सोमवार, 8 सितंबर 2014

दो थापें -

*
कुंकुम रंजित करतल की छाप अभी भी,
इन दीवारों से झाँक रही है घर में ,
पुत्री तो बिदा हो गई लेकिन उसकी,
माया तो अब भी व्याप रही है घर में !

उसकी छाया आ डोलडोल जाती है ,
जब सावन के बादल नभ में घहराते ,
कानों में मधु स्वर बोल- बोल जाती है
जब भी झूलों के गीत कान में आते !

कोई सुसवादु व्यंजन थाली में आता,
क्या पता आज उसने क्या खाया होगा !
संकुचित वहाँ झिझकी सी रहती होगी ,
उसका मन कोई जान न पाया होगा !

बेटी ससुराल गई पर उसकी यादें ,
कितनी गहरी पैठी हैं माँ के मन में ,
नन्हीं सी गुड़िया जिसको पाला पोसा
किस तरह बिदा ले, गई पराये घर में !


अधिकार नहीं कोई कुछ कह लूं, सुन लूं ,
छू लूँ,समेट लूँ ममता के अाँ चल में.
कैसी बेबसी अभी तक सिर्फ़ हमीं थे,
अधिकार हीन हो गये एक ही पल में

मन कैसा हो जाता आकुल भीगा सा
सामने खड़ी हो जाती उसकी सूरत ,
हो गई पराई कैसे, जिसे जनम से
निष्कलुष रखा जैसे गौरा की मूरत !

कर उसे याद मन व्याकुल सा हो जाता ,
कितनी यादें उमड़ी आतीं अंतर में ,
नन्हें करतल जब विकसे खिले कमल से
बस दो थापें धर गये नयन को भरने !
*
(नोट- यह कविता  पुत्री के विवाह के पश्चात् लिखी  थी .) 

20 टिप्‍पणियां:

  1. मर्मस्पर्शी .... बेटियां घर से विदा होकर भी मन में बसी रहती हैं |

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  2. meri to beti bhi nahin hai..fir bhi aansu dhulak gaye...jaane maayein log padhengi to kaisa jee ho jaayega unka :(:(:(

    aaapne bhi bheege mann se likhi hogi na...agar maine likhi hoti to jaane kitti baar aankhein paunchhin hotin apni :''-)

    bahut sunder aur hridaysparshi rachna hai pratibha ji...bahut achhe achhe aur pyare pyare moments hain isme...jaise ek chhoti si film dkehi ho ya koi khoobsoorat gana...teen qirdar...ek aansu paunchhti maa..ek sasural me nayi naveli dulhan bani beti..aur ek masoom si bachchi :):)
    mann aisa ho gaya padh ke..jaise ek nanhi si adhkili kali ho aur aapke shabdon ne use chhu liya ho..us soarsh ke jaise anubhav hui aapki kavita :") :"( :(

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    2. माताएं ही नहीं कुछ मेरे जैसे पिता भी हैं जो बिलकुल सन्नाटे की स्थिति में हैं अपनी माँ की इस कविता को पढ़कर! यूं तो बहुत कुछ लिख जाता हूँ, लेकिन अभी तो बस आँखें पोंछ रहा हूँ।

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    3. kshama karein meri galti k liye Salil Ji.. apne jeewan me aise pitaaon ka anubhav nahin hai mujhe pratyaksh roop se. biased rehti hoon anubhavon se.mere shabdon se aapka pita mann thoda bhi aahat hua to main pun: kshamaprarthi hoon. :(:(

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  3. ye jo photo hai Pratibha ji..ye aise hi hai..ya apne ghar ki hin koi beti hain??? :''-D

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    1. यह मेरी बेटी-विवाह समय की फ़ोटो है, तरु.

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    2. jii !! to aapko ek muskurati hui tasveer lagani chahiye thi na Pratibha ji :( abse hansti hui tasveerein lagayiyega ..:-|

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  4. रचना का शीर्षक पूरी रचना पर छाया हुआ है कविता की प्रत्येक पंक्ति में अत्यंत सुंदर भाव हैं.....सुन्दर कविता

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  5. बिटिया का विदा हो कर जाना, कभी विस्मृत नहीं हो पता. पल पल उसकी यादें चारों और घूमती रहती हैं...बहुत मर्मस्पर्शी और भावपूर्ण रचना...

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  6. बिटिया घर से जाती है पर यादें वहीं रहती हैं ... माँ बाप के मन से तो जा ही नहीं सकती कहीं भी ...
    मर्म को छूते हुए भाव लिए सुन्दर रचना ...

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  7. शकुन्तला बहादुर9 सितंबर 2014 को 7:38 pm

    बेटी की विदा का अत्यन्त भावपूर्ण और मर्मस्पर्शी चित्रण अपनी बेटी ही नहीं, सभी बेटियों के लिये आँखों को सजल कर गया । सारे दृश्य आँखों
    के सामने आ गए । लेखनी का कमाल है । ।

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  8. कविता को महसूस कर रहा हूँ. बहुत ही मर्मस्पर्शी !

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  9. आपको पता है माँ कि ये मेरी कमजोरी है। कुछ नहीं लिख सकता।

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  10. वाह...सुन्दर पोस्ट...
    समस्त ब्लॉगर मित्रों को हिन्दी दिवस की शुभकामनाएं...
    नयी पोस्ट@हिन्दी
    और@जब भी सोचूँ अच्छा सोचूँ

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  11. मार्मिक और दिल को छूती हुईं पंक्तियाँ

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  12. हम्म!
    यह दो थापें कितनी अमूल्य होती होंगी।

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