकुची, संभु से बोलिल बा -
 केतिक दिवस बीत गइले , बिदा ना करबाइल का ?

*
सारी जमात टिक गइली, सरम कुछू लागत ना ,
 अद्भुत बरात रे जमाई, हँसत बहिनी,- जीजा !
हँसे संभु, चलु गौरा  बिदा लै आवहु ना ,
सिगरी बरात, भाँग, डमरू समेट अब, जाइत बा !

*
गौरा चली ससुरारै, माई ते लपिटानी रे
केले के पातन लपेटी बिदा कर दीनी रे !
फूल-पात ओढ़िल भवानी ,लपेटे शिव बाघंबर ,
अद्भुत - अनूपम जोड़ी, चढ़े चलि बसहा पर !
*

(# कोहबर - नव-दंपति का क्रीड़ागृह )

सोमवार, 27 अक्तूबर 2014

सुरभि -चन्दना

 *
ओ, सुरभि -चन्दना,
उल्लास की लहर सी
आ गई तू !
*
 
मेरे मौन पड़े प्रहरों को मुखर करने ,
दूध के टूटे दाँतों के अंतराल से अनायास झरती
हँसी की उजास बिखेरती ,
सुरभि-चन्दना ,

                                                       
परी- सी , आ गई तू !
*
देख रही थी मैं खिड़की से बाहर -
तप्त ,रिक्त आकाश को ,
शीतल पुरवा के झोंके सी छा गई तू ,

सरस फुहार -सी झरने!
उत्सुक चितवन ले ,
आ गई तू !

*
 चुप पड़े कमरे बोल उठे ,
अँगड़ाई ले जाग उठे कोने ,
खिड़कियाँ कौतुक से विहँस उठीं ,
कौतूहल भरे दरवाज़े झाँकने लगे अन्दर की ओर ,
ताज़गी भरी साँसें डोल गईं सारे घर में .
आ गई तू !
*
 
सहज स्नेह का विश्वास ले ,
मुझे गौरवान्वित करने !
इस शान्त -प्रहर में ,
उज्ज्वल रेखाओं की राँगोली रचने ,
रीते आँगन में !
उत्सव की गंध समाये,
अपने आप चलकर ,
आ गई तू !
 

*
ओ सुरभि-चन्दना, परी सी 
आ गई तू !

(रिटायरमेंट के बाद लिखी गई थी)

सोमवार, 20 अक्तूबर 2014

धनवंतरि- वंदना एवं अभिनन्दन!


(धन-तेरस  के शुभ-दिवस हेतु  मेरी मित्र  'शार्दुला नोगजा ' ने यह सुन्दर 'धनवंतरि-वंदना ' प्रेषित की है ,ये कल्याणकारी भावनाएँ मेरे सभी मित्र एवं परिजन  आत्मस्थ कर सकें , इसलिए यहाँ  प्रस्तुत कर रही हूँ.
मैं आभारी हूँ  प्रिय शार्दुला की,   इन मंगलमय-वचनों  के लिए - )

*
धनवंतरि, वंदन अभिनन्दन
दैनन्दिन जीवन में नित हम 
पाएं आशातीत पराक्रम 
खिलती रहे हर्ष की बगिया 
मिलती रहे सफलता अनुपम 

चिंतन में सच्चिदानन्द का 
महक उठे चन्दन ही चन्दन 
धनवंतरि, वंदन अभिनन्दन!

हम निश्छल हों, रहें निरामय 
हमें बना दो निर्मल निर्भय 
न्याय नीति स्थापित कर जग में 
दूर करें जन-जन का संशय 

उपकारों का नेह बहा कर 
हरें दीन दुखियों का क्रंदन 
धनवंतरि, वंदन अभिनन्दन 

स्वस्थ रहे हम, करो अनुग्रह 
भार न बनने पाये दुर्वह 
रोम-रोम में रहे हमारे 
अंतहीन उर्जा का संग्रह 

हमें लक्ष्य के इस जय-पथ में 
दीर्घ आयु का दो अवलम्बन 
धनवंतरी वंदन अभिनन्दन!
*
( बचपन में  किसी अखबार से उतारी थी ये प्रार्थना। लेखक का नाम नहीं उतारा था. हर साल आरती की तरह इसे ही गाते हैं! - शार्दुला नोगजा )
*
श्री  धनवंतरि-वंदन के अनंतर
 आप सब को अर्पित हैं ज्योतिपर्व की मंगल-कामनाएँ -
*
रोशनी के जाल यों बुने ,
किरन-तंतु कात कर  शिखा ,
ओढ़नी उजास की बने ,
श्याम-देहिनी महानिशा !
*
वायु-जल सुस्निग्ध-स्वस्थ हों,
करे अष्ट-लक्ष्मि  अवतरण !
खील-सी बिखर चले हँसी ,
शुभ्र फेनि* सा हरेक मन !

(*बताशफेनी)
*
दीपावली का पर्व मंगलमय हो !
 - प्रतिभा सक्सेना
*
 (चित्र - गूगल से साभार)




रविवार, 12 अक्तूबर 2014

पहला दीप -

*
मेरे बच्चों, दीवाली का पहला दीप वहाँ धर आना...

*
जिस घर से कोई निकला हो अपने सिर पर कफ़न बाँधकर ,
सुख-सुविधा, घर-द्वार छोड़ कर मातृभूमि के आवाहन पर .
बच्चों, उसके घर जा कर तुम उन सबकी भी सुध ले लेना
खील-बताशे लाने वाला कोई है क्या उनके भी घर.
अपने साथ उन्हें भी थोड़ी ,इस दिन तो खुशियाँ दे आना .
*
छाँह पिता की छिनी सिरों से जिनकी, सिर्फ़ हमारे कारण 
हम सब रहें सुरक्षित .जो बलिदान कर गए अपना जीवन
बूढ़े माता-पिता विवश से , आदर सहित चरण छू लेना,
अपने साथ हँसाना ,भर देना उनके मन का सूनापन ,
आदर-मान और अपनापन दे कर उनका आशिष पाना !
*
दीवाली की धूम-धाम से अलग न वे रह जायँ अकेले ,
तुम सुख-शान्ति पा सको, इसीलिए तो उनने यह दुख झेले.
उन सबका जीवन खो बैठा धूम-धाम फुलझड़ी पटाखे ,
रह न जायँ वे अलग -थलग जब लगें पर्व-तिथियों के मेले.
उनकी जगह अगर तुम होते, यही सोच सद्भाव दिखाना .
 *
हम निचिंत हो पनप सके वे मातृभूमि की खाद बन  गये ,
रक्त-धार से सींची माटी  ,सीने पर ले घाव सो गए  .
वह उदास नारी, जिसके माथे का सूरज अस्त हो गया ,
तुम क्या दे पाओगे ,जिसके आगत सभी विहान  खो गए !
उसने तो दे दिया सभी कुछ, अब तुम उसकी आन निभाना.
*
अपने जैसा ही समझो, उन का मुरझाया जो बेबस  मन ,
देखो ,बिना दुलार -प्यार के बीत न जाए कोई बचपन .
न्यायोचित व्यवहार यही है- उनका हिस्सा मिले उन्हें ही ,
वे जीवन्त प्रमाण रख गए, साधी कठिन काल की थ्योरम
अपनी ही सामर्थ्यों से, बच्चों तुम 'इतिसिद्धम्' लिख जाना !
*
थ्योरम = Theorem.,प्रमेय .

शुक्रवार, 3 अक्तूबर 2014

कुँआरी नदी (समापन).

*
गूँजी आकुल टेर शोण की , सुन  हियरा काँपे
चौंके सारे अपन-पराये,  भागे   घबरा के ,
माँ की ममता लहर-लहर कर परसे अँसुअन साथ
मैखल पितु का हिरदा दरके कइसन धी रुकि जाय!
2
जुहिला रोवे ,सोनवा पुकारे तोरे पड़ें हम पाँय !
रेवा तो  सन्यास लिये, प्रण है - ना करूँ विवाह
 पंडित-पुरोहित पहाड़न से जम ,रोकन चहैं बहाव
बिखर सहस धारा बन छूटी अब कह कौन उपाय!
3
 राहों में पड़ गय बीहड़ बन माली और कहार ,
 नाऊ बारी ,अड़ते टीले, देखे आर न पार .
 हठ कर समा गई  तुरतै ही  गहरा भेड़ा घाट,
ताप हिया में ,नयनों में जल धुआँ-धुआँ,आकाश !(धुआँधार)
4
दासी-दास बियाकुल रोवैं झुक-झुक देवें धोक
वा को कुछू ना भाय. नरमदा ,कहीं न माने रोक
और अचानक अगले डग पर आया तल  गहवार
घहराकर नरमदा हहरती जा कूदी अनिवार
5.
वेग धायड़ी कुंड मथे हो खंड-खंड चट्टान ,
रगड़  प्रचंड कठिन  पाहन घिस  हुइ गए शालिगराम
केऊ की बात न कान सुनावे ,केऊ क मुँह ना लगाय
भाई-बहिना  फिर-फिर  टेरें रेवा ना सनकाय.
6.
दिसा दिसा की लगी टक-टकी थर-थर कँपै अकास
चित्र-लिखे   तरु-बीरुध ठाड़े पवन न खींचे साँस.
मारग कठिन ,अगम चट्टानें वा को कछु न लखाय
धरती पर जलधार बहाती रेवा बढ़ती जाय !
7.
उधर शोण अनुताप झेलता चलता रहा विकल चित,
व्यक्त कभी हो जाता बरसातों की उमड़न के मिस
 पार हुए  पच्चीस कोस , यों लगा बहुत चल आया ,
 गंगा को अर्पित कर दी तब गुण-दोषों मय काया
8.
 सुना नर्मदा ने ,पर उर  की पीड़ा किसे सुनाए ,
कोई ठौर विराम न पाये  जो थोड़ा थम जाए .
 व्रत ले लिया, निभाना होता नहीं सदा आसान,
 अँधियारे आदिम वन , मारग बीहड़ औ'सुनसान .
9.
जीव जगत की साँसों की धुन छा जाती  इकसार,
झिल्ली की झन्-झन् का बजने लगता जब इकतार ,
 प्रकृति   नींद में डूबी  ,  औँघा जाती सभी दिशाएँ
 करुण रुदन के स्वर सुन थहरा जातीं स्तब्ध निशाएँ !

10.
कुछ अधनींदे राही ,सुन लेते हलकी सी सिसकी ,
लगता जैसे  रुकी पड़ी है कहीं कंठ में हिचकी.
किसे सौंप दे जल कि अपावन पड़े न कोई छाया.
रेवा रही खोजती ऐसी दिव्य पुनीतम काया !
11.
पिता गरल पायी, वह भी पी गई सभी कड़ुआहट ,
इस जग के जीवन के पथ में है  कौन, न हो जो आहत?
कितना लंबा मार्ग और जीवन की उलझी रेखा,
पार किया आ गई  नर्मदा, ले कर अपना लेखा !
12.
भृगु कच्छ तीर्थ सीमान्त ,

वहीं पितृ-चरणों में झुक गई क्लान्त .
पा सोमनाथ की नेह दृष्टि सोमोद्भव रेवा हुई  शान्त.
पग-पग कर कल्याण, जगत हित करती आई धन्या
उस निर्वाण-प्रहर में सिन्धु बन गई पर्वत-कन्या !
*
प्रणाम -

 विपुल पश्चाताप में आश्वस्ति तुम प्रयश्चितों सी ,
तुम्हीं शुभ आवृत्ति अंतर्भावना के धारकों सी!
तुम सतत सौन्दर्य के लिपि-अंकनों से पूर क्षिति को,
 शाप-ताप विनाशिनी मम वाक् पर आशीष बरसो1

*
 आदि मकरारूढ़ जीवन-जलधि की तुम दिव्य-कन्या,
शुभ्रता की राशि , कलुष निवारिणी तुम ही अनन्या ,

लो अशेष प्रणाम ,मन-वच-कर्म की सन्निधि तुम्हीं हो,
प्रलय में भी लय न, चिद्रूपे  ,सतत ऊर्जस्विनी हो !

*

सोमवार, 29 सितंबर 2014

हिसाब-किताब.


(यह कविता मुझे ई-मेल से प्राप्त हुई  जिसके  ,मूल प्रेषक   raviwarsha@gmail.com 9822329340 है - रचयिता को धन्यवाद देते हुए मैं इसे यहाँ प्रस्तुत कर रही हूँ ,जिससे कि सभी लोग इसका आनन्द उठा सकें - )
 
*
पढ़ सके न खुद,  किताब मांग रहे है,खुद रख न पाए, वे हिसाब मांग रहे है।
जो कर सके न साठ साल में कोई विकास देश का, वे सौ दिनों में जवाब मांग रहे है।
आज गधे गुलाब मांग रहे है, चोर लुटेरे इन्साफ मांग रहे है।
जो लूटते रहे देश को 60 सालों तक,सुना है आज वो 1OO दिन का हिसाब मांग रहे है?जब 3 महीनो में पेट्रोल की कीमते 7 रुपये तक कम हो जाये,जब 3 महीनो में डॉलर 68 से 60 हो जाये,जब 3 महीनो में सब्जियों की कीमतें कम हो जाये,जब 3 महीनो में सिलिंडर की कीमते कम हो जाये,जब 3 महीनो में बुलेट ट्रैन भारत में चलाये जाने को सरकार की हरी झंडी मिल जाये,जब 3 महीनो में सभी सरकारी कर्मचारी समय पर ऑफिस पहुँचने लग जाये,जब 3 महीनो में काले धन वापसी पर कमिटी बन जाये,जब 3 महीनो में पाकिस्तान को एक करारा जवाब दे दिया जाए,जब 3 महीनो में भारत के सभी पडोसी मुल्को से रिश्ते सुधरने लग जाये,जब 3 महीनो में हमारी हिन्दू नगरी काशी को स्मार्ट सिटी बनाने जैसा प्रोजेक्ट पास हो जाये,जब 3 महीनो में विकास दर 2 साल में सबसे ज्यादा हो जाये,जब हर गरीबो के उठान के लिए जन धन योजना पास हो जाये.
जब इराक से हजारो भारतीयों को सही सलामत वतन वापसी हो जाये!
तो भाई अच्छे दिन कैसे नहीं आये???वो रस्सी आज भी संग्रहालय में है, जिससे गांधी बकरी बांधा करते थे
किन्तु वो रस्सी कहां है जिस पे भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु हँसते हुए झूले थे?हालात-ए-मुल्क देख के रोया न गया,कोशिश तो की पर मुँह ढक के सोया न गया
देश मेरा क्या बाजार हो गया है ...
पकड़ता हूँ तिरंगा तो लोग पूछते है कितने का है...
वर्षों बाद एक नेता को माँ गंगा की आरती करते देखा है,वरना अब तक एक परिवार की समाधियों पर फूल चढ़ते देखा है।  
वर्षों बाद एक नेता को अपनी मातृभाषा में बोलते देखा है,वरना अब तक रटी रटाई अंग्रेजी बोलते देखा है।
वर्षों बाद एक नेता को Statue Of Unity बनाते देखा है,वरना अब तक एक परिवार की मूर्तियां बनते देखा है।
वर्षों बाद एक नेता को संसद की माटी चूमते देखा है,वरना अब तक इटैलियन सैंडिल चाटते देखा है।
वर्षों बाद एक नेता को देश के लिए रोते देखा है,वरना अब तक "मेरे पति को मार दिया" कह कर वोटों की भीख मांगते देखा है।
पाकिस्तान को घबराते देखा है,अमेरिका को झुकते देखा है।
इतने वर्षों बाद भारत माँ को खुलकर मुस्कुराते देखा है।
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दोस्तों हर हिंदुस्तानी सेे शेयर करे
Proud to be a Good Indian

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सौजन्य से -


Cdr Ravindra Waman Pathak I.N. (Retd)      
Member Governing Body and Pension Cell
Indian Ex Servicemen Movement
1 Surashri,1146 Lakaki Road
Shivajinagar 
Pune 411016
raviwarsha@gmail.com
9822329340

गुरुवार, 25 सितंबर 2014

कुँआरी नदी - 4 .

1
कहाँ रही जुहिला ?
हेर हेर पथ थकी नर्मदा, पखवाड़ा बीता,
भूख-प्यास बिसराई सारा स्वाद हुआ तीता .
फिर न रुक सकी ,उठ कर चल दी बिना साज-सिंगारे ,
कुछ अनहोनी हुई न  हो - कैसे धीरज धारे .
2
पग अटपट पड़ रहे ,वेग से भर आई छाती .
जयसिंह पुर तक जा पहुँची वह पल-पल अकुलाती .
निकला बरहा ग्राम ,अरे वह, आया दशरथ घाट,
लहराता है दूर-दूर तक कितना चौड़ा पाट!
3
शोण भद्र के बाम पार्श्व में जुहिला की धारा 
समा गई थी वहीं , हहरता फेन भरा सारा .
चूड़ियन की कुछ टूट ,वस्त्र से झरे सुनहरे कण
 अपने सभी प्रसाधन वह पहचान गई तत्क्षण.
4
शैवालों में जा अटका था रेशम का फुँदना .
चोली के डोरी-बंधन में  सजता था कितना!
अरी जोहिला ,आई थी देने  मेरी पाती
ओह, समझ आया सब-कुछ. निकली कैसी घाती!
5
अरी, स्वयं-दूतिका, निलज्जा और शोण तुम भी ..
खोया संयम धीरज तुमने ,तोड़ दिया प्रण भी?
अब किसका विश्वास ,नहीं कोई जग में अपना,
जीवन भर की आस  भग्न हो गई कि ज्यों सपना!
6
प्रेम भरे हिय पर मारा , कैसा निर्मम  धक्का,
क्षार हुआ माधुर्य ,विराग जमा हो कर पक्का.
वह जो थी वह रही, शोण ,पर मुझे दुख  तुम पर-
समझे बैठी थी समर्थ  वचनों का पक्का नर !
7.
यह  संसार व्यर्थ सारा ,बेकार सभी नाते ,
प्रेम एक  धोखा ,शपथें हैं जिह्वा की घातें !
चलो जहाँ ,कोई न सखा , कोई न मिले  अपना
मन अब शान्ति खोजता केवल, बस एकान्त घना .
 8 .
पूरब दिशि से मोड़ लिया मुख ,घूम गई पच्छिम,
उसी बिन्दु से लौट पड़ी, आहत रेवा तत्क्षण .
जुहिला का सच जान, शोण को  भारी पछतावा ,
 दुःख-ग्लानि से पूर हृदय में समा गई चिन्ता .
 9 .
 पलट चली  रेवा घहरा कर शोण पुकार उठा -
' रुक जा री रेवा !
रूक जा रेवा , मत जा , मुझसे  दूर कहीं मत जा!
मेरी प्रीत पुकारे रेवा ,मुझसे रूठ  न जा!!
10 .
बालापन का नेह, बिसर पायेगा नहीं हिया.
बतला, तेरे बिन ये जीवन किस विध जाय जिया !  
दुख का ओर न छोर .नर्मदा मुझसे दूर न जा !
11.
मन से मन का नाता सच्चा  काहे जान न पाई ,
एक बार, बस एक भूल को छिमा न तू कर पाई.
एक तु ही रे मीत नरमदा ,ऐसे दे न सजा !
 12 .
मैं पछताता रहूँ और तुझको भी चैन कहाँ ,'
नेहगंध  में  काहे उसको बाँट दिया  हिस्सा?
जहर पिला दे  अपने हाथों, ऐसे मत तड़पा!
मुझसे दूर न जा  !'
13 .
रपटीली पथरीली राहें ,धार-धार  बिखराएँ,
टेर रही आवाज़ शोण की, कानों सुनी न जाए.
तन की सुध ना  मन में चैना ,पल-पल जल छलकाती ,
 रुके न रेवा ,सुध-बुध खोई ,कौन उसे समझाए !
14.
शोण गुहारे मेखल तक जा, टोको रे उसको ,
मान्य -स्वजन सेवक, संबंधी, कोई  दौड़ गहो!
पच्छिम दिसा विकट पथरीली, कोई सोचो रे!!
कोई  करो उपाय , अरे, रेवा को रोको  रे !!!
*
( क्रमशः)

मंगलवार, 16 सितंबर 2014

कुँआरी नदी - 3 .

24.
बहता चला जा रहा शोण, ले के चढ़ती उमरिया  का रोर ,
अपने में डूबा ,उछाले मछरियाँ  उमंँगें तरंगे  अछोर .
सोने सा रँग ,रूप दमके सलोना , डोले तो धरती डुलाय,
गज भर का सीना ,पहारन सी देही ,बाहों में पौरुख अपार .
25.
देखा न ऐसा पुरुष कोई  अब लौं, जुहिला तो आपा भुलानी ,
पग की उतावल थकी,जइस उफनत गोरस पे छींट्यो पानी   .
मनकी ललक और तन की छलक पीर जागी हिया में अजानी
हाय रे ,कैसा बाँका मरद ,देख दूरहि ते जुहिला सिहानी.
26.
आई कहाँ से सुवास ,खिल गई ज्यों  बकावलि पाँत,
चौंका सा   देख रहा शोण,  नई रंगत नए आभास .
स्वप्न है  या कि सच ये यहाँ, मन अजाने भरमने लगा ,
एक दृष्यावली सामने और कौतुक संँवरने लगा .
27.

तन के वर्तुलों पर बिखरता  उमड़ी लहर का जल ,
उछलती  मोतियों सी ,झलकतीं बूँदें चमक चंचल ,
असंख्यक  झिलमिलाते कौंध जाते हार हीरों के -
नगों की जगमगाती जोत, जल में बिछलती पल-पल !

28.
 दिखाती इन्द्रधनु सतरंग बूँदों के,
दमकती देह लहराती बही आती -
फुहारें छूटतीं या टूटतीं नग-हार की लड़ियाँ ,

हिलोरे ले तटों तक की शिराएँ दीप्त कर जाती!
तभी मधु-स्वर -

' नमस्ते भद्र ,यह शुभ दिन दिखाया धन्य हूँ मैं तो '
जुड़े कर ,मोहिनी सी डाल ,लहराती  समुन्मुख हो .'
चकित बोला,'शुभागम हो ,तनिक विश्राम ले लें अब.

भ्रमण का हेतु,परिचय ,जानने को मन हुआ उत्सुक.'
30
' बदल इतने गए , पहचान मैेैं भी तो नहीं पाती,
वही तुम भद्र, बचपन के, न यह अनुमान भी पाती .'
भ्रमित -सा शोण, 'बचपन में कहाँ?' बोली,' अमरकंटक.
वहीं से तो चली  ,बीहड़ वनों में खोजती यह  पथ !'
31.
' बरस बीते, शिखर वह रम्य जीवन का 'अमरकंटक' 
सभी कुछ याद आया नाम सुन तुमसे 'अमरकंटक' !
तुम्हारी वास स्मृतियों को जगा, भटका रही है क्यों ?
'वही हो तुम, वही' - फिर फिर यही दोहरा रही है क्यों ?
32.
मिली है बुद्धि  इतनी तो कि मैं अनुमान कर पाऊँ
तुम्हारी राजसी भूषा निरख, पहचान मैं  जाऊं .
यही तो गंध मेरी है ,तुम्हें सौगंध है मेरी   .
बकावलि शर्त जीता मैं ,वही अनुबंध हो मेरी .'
33.
इसी के तो लिए मैं दुर्गमों में वर्ष भर भटका ,
अँधेरी घाटियों में पर्वतों में भी नहीं अटका .
भयंकर नाग-दानव-यक्ष सबसे पार पाया था  ,
बिंधा था कंटकों से ,मृत्यु से भी जूझ आया था.
34.
भरे व्रण देह के ,लेकिन कसक अब भी उभर आती ,
प्रिया को अंक में पाए बिना क्यों शान्त हो पाती .
सकारथ हो गया ,पाया तुम्हें, बस शेष अब कुछ दिन ,
तनिक तुम पास आओ,तृप्ति कुछ पाये,तृषित यह मन .
35.
तुम्हारे प्रेम की गरिमा, कठिन पथ चल यहाँ आईँ ,
सुकोमल पग-करों को ,पा गया सौभाग्य सहलाऊँ .'
तनिक मुड़, अँगुलियों से पत्र बाहर खींचने का क्रम ,
उसी क्षण  शोण उस  उत्तेजना में कर गया व्यतिक्रम.
36.
चौंक जुहिला गई और डगमग हुई
वह सँभलते-सँभलते थमी रह गई ,

नीर उफना उठा वेग-आवेग में ,
और पाती न जाने कहाँ बह गई !
37.
कुछ न पूछा, न कुछ भी बताया,
लहर से लहर मिल गई बोल चुप रह गये .
दो प्रवाहों का ऐसा उमँगता मिलन
शोण-जुहिला मिले साथ ही बह गए !
38.
सब भूल शोण की लहरों में जा डूबी,
फिर  लाज शरम सब बिला गई पानी में
आदिम नारी बन गई आदिवासिन तब ,
उस काम्य पुरुष की उद्धत मनमानी में !
39.
 जुहिला तो वहीं विलीन हो गई सचमुच ,
अब लौट कहाँ पाए अपनी  राहों में?
 सब कुछ बीता हो जाता, उस नारी का  ,
जो समा गई जाकर नर की बाहों में !
40
फिर देश-काल मर्यादा कौन विचारे ,
यह दोष स्वभावों में धर गया विधाता ,
देहोन्माद आवेग उमड़ता जब भी 
सुर-नर-मुनि कोई नहीं यहाँ बच पाता  !
*
 रात है या दिन न जाने शोण -
स्तब्ध बरहा ग्राम , दशरथ घाट .
हो गया क्या ,आँख फाड़े -

मौन छाया है  ,महा-आकाश !
*

(क्रमशः)

सोमवार, 8 सितंबर 2014

दो थापें -

*
कुंकुम रंजित करतल की छाप अभी भी,
इन दीवारों से झाँक रही है घर में ,
पुत्री तो बिदा हो गई लेकिन उसकी,
माया तो अब भी व्याप रही है घर में !

उसकी छाया आ डोलडोल जाती है ,
जब सावन के बादल नभ में घहराते ,
कानों में मधु स्वर बोल- बोल जाती है
जब भी झूलों के गीत कान में आते !

कोई सुसवादु व्यंजन थाली में आता,
क्या पता आज उसने क्या खाया होगा !
संकुचित वहाँ झिझकी सी रहती होगी ,
उसका मन कोई जान न पाया होगा !

बेटी ससुराल गई पर उसकी यादें ,
कितनी गहरी पैठी हैं माँ के मन में ,
नन्हीं सी गुड़िया जिसको पाला पोसा
किस तरह बिदा ले, गई पराये घर में !


अधिकार नहीं कोई कुछ कह लूं, सुन लूं ,
छू लूँ,समेट लूँ ममता के अाँ चल में.
कैसी बेबसी अभी तक सिर्फ़ हमीं थे,
अधिकार हीन हो गये एक ही पल में

मन कैसा हो जाता आकुल भीगा सा
सामने खड़ी हो जाती उसकी सूरत ,
हो गई पराई कैसे, जिसे जनम से
निष्कलुष रखा जैसे गौरा की मूरत !

कर उसे याद मन व्याकुल सा हो जाता ,
कितनी यादें उमड़ी आतीं अंतर में ,
नन्हें करतल जब विकसे खिले कमल से
बस दो थापें धर गये नयन को भरने !
*
(नोट- यह कविता  पुत्री के विवाह के पश्चात् लिखी  थी .) 

शनिवार, 6 सितंबर 2014

कुँआरी नदी - 2 .

 12.

पूर्वराग# में मगन नरमदा रहती खोई-खोई ,
जुहिला सखि,के नाते करती रहती थी दिलजोई.
'प्रीत पाल ली मन में ,चुपके जाकर मिल भी आ, री ?'
'चुप्पै बैठ जुहिलिया, लाज शरम तू कुछ न विचारी .'
*
( और फिर एक दिन -)
13.
कुहनी टिकाये अधलेटी-सी रेवा पी को लिखे प्रेम पाती,
ऐसी मगन सुध खोई, न जानी ,जुहिला खड़ी मुसकराती .
'पाती  लिखै, बेसरम - बेहया ,कइस   बैठी इहाँ पे अकेली ,
मो सों न चोरी चलिबे तिहारी, बचपन से मो संग खेली !
14.
'सुन री सखी ,मोरी जोहिला बहिनियाँ,जाने तू मनवा की पीर ,
चाहों में काटूँ जो रतियाँ अकेली तू ही बँधावे धीर .
साथी रहे शोण बालापने को, मँगेतर भयो मन हुलास .
मैं तो सयानी भई ,मेरी सजनी , पी से मिलन की  आस !'
15.
दोनों सखी साथ बहती चलीं एक दूजी से कर मन की बात
'कासे कहूँ, लाज लागे मोहे, एक तू ही पे मोरा बिसास.
जुहिला री गुइयाँ , मोरी सखी ,काके हाथन पठाऊँ सँदेस? '
'चिन्ता न कर मोरी बहिनी नरबदा ,काहे करे हिय हरास !
16.
'अबके सहालग पे आयेंगे ब्याहन दूल्हा बने सिर मौर ,
फिर हम कहाँ साथ ,होंगे सहेली , थोरी सबूरी    और .
तोरी लिखी प्रेम-पाती ला बहिनी, ले  जाऊँ जीजा के पास .'
हुलसी नरबदा ,आगे बढ़ी थाम लीन्हें जुहिलिया के हाथ.
17.
'एकै तु ही , मोरे हियरा की जाने ,तो से ही पाऊँ मैं धीर,
मोरे  लिख्यो तू ही पहुँचाय दीजो, मोरे पिया जी के तीर.
 तुरतै न पकराय  दीजो, तभै  जब ओ ही  करें  मोहे याद  .
  पहले परीच्छा लीजो सखी , जान लीजो हिया को  सुभाव .'

18 .
 थोरा खिजा के, थोरा  रिझा के ,बातन से करके बनाव,
चक्कर में जीजा को डालूंगी पहले  ,संदेसवा ताके बाद .
 विरहा की पाती अपने से  बाँचेगा तेरा पिया हो निरांत$ !
गुनती रहौंगी   चेहरे की भंगी, हियरा का पढ़ लूँगी साँच.

19.
 तेरी सखी हूँ ,जानेगा तब ही  ,ला री ला, चिठिया दे  हाथ.
 पहनावा तेरा धारूँगी गुइयाँ , होवे बड़ा ही   मजाक.
हँस के नरबदा ने खोली पिटारी ,पहिना दी भूषण-वस्त्र .
'जुहिला ,अरी तू  पिछानी न जाये ',रेवा तो एकदम निःशब्द !
20.
'अँगियामें,घाघरमें,चूनरमें,चोलीमें रेवा री,का की सुगंधि?'
'पिया की लाई बकावलि धरी ही, ऐ ही पिटरिया में संचि.
 या ही में मोरे प्राण बसत हैं ,हे सखि ,  कहियो जाय !'
रेवा ने जुहिला को तुरतै पठायो अापुन सौंह दिबाय
21.
रेशम की अंगिया,लहरिया की चूनर,घघरी की घूमें अछोर,
बाहों में जगमग  सतरँग चुरियाँ  , छाती पे हारें हिलोर.
 जुहिला चलीें ,तन लहरे    ,सुगंधी मह-मह पवन  उड़ाय,
 यौवन का मद अइस भारी,धरति पे धारत पग डगमगाय.
*
22
 पाती अंगिया  ठूँस धरी,गति बल खाती,लहराती ,
देख कुमारी रेवा की रह गई धक्क से छाती .
देखत रही लगाए  टक-टक  , उठी हिया में हूक,
अइस  मरोर उठे , हुइ जाये कहीं कलेजा  टूक  .
22
बावलिया सी जुहिला नेह- मुग्ध  पर  रीत  न जाने,
क्या कुछ  ये कह डाले ,फिर क्या सोचे शोण न जाने.
 गई ,गई वह गई ,न जाने वो लौटे  क्या करके ,
चैन न पल भर पाए रेवा ,समय न आगे सरके .

*

# पूर्वराग --विरह के चार प्रकारों - पूर्वराग ,मान ,प्रवास और करुण, में से प्रथम.
$ निरांत --इत्मीनान से .
(क्रमशः )

शुक्रवार, 29 अगस्त 2014

कुँआरी नदी.

( 'नर्मदा और शोण' की लोक-कथा का घटना-क्रम भौगोलिक परिस्थितियों पर खरा उतरता है .बहुत दिनों से इस विषय का आकर्षण मुझे खींच रहा था .सूचनाएँ ,सूत्र आदि सामग्री-संचय के यत्न चलते रहे ,पर अब लग रहा है पूरी तैय्यारी शायद कभी न हो सके,बहुत देर करने से अच्छा है जैसा कुछ बन पड़े , वाणी के अर्पण कर देना  उचित होगा.
बहुत लंबी नहीं खिंचेगी  कथा - तीन से पाँच खंड तक ही सीमित करने प्रयत्न रहेगा. प्रस्तुत है प्रथम भाग -)

 1
 धरणी-धर हैं पर्वत,साधे क्षिति की हर अकुलाहट,
हर आहट ले रक्षा करता, अपनी रीढ़ सुदृढ़ रख .
पाहन-तन गिरि की मजबूरी ,पितृवत् करता पोषण
अंतर में करुणा की धारा बहती स्नेहसुधा सम .
2
आदि युगों से जिसका वर्णन करती पुरा-कथाएँ ,
जीवनदायी स्रोत बहातीं उन्नत  गिरिमालाएँ ,
दुर्लभ भेंटें प्रकृति लुटाती ऋतुक्रम, अनुपम,अभिनव
शोभा भरी घाटियाँ बिखरातीं मरकत का वैभव.
3
धन्य अमरकंटक की धरती,धन्य कुंड ,वह पर्वत.
वन-श्री अमित संपदा धारे औषधियाँ अति  दुर्लभ
स्कंद-पुराणे रेवा-खंडे जिसे व्यास ने गाया -

वह अपार महिमा कह पाना मेरे लिए असंभव !
4
भारत-भू का हृदय प्रान्त जो उन्नत दृढ़ वक्षस्थल ,
पयधारी शिखरों से पूरित ,वन उद्भिज से संकुल.
मेखल-गिरि के राज कुंड से प्रकटी उज्ज्वल धारा ,
ज्यों मणियों की राशि द्रवित हो बहे, कि चंचल पारा .
5
कितने पुण्य! धरा पर उतरी महाकाल की कन्या ,
कंकर-कंकर शंकर जिसका ,रूप-गुणमयी धन्या .
विंध्य और सतपुड़ा की बाहों में खुशियाँ भरती ,
धरती का वरदान , 'नर्मदा' नाम सार्थक करती .
6
झरना बन कर वहीं फूट आया जब नेह शिखर का,
सोनमुढ़ा से अविरल स्रोत बह चला निर्मल जल का .
'सोन' नाम धर दिया देख कर उसका वर्ण सलोना
जो देखे  रह जाय ठगा-सा धर दो एक दिठौना.
7.
नाम नर्मदा प्यार भरा, पर रेवा भी कहलाई ,
उसे शोण की उछल-कूद वाली चंचलता भाई .
दोनों परम प्रसन्न खेलते क्रीड़ा करते चलते-
लड़ते-भिड़ते ,बातें करते, खिलखिल कर हँस पड़ते.
8.
आदिवासिनी एक प्रवाहिनि जुहिला और वहाँ थी ,
 खग-मृग से आपूर्ण वनों की हरीतिमा में बहती.
रीति-नीति मर्यादा के संस्कार रहे अनजाने ,
वन्य समाजों के अपने आचार जोहिला माने ,
9.
एक राज कन्या, मेखल पर्वत की राजदुलारी ,
दूजी, महुआ-वन के मत्त पवन की सेवन हारी .
बचपन बीता शोण बढ़ गया अपनी गति में आगे ,
दोनों बालाओं ने जोड़े प्रिय सखियों के नाते .
10.
यौवन ने दोनों पर ही अपना अधिकार जमाया
एक दूसरी से  दोनों ने अपना कुछ न छिपाया.
हँसती थी नर्मदा -मिली है कैसी मुझे सहेली -
जीवन उसके लिए सरल अति, मेरे लिए पहेली!
11.
राजकुँवरि के लिए योग्यतम आएगा प्रतियोगी.
आदिवासिनी कहीं वनों में अपना वर खोजेगी.
वीर शोण ने सिद्ध कर दिया अपना पौरुष अभिनव
मुग्ध हो गई कुँवरि, देख कर  शौर्य, रूप ,कुल, वैभव.
*

(क्रमशः)
 

शनिवार, 16 अगस्त 2014

बाउल गीत -


*
तेरे रंग डूबी, मैं तो मैं ना रही !
*
एक तेरा नाम ,और सारे नाम झूठे,
ना रही परवाह ,जग रूठे तो रूठे
सुख ना चाहूँ तो से ,ना रे, ना रे ना, नहीं !
*
एक तु ही जाने और जाने न कोई,
जाने कौन ?अँखियाँ जो छिप-छिप रोईं.
एक तू ही को तो , मन और का चही !
*
बीते जुग, सूरत भुलाय गई रे ,
तेरी अनुहार मैं ही पाय गई रे .
पल-छिन मैं तेरे ही ध्यान में बही !
*
एक खुशी पाई तोसे पिरीतिया गहन ,
तू ना मिला, मिटी कहाँ जी की जरन ,
तेरे बिन जनम, बिन अगन मैं दही !
*
कि मैं झूठी, कि  वचन विरथा -
जा पे सनेह सच, मिले - सही क्या ?
 रीत नहीं जानूँ, बस जानूँ जो कही !
*
(पूर्व रचित )

गुरुवार, 14 अगस्त 2014

सर्वग्रासी -

*
यह सर्वग्रासी राग  !
संपूर्ण वृत्तियों को निज में समाहित कर  ,
सारी बोधों आच्छादित कर,

 वर्तमान से परे खींच ले जाता 
 अजाने काल-खंडों में .      ,
धरी रह जाती है चाक-चौबन्द सजगता,
विदग्धता विवश ,अवधान भ्रमित ,
सारी सन्नद्धता हवा,
और दिशा-बोध खोई मैं !
  *
अचानक रुकी रह जाती हूँ
जहाँ की तहाँ -
सब अनपहचाना ,
बेगाना ,निरर्थक .
लुप्त दिशा बोध .
वहीं के वहीं ,
कौन से आयामों में उतर कर   

संपूर्ण चेतना अनायास ,
अस्तित्व विलीन  !
 *
निर्णय नहीं कर पाती -
कहाँ हूँ !
घेर लेता चतुर्दिक् जो सर्वग्रासी राग
जीने नहीं देता .
कैसी- तो अतीन्द्रियता
डुबा लेती अपने आप में .
जैसे मैं, मैं नहीं,
रह जाए अटकी-सी  ,
हवाओं में भटकती,
कोई तन्मय तान !
*

शनिवार, 9 अगस्त 2014

धीरे धीरे....

ओ चाँद, जरा धीरे-धीरेनभ में उठना,
कोई शरमीली साध न बाकी रह जाये !
*
किरणों का जाल न फेंको अभी समय है ,
जो स्वप्न खिल रहे ,वे कुम्हला जायेंगे.
ये जिनके प्रथम मिलन की मधु बेला है ,
हँस दोगे तो सचमुच शरमा जायेंगे !
प्रिय की अनन्त मनुहारों से
जो घूँघट अभी खुला है ,तुम झाँक न लेना-
अभी प्रणय का पहला फूल खिला है !
स्वप्निल नयनों को अभी न आन जगाना ,
कानो में प्रिय की बात न आधी रह जाये !
*
पुण्यों के ठेकेदार अभी पहरा देते ,
ये क्योंकि रोशनी अभी उन्हें है अनचीन्हीं !
उनके पापों को ये अँधेर छिपा लेगा ,
जिनके नयनो मे भरी हुई है रंगीनी !
जीवन के कुछ भटके राही लेते होंगे ,
विश्राम कहीं तरुओं के नीचे छाया में ,
है अभी जागने की न यहाँ उनकी बारी ,
खो लेने दो कुछ और स्वप्न की माया में ,
झँप जाने दो चिर -तृषित विश्व की पलकों को ,
मानवता का यह पाप, ढका ही रह जाये !
*
जिनकी फूटी किस्मत में सुख की नींद नहीं ,
आँसू भीगी पलकों को लग जाने देना !
फिर तो काँटे कंकड़ उनके ही लिये बने ,
पर अभी और कुछ देर बहल जाने देना !
यौवन आतप से पहले जिन कंकालों पर
संध्या की गहरी मौन छाँह घिर आती है !
इस अँधियारे में उन्हें ढँका रह जाने दो ,
जिनके तन पर चिन्दी भी आज न बाकी है !
सडकों पर जो कौमार्य पडा है लावारिस ,
ऐसा न हो कि कुछ लाज न बाकी रह जाये !
*
ओ चाँद जरा धीरे-धीरे नभ में उठना ...!

सोमवार, 28 जुलाई 2014

तोता-मैना .

*
बेटा तरु पर बैठा तोता ,दूर-दूर उड़ जाता ,
मैना जैसी चहक रही तू,मेरी रानी बिटिया ,
बड़ा घड़ा है बेटा जल का उठता नहीं उठाए,
प्यास बुझा शीतल कर देती ,बेटी छोटी- लुटिया .
*
कोना-कोना महक भर रही प्यार भरी ये बोली ,
तेरे कंठ स्वरों में किसने ऐसी मिसरी घोली !
बेटा उछल-कूद कर करता रहता हल्ला-गुल्ला  
दुनिया भर की बातें कहता-सुनता, बड़ा चिबिल्ला !

*  
जूतों को उछाल देता वह फेंक हाथ का बस्ता,
डाल जुराबें इधर-उधर जैसे ही घर में घुसता 
तुझे छेड़ कर हँसता, करता मनमानी शैतानी ,
पर रूठे तो तुरत मनाता, मेरी गुड़िया रानी !
*
दोनो हैं दो छोर, जिन्हें पा  भर जाता हर कोना ,
राखी ,सावन,दूज, दिवाली हर त्योहार सलोना.
घर-देहरी सज गई  कि जैसे  राँगोली पूरी हो ,
हँसने लगता घर ज्यों बिखरी फूलों की झोली हो !
*
घर से बाहर नहीं हुआ करते सब अपनों जैसे ,
तरह-तरह के लोगों में कुछ होंगे ऐसे-वैसे .
तेरा भइया तुझे छाँह देगा इस विषम डगर में ,
उसके साथ निडर हो लड़ना, इस संसार-समर में !
*
बाहर की दुनिया में वह है  चार नयन से चौकस ,
कहीं न मेरी बहिना पर आ जाए कोई संकट .
डोली में बिठला कर तुझको बिदा करेगा जिस दिन ,
बार-बार टेरेगा तुझको , इस घर का खालीपन !
*
मेरी दो आँखें तुम दोनों , तुम ही असली धन हो
जीजी औ'भइया का सुखमय प्यार भरा जीवन हो !
साथ निभाना इक-दूजे का बाँध नेह की डोरी.
तुम हो मेरे पुण्य ,और तुम हँसी-खुशी हो मेरी !
*

मंगलवार, 22 जुलाई 2014

तुम कहो ...

तुम अपनी अंतर्व्यथा कहो!

*
जब वाष्प कंठ तक भर आये, 

वाणी जब साथ न दे पाये,
छाये विषाद कोहरा बनकर , तब छलक नयन से सजल बहो  !

*
शब्दों में अर्थ न समा सके, 

सारे सुख जिस क्षण वृथा लगें,
मन गुमसुम अपने में डूबे , वह घन-भावन अन्यथा न हो !

*
 श्वासों की तपन विकल कर दे ,

सब जोग-जतन निष्फल कर दे ,
रुकना पड़ जाए अनायास, पर मौन-अधूरी कथा कहो !

*

सोमवार, 14 जुलाई 2014

पानी बाबा आया.

* 
 भूरे रुएँ ,धुएँ सा तन   , पानी बाबा आया !
*
नई फसल  काँधे पर लादे,  बुँदियाँ बट-बट डोरी बाँधे   ,
टूटे-फूटे दाँत निपोरे ,दसों पोर  पानी में  बोरे ,
छींटे उड़ उड़ पड़ते  ,हँफ़नी से यों भर आया !

चढी साँस खींचे , झुक झुक के  चले बाय का मारा,
जटा जूट बिखरा ऊपर से, लथपथ  बेचारा ,
बूढ़-पुरातन मनई, डोले सलर-बलर काया !
*
हिलता-डुलता भारी भरकम, कहीं रुका सा ले लेता दम ,
लाठी टेक कहीं , झटका दे टार्च फेंकता एकदम.
बज्जुर बादल गरज- तरज,  तीखा कौंधा  छाया ! 
*
उमड़ -घुमड़ कर बोले अपने  अगड़म-बगड़म बोल,
करता गड़ड़-गड़ड़ गम, थम-थम जैसे बाजे ढोल .
ठोंक बजा कर पाँव बढ़ाता ,  सबको  भरमाया !

*
 झल्ली भर भर  आम, पल्लियाँ भर भुट्टे-ककड़ी ,
फूले हुए फलैंदे जामुन, हरी साग गठरी, .
अँगना  भर नाती-पोते , छू-छू कर दुलराया !
*

अन-धनवाली झोली खाली, में हरियाली भर दी,
मोर-नाचते बूटों वाली हरी  चुनरिया धर दी .
टर्र-टर्र दादुर , पी-पी  पपिहे  ने गुहराया !
*
मटियाले पानी में , हाथ घँघोता छोटा लल्ला,
बौछारों में भीगे ,भागे- कूद मचाए हल्ला -

'निकल आओ रे , ये कागज़ की नाव चली  भाय्या' !
*

आज जुड़ाई  दरकी छाती ,कब की सूखी- रूखी धरती, 
रोम-रोम हरसाया, सुख पा, नैन-तलैयाँ सरसीं. 
माटी में  सोंधी भभकन , हर झोंका  पछुआया !

*
नेहा-मेहा लाया रे,  पानी बाबा आया !

*

सोमवार, 7 जुलाई 2014

शब्द-दर्पण

*
वही बावन अक्षर .
गिनी-चुनी मात्राएँ और
थोड़े से विराम चिह्न .
शब्द भी  कोश में संचित,अर्थ सहित.
 सबके पास यही पूँजी.
*
आगे सब-कुछ भिन्न ,
 हाथ बदला कि -
व्यंजनों के स्वाद बदले ,

स्वरों के राग बदले.
वही चेत -
कितने  रूपों, कितने रंगों में,
कितने प्रसंगों में:
और सारा का सारा प्रभाव ,
एकदम भिन्न !
*
विषय को छोड़,
व्यक्ति को
लिखने लगती है भाषा.
सारे आवरण धरे रह जाते हैं .
वही शब्द, कुछ कहते
कुछ और कह जाते हैं ,
मनोजगत का सारा एकान्त ,
बिंबित कर ,
दर्पण बन जाते हैं !
*

शनिवार, 28 जून 2014

पुनर्नवा

( यहाँ आज प्रस्तुत कर रही हूँ ,यह कविता 'पुनर्नवा' पूर्व-रचित है .)
*
दर्पण नहीं
स्वयं को देख रही हूँ
तुम्हारी आँखों से !
नई-सी लग रही हूँ ,
ऐसे देखा नहीं था कभी
अपने आप को .
*
तुम्हारी दृष्टि से आभासित ,
मोहक सी उजास
धूप-छाँह का सलोनापन
स्निग्ध हो छा गया
झेंप-झिझक  भरे मुखमंडल पर !
*
ये आनन्द-दीप्त लोचन मेरे हैं क्या ?
नासिका, होंठ ,धुले बिखरे केश ,
मांग की सिन्दूरी रेख ,

माथे पर कुछ बहकी-सी,
बिंदिया पर विहँसती :
 ऐसी हूँ मैं !
*
जानती नहीं थी .
निहारना अपने आप को !
देखती थी दर्पण 
ज्यों  परीक्षण कर रही होऊँ
सावधान सजग होकर .
पर, आज अभिषेक पा रही हूँ
दो नयनों के नेह- जल का,
पुलकित हो उठा रोम रोम !
*
तुम्हारी आँखों से अपने को देखना ,
एक नया अनुभव ,
नई अनुभूति जगा गया .
लगा स्वयंको पहली बार देखा ,
उत्सुक नयन भर .
लगा जैसे इस मुख की याद है ,
पर देख आज पा रही हूँ !
*
तुम्हारी दृष्टि ने
कोमलता का रेशमी आवरण
ओढ़ा दिया मुझे.

कुछ विस्मित-सा कुतूहल
समा गया मेरे भीतर.
स्वयं को देखा -
तुम्हारी निर्निमेष मुग्ध चितवन ,
चिर-पुनर्नवता रच गई मुझमें !

*

बुधवार, 11 जून 2014

गंगा को बहने दो अविरल.

*
निर्मल-निर्मल ,उज्ज्वल-उज्ज्वल ,गंगा को बहने दो अविरल !
गिरिराज हिमालय की कन्या , नित पुण्यमयी प्रातःवंद्या,
यह त्रिविध ताप से व्यथित  धरा ,उतरी आ कर बन ऋतंभरा.
अंबर-चुंबी शृंगों से चल ,भर  नभ-पथ का पावन हिम-जल !
*
जैसे कि फले हों सुव्रत-सुकृत,हम ऋणी ,कृतज्ञ ,हुए उपकृत ,
गिरिमालाओं से अभिषिक्ता ,वन-भू की दिव्यौषधि सिक्ता .
शत धाराओं से भुज भर मिल , कर रही प्रवाहित नेह तरल !
*
जो हरती रहीं कलुष-कल्मष ,इन लहरों में अब घुले न विष ,
तीरथ हैं सुरसरि के दो तट , इस ठौर न हों अब पाप  प्रकट.

श्रद्धा-विश्वास पहरुए हों , आस्थामय कर्म बने प्रतिफल !
 *
अपने तन-मन की विकृति कथा ,दूषणमय जीवन की जड़ता , 
इस तट मत लाना बंधु, कभी, जल में न घुलें संचित विष-सी,
चिर रहे प्रवाहित पावन जल, गंगा को बहने दो निर्मल !
*

निर्मल-निर्मल,उज्ज्वल-उज्ज्वल,बहने दो जल-धारा अविरल !
*

सोमवार, 19 मई 2014

मंगलमय हो !

    युग की करवट
        *
        देख रही हूँ अपनी आँखों ,
        युग को करवट बदलते.
        कितना शोर था
        कीचड़ में उछलते लोग
        शोर ,छींटे ,बौखलाहटें ,
        कितनी बार ,कितने रूप ;
        और हर बार
        और,और गिरावट .
        *
         उठा था कभी 

         एक परिव्राजक का शंखनाद -
        "नया भारत निकल पड़े मोची की दुकान से,
        भड़भूँजे के भाड़ से, कारखाने से, हाट से, बाजार से;
        निकल पडे झाड़ियों, जंगलों, पहाड़ों, पर्वतों से।"
        झकझोर दिया था जिसने जन-मानस !
        वह नरेन्द्र #था .
        *
        धार वही नामाक्षर
        मिल गया  प्रत्युत्तर .
        निकल आया
        हाट से, बाज़ार से,
        सामान्य ही विशिष्ट बन,
        माँ के प्रकाश -स्नान हेतु.
        अपरिग्रही जीवन की आरती लिए !     

    *
        लक्ष-लक्ष करांकित सहस्रमाली
        अश्व-वल्गाएँ सँभाल,
        रथ-चक्रों से तमस् विदारता ,
        स्याही के धब्बे खँगारता,
        रोशनाई घोल  लिख दे ,
        नये युग का उपोद्घात !
        *
        शमित  हों सारे  उत्पात ,
        निर्मल हो गगन ,वायु ,
        क्षिति ,जल-प्रवाह.
        जाग उठे नया  विश्वास ,
        शुभमय हो , मंगलमय ,
        अरुणोदय का नया उजास !
        *
        (# नरेन्द्र-स्वामी विवेकानन्द)
     -  प्रतिभा सक्सेना

      सोमवार, 12 मई 2014

      छापे माँ तेरे हाथों के

      ( जीवन-धारा के प्रवाह में माँ के साथ जिये हुए  तरल-सरल अंतरंग पल ,  पुत्री   के स्मृति-भँवर में  अनायास उमड़ कर कुछ करुण-मधुर  संवेदनाएं जगा जाते हैं.  उसी की अभिव्यक्ति ,मेरी मित्र श्रीमती शार्दुला नोगजा रचित यह  कविता , सहयोगी जनों के आस्वादन हेतु प्रस्तुत है -)

          
        छापे माँ तेरे हाथों के  - 
       

      कोहबर की दीवारों जैसे 
      मेरे अन्तर के आँगन में ,
      धुँधले से, पर अभी तलक हैँ 
      छापे माँ तेरे हाथों के !
      *
      कच्चे रंग की पक्की स्मृतियाँ 
      सब कुछ याद कहाँ रह पाता ,
      स्वाद, खुशबुएँ, गीतों के स्वर
      कतरे कुछ प्यारी बातोँ के !
      *
      हरदम एक मत कहाँ हुये हम ,
      बहसों की सिगड़ी में तापीं 
      दोपहरों के ऋण उतने ही  
      जितने स्नेहमयी रातों के!
      *
      छापे माँ तेरे हाथों के, 
      कतरे कुछ प्यारी बातोँ के !
      *
      सादर 
      शार (शार्दुला) .
      ११ मई '१४

      शुक्रवार, 9 मई 2014

      कृतारथ कर दिया ओ माँ !

      ( उस परम- जननी ने  नारी जन्म  दे कर  जो 'माँ' बनने का गौरव  प्रदान किया -    कृतज्ञता -ज्ञापन हेतु 'विश्व-मातृ-दिवस' पर अपनी एक पूर्व  कविता  प्रस्तुत करने  से स्वयं को रोक नहीं पा रही हूँ. ) 
      *
      सृजन की माल का मनका बना कर जो ,
      कि नारी तन मुझे देकर कृतारथ कर दिया ओ माँ !
      *
      सिरजती एक नूतन अस्ति अपने ही स्वयं में रच
      इयत्ता स्वयं की संपूर्ण वितरित कर परं के हित
      नए आयाम सीमित चेतना को दे दिए तुमने
      विनश्वर देह को तुमने सकारथ कर दिया, ओ माँ !
      *
      बहुत लघु आत्म का घेरा कहीं विस्तृत बना तुमने
      मरण को पार करता अनवरत क्रम, जो रचा तुमने
      कि जो कण-कण बिखरता, विलय होता, नाश में मिलता,
      नये चैतन्य का वाहन, पदारथ* कर दिया ओ माँ !
      *
      कि नारी तन मुझे देकर, कृतारथ कर दिया ओ माँ !
      *
      अमृतमय स्रोत जीवन का प्रवाहित कर दिया तन में,
      लघुत्तम जीवधारी को जनम-अधिकार दे तुमने.
      रहस्यों की गुहा में धर तुम्हीं साकार कर पाईं,
      प्रकृति के बीज मंत्रों को यथारथ कर दिया ओ माँ !
       *

      - प्रतिभा.
      (*पदारथ = मणि)

      शुक्रवार, 25 अप्रैल 2014

      सहयात्री.

      (एक बहुत पुरानी कविता कागज़ों में  दबी पड़ी रही , अब मिल गई तो  उसी रूप में यहाँ उतारे दे रही हूँ -)
      *
      सहयात्री -
      रस्ते के कंकड़-पत्थर ,पग-पग की ठोकर ,
      तपता आतप ताप और ये काँटे .
      चलना है स्वीकार इन्हें कर .
      काँटों का विष-वमन ,धूप की तपन,
       राह दुर्गम है !
      नीरस जीवन भार  
       नेह को दो ही बोल सहज कर जाते ,
      दो क्षण की मुस्कान सँजो लेते
        पथ के ये विषमय  काँटे ,
      जग की मौन उपेक्षा,उपालंभ, आरोपण ,
      तो फिर तोड़ न पाते
      ओ सहयात्री, अपने नाते !
      *
      तेरी-मेरी एक कहानी ,
      जहाँ नहीं रुकने का कोई ठौर-ठिकाना ,
      उसी जगह से चरण चले थे.

      पहला पग जब उठा
       राह बोली थी - आगे,आगे देखो.
      एक-एक कर कितनी दूरी इसी तरह मप गई.
      पथ के साथी ,
      साथ छूटता पर पहचान शेष रह जाती ,
      मन में उमड़-घुमड़ जाता व्यवहार स्नेह का ,
      जीवन के आतप में जो छाया दे लेता .
      *
      कह लो कुछ, कुछ सुन लो ,
      सूनापन बस जाए दो ही क्षण को :
      आगे कितनी दूर अकेले ही जाना है
      अपने पथ पर तुमको -हमको !
      ओ सहयात्री,
      तेरी-मेरी एक कहानी.
      जग की कसक भरी रेती पर
      जहाँ नहीं रह जाती कोई शेष निशानी .
      दो क्षण की पहचान भटकते से चरणों की.
      काल फेर जाएगा चापों पर फिर पानी !
      *

      सोमवार, 21 अप्रैल 2014

      बटोहिया -

      *
      राह तीर पनघट पे गागर को धोय माँज,
      सीस साधि  इँडुरी ,जल धारि पनिहारिया
      पंथी से पूछि रही, 'कौन गाम तेरो ,
      तोर नाम-काम कौन, कहाँ जात रे बटोहिया ?'
      *
      'जनम से चलो जात ,मरण की जातरा पे,
      मारग में धूप-छाँह आवत-है जात है !
      कोई छाँह भरो थान देखि बिलम लेत कुछू ,
      कोई थान ,घाम- ताप गात अकुलात है !
      बेबस चलो जात कोऊ रोके को दिखात नाहीं
      मारग पे जात लोग साथ रे बटोहिया !
      *
      'जाने कहां ते ई धरती पे आय पड़्यो
      जाने कइस ,जाने कहाँ ,जाने काहे जानो नाहिं
      कोऊ नाहीं हुतो, कोऊ जान ना पिछान
      खाली हाथ रहे दूनौ, आप हू को पहचानो नाहिं
      मारो-मारो  फिरत हूँ  दुनियाँ की भीर
      चलो जात हूँ अकेलो  कहात हूँ बटोहिया !
      *
      'साथ लग जात लोग ,और छूट जावत हैं
      नाम मोय नायं पतो ,लोग धर दीनो है
      जातरा में पतो कौन, आपुनो परायो कौन
      सुबे से चलो हूँ संझा तक गैल कीन्हों है .'
      पूछति है बार-बार कौतुक से भरी नार,
      'पथ को अहार कहा लायो रे, बटोहिया?'
      *
      'माथे धरी पोटली में धर्यो करम को अचार ,
      रोटी तो  पोय के इहाँ ही मोहे खानी है ।
      मोह-नेह भरे चार बोल तू जो बोल रही 
      ताप और पियास हरि जात ऐसो पानी है.'
      'आगे को रँधान हेत करम समेट मीत,
      बाँध साथ गठरी में गाँठ दै बटोहिया !'
      *
      राह अनबूझी  सारे लोग अनजाने इहाँ ,
      आय के अकेलो सो परानी भरमात  है
      वा की रची जगती के रंग देखि देखि मन
      ऐसो चकियायो अरु दंग रहि जात है !
      धोय-माँज मन की गगरिया में नेह  पूरि    
      पल-पल  सुधि राख, जिन पठायो रे बटोहिया!'

      *
      'उहै ठौर जाए बे पूछिंगे कौन काम कियो ,
      सारो जनम काटि, कहो लाए का कमाय के?'
       पनिहारी हँसै लागि , 'ऐ हू बताय देहु
      बात को जवाब कइस देहुगे बनाय के ?
      भूलि गयो भान  काहे भेजो हैं इहाँ पे ठेल
      ओटन को लाय के  कपास रे बटोहिया!'
      *

      शुक्रवार, 11 अप्रैल 2014

      सूपनखा का जन्म -

      *
       होली आई होली आई ,बड्डू जी ने भाँग चढ़ाई .
      जा बैठे कुर्सी पर बड्डू,खाने लगे उठा कर लड्डू
      मस्त हुए दस लड्डू खा कर लगे नाचने हथ उठा कर .
      हँसने लगे अचानक यों ही ,बात हुई क्या बोला कोई .
      *
      लंका में तूफान उठा है ,हनूमान को नहीं पता है .
      जीते राम, गए लंका में ,त्रिजटा पड़ी बड़ी शंका में ,
      सबके पूरे हुए काम जी ,पर कुछ सोचो, अरे राम जी ,
      सूपनखा अब कहाँ जायगी ,कैसे अपना घर बनायगी ?
      *.
      राम और लक्ष्मण जाते हैं उसका न्याय न कर पाते हैं
      अब रावण भी नहीं यहाँ पर , किसके पास रहेगी जाकर .
      चक्कर में पड़ गए राम जी ,उसका भी तो बने काम जी.
      जुड़ी रहेगी राम-लखन से ,किन्तु काम अपने ही मन के ,
      *
      लक्ष्मण पुर का नाम लखनऊ,वही तुम्हारा बने धाम जू,
      आधा नाम दूसरा होगा , कोई   राम   साध ही देगा
       ऐसा पहुँचा गुरु पाएगी, पर अनब्याही रह जाएगी  .
      ठाठ करेगी ,राज करेगी ,मनमानी हर बात करेगी ,
      *
      हाथी-साथी साथ रहेंगे, लादे तेरा बोझ रहेंगे .
      कलियुग में शासन की डोरी , तेरे हाथों थोरम-थोरी,
      चाहे जितने ही युग बीतें ,मायाविन तेरी तरतूतें,
      जुड़ी रहें माया से  माया ,सूपनखा का जनम सुनाया.
      *
      अब  वह धरती पर आई है ,अपनी  माया फैलाई है
      इच्छा पूरी होय तुम्हारी ,पूरी कर दी जुम्मेदारी .
      कुर्सी- माया जाय न जानी , बड्डू जी ने कही ज़बानी.
      प्रकटी माया  राम धन्य हो ,सूपनखा कलि में प्रणम्य हो !
      *

      मंगलवार, 25 मार्च 2014

      जुड़ीं क्षिति की टूटती जीवन-लकीरें..

      {क्षीण होती शिप्रा और सतत प्रवाहिनी नर्मदा के,मनुज 
      के भागीरथी प्रयत्नों द्वारा प्रायोजित, संगम से उत्प्रेरित -}
      *
      आज शीतल हो गए मन-प्राण ,
      सुख का ज्वार उमड़ा ,
      मेखला कटि की विखंडित अब न होगी .
      मालवा की भूमि यों दंडित न होगी ,
      और उत्तरगामिनी शिप्रा पुनीता ,
      अब किसी उत्ताप से कुंठित न होगी .
      *
      अब न सूखेगा कभी
      कितनी  तपन हो ,
      तुष्टि से परिपूर्ण  
      रुक्ष- विदीर्ण अंतर.
      तटों का वैभव न अब श्री-हीन होगा 
      आस्थाएँ जी गईँ  विश्वास से भर .
      जुड़ीं क्षिति की टूटती जीवन-लकीरें,
      राग शिप्रा और रेवा के मिले 
      जल ने तरल रँग से 
      लिखे  नूतन स्वराक्षर.
      *
      हो गई थी मनुज के अतिचार की अति,
      असीमित तृष्णा,विषम व्यवहार की गति,
      प्रकृति पर निस्सीम अत्याचार , दुर्मति,
       पाप, बन कर  शाप सिर पर आ पड़ा,
      तब बौखलाया मनुज,
      विपदा-ग्रस्त बेबस .
      उमड़ता परिताप- पश्चाताप से भर,
      दिग्भ्रमित साधन न कोई ,आश कोई,
      विपद् में  अनयास माँ ही याद आई .
      *
      विषम अंतर्दाह भर कातर हुआ स्वर -
      'शमित कर दो पाप ,
      यह क्षिति-तल सँवारो ,
      नर्मदे, इस तट पधारो, 
      शाप के प्रतिकार हित माँ  ,
      चेत-हत शिप्रा गँभीरा को उबारो,
      आदिकल्पों से धरा को पोसती
      हे मकर वाहिनि  ,
      मुमूर्षित यह भू उबारो
      अमृत-पय धारिणि, पधारो !'
        *
      चल पड़ा क्रम साधना का
      एक ही रट ले कि माँ अनुकूल होओ .
      जन-मनोरथ जुट गया अविराम 
      करता अगम तप , मन-कर्म-वच रत ,
      'माँ ढलो  ,इस दिशि चरण धर
      त्रस्त जीवन को सँवारो ,
      शाप से उद्धार हित, 
      सोमोद्भवे रेवा पधारो ,
      माँ ,उबारो !'
      *
      आशुतोषी नर्मदा  की धन्य धारा
       झलझलाया नीर ,
      करुण पुकार  सुन विगलित मना ,
      उन्मुख हुईँ,
      माँ नर्मदा ले उमड़ता उर
      वेग भर बाहें पसारे ,
      चल पड़ीं दुर्गम पथों को पार करती,
      आ गई संजीवनी बन .
      *
      क्षीण शिप्रा,उमग आई  चेत भर
       भुज भर मिलीं आकंठ
       आलिंगन सुदृढ़ अविछिन्न !
      नेह ! जल में जल सजलतर हो समाया,
      कण ,कणों में घुले,
      अणु में अणु  गये  ढल  ,
      मिलन के कुछ सुनहरे पल ,
      लिख गये स्वर्णाक्षरों में
      मनुज की भागीरथी
      श्रम-साधना के पृष्ठ उज्ज्वल !
      *
      पुण्य संगम , 
      तीर्थ की महिमा महत्तम,
      निरखते अनिमेष
      युग-युग से पिपासित नयन ,
       दुर्लभ तृप्ति ,परमाश्वस्ति
       मैं साक्षी
       यही सौभाग्य क्या कम !
      सिक्त प्राणों में अनोखी स्वस्ति.
       हो कृतकृत्य अंतर
       शान्त, स्निग्ध, प्रसन्न !
      *
      अमल -शीतल परस ,
      यह नेहार्द्र धरती,
      सरस्वति के हास से धवलित दिशाएँ ,
      रजत के शत-शत चँदोबे
      तानती निर्मल निशाएँ ,
      सतत दिव्यानुभूति भरती
      ओर-छोर अपार सुख-सुषमा प्रवाहित.
      *
      हरित वन में उठ रही हो 
      टेसुओं की दहक ,
      नयन-काजल पुँछे
      माँ के श्याम आँचल की महक .
      इस  प्राण-वीणा में बजे अविराम
      जन्मान्तर-जनम तक
      जल-तरंगित, रम्य शिप्रा के क्वणन.
      अहर्निश, अनयास,अव्यय            
      अनाहत ,अविछिन्न
      अनहद-नाद की सरगम !
      *