शनिवार, 31 दिसंबर 2016

नव-वर्ष पर -


*
नया वर्ष मन में उछाह भरे ,
पथ के अवरोध हरे .
सन्मति से भरे लोक .जागे कल्याण बोध 
शान्तिमय हुलास की उजास चहुँ ओर झरे !
*

शुक्रवार, 18 नवंबर 2016

अनुष्ठान .

*
पुराने जर्जर होते नक़्शे से 
एक नई तस्वीर बन रही है -
चल रहा है 
 नवोदय का
 अनुष्ठान !
*
पुनर्निर्माण पूर्व की 
अवश्यंभावी उठा पटक.
हट जाये कूड़-कबाड़,
सदियों की जमी हुई कलौंच छुटे ,
दाग-धब्बों से रहित 
धुंध -धूल से स्वच्छ ,
निर्मल हो थल-जल-मनस्तल .
*
खलल पड़ेगा बहुतों के आराम में 
अवरोध खड़े होंगे ,
व्यवधान पड़ेंगे,   
 बाधायें बहते प्रवाह में .
 लेकिन महायज्ञ कहाँ संभव,
 समिधायें डाले  बिना .
*
आस्था का तेल ,
श्रम की बाती 
और विश्वास की लौ निष्कंप जले !
रोशनी से दमक उठे कोना-कोना.
हमारा सौभाग्य कि 
साक्षी-सहभागी हैं ,
इस  आयोजन में .
*
मंत्र-पाठ चल  रहा है 
सर्व कल्याण के विधान का,
आज की शंकाओं से आगे 
आगत संतानो के समाधान का .
हव्य पाने उठ रहीं
हवन की लपटें .
यह आँच ,
कष्टमय भी ,वरेण्य है.
*

रविवार, 30 अक्तूबर 2016

दीपों का अभिनन्दन -


*

इस भू-लक्षमी् की पूजा में तत्पर हो , 
जो दीप जग रहे सरहद की देहरी पर ,
वे दूर-दूर तक रोशन करें दिशायें ,
जन-जन के उर की  स्नेह -धार से सिंच कर  .

नव ऊर्जा से आवेगित  स्फीत  शिराएँ ,
सामर्थ्य-शौर्य की गूँजें नई कथायें 
जय-श्री दाहिने हस्त ,विघ्नहर संयुत, 
 हो वाम पार्श्व में अजिता , रिपु  थर्राए  .

 अपने उन  रण  दीपों के अभिनन्दन को ,
हम बढ़ें पुष्प-अक्षत की अंजलि ले कर !
इस भू-लक्ष्मी की पूजा में तत्पर हो , 
जो दीप जग रहे सरहद की देहरी पर !
*

शुक्रवार, 21 अक्तूबर 2016

धिक्कार -

*

धिक्कार नं. 1.
तोड़ा घर बाँटा आँगन भी बाप कर लिये दूजे
अनजानी गैरों की  धरती को तीरथ कह पूजे  
गर्भनाल उनके बापों की अब भी जहाँ गड़ी है   
 हीन मनों में उस धरती के प्रति यों घृणा भरी है  .

 पुरखों को नकार  भागे थे ये कृतघ्न औ कायर 
अपने सारे सच झुठला देते हैं जिल्लत सह कर .
अरे, अभी उनकी तो  नानी यहीं  कहीं पर होगी -
 ऐसी औलादों पर अपने करम कूटती  रोती.

युग-युग के संस्कार भूल बन बैठे कैसे बर्बर,
हम ही जियें पूर्व पुरुषों के नाम-निशान मिटा कर ,
अर्जित ज्ञान ,कला विद्यायें औऱ सभ्यता-संस्कृति 
उनके लिये व्यर्थ हो जातीं ,पशुवत् हो जिनकी मति .

सब अस्तित्व  मिटा डालेंगे धरोहरी कृतियाँ भी ,
इतिहासों के पृष्ठ साक्षी देते उन अतियों की .
धिक्, ऐसे लोगों पर जो इंसानी शक्लें धारे 
प्यास खून की लिये हुये ,मानवता के हत्यारे .

जन्नत इनके लिये जहाँ पर  हूरें मिलें बहत्तर ,
ऊपर से गिलमा-लौंडों की भीड़ खड़ी हो तत्पर .
अब तो मिलें शहद की नदियाँ ,हूरें हों गिलमा हों 
ऐसी मेहर होय अल्ला की हरदम रँग-रलियां हों 

एक बार उकसा कर हव्वा ने हमें यहाँ ला डाला 
किन्तु अक्ल पर हम जड़ देते अल्ला वाला ताला 
सारी मर्यादा नरत्व की तोड़-तोड़ फेंकी है, 
आपस में लड़ मरो  धरित्री  तुम्हें शाप देती है.

यह उन्माद कहाँ ले जायेगा ,क्या  दे पायेगा  ,
सदियाँ धिक्कारेंगी तुमको, समय बीत जायेगा 
क्या थे ,क्या हो गये ,पीढ़ियाँ झोंक रहे दोज़ख में ,
सोचो ज़रा कहाँ जाते हो यदि मानव हो सच में !

*
धिक्कार नं. 2.
और यहाँ पर आस्तीन के साँप पले हैं घर में 
काँटे बिछा रहे जो आगे बढ़ती हुई डगर में.
उड़ा रहे जो थूक वतन पे मर मिटनेवालों पर .
 हर छींटा बन जाय तमाचा उनके ही  गालों पर .

आँखों और अक्ल पर चर्बी चढ़ी हुई जो, छाँटें.
कैसा व्रत है कठिन ,जरा वे देखें स्वयं निभा के .
खा-खा जिस पर  पले उसी माटी को खूँद रहे हैं 
अपनों पर कर वार ,पराये हाथों कूद रहे हैं  .

 माँ के आंचल की कालिख बन मद में झूम रहे हैं 
अब तक इस धरती पर छुट्टे कैसे घूम रहे हैं . 
 ऐसे नमक-हरामी,जाने क्यों पैदा हो जाते 
जिस धरती पर पलें उसी पर विष के बीज उगाते  .

जहाँ निरापद दाँव देखते आक्रामक बन जाते 
जोखिम देख  भागते सच से अपनी दुमें दबा के 
इनकी अगर सुनो तो कानो में पड़ जायें छाले, 
इनकी  ढपली अलग बजे इनके सब खेल निराले  

फिफ़्थ-कालमी बाज़ नहीं अपनी हरकत से आते , 
हाथ बँटाने  के अवसर , दुश्मन से हाथ मिलाते,
जनवादी ,समवादी बनते ,धूर्त-बुद्धि धिक् उनकी 
लानत उस प्रबुद्धता पर  , धिक्-धिक् ऐसे परपंची.
*

बुधवार, 12 अक्तूबर 2016

ओ मेरे चिर अंतर्यामी !


तप-तप कर हो गई  अपर्णा, जिनके हित नगराज कुमारी ,
कहाँ तुम्हारे पुण्य-चरण ,मैं कहाँ ,जनम की भटकी-हारी!
*
कहीं शान्त तरु की छाया में बैठे होगे आसन मारे,
मूँदे नयन शान्त औ'निश्छल , गरल कंठ शशि माथे धारे ,
और जटाओं से हर-हर कर झरती हो गंगा की धारा ,
मलय-पवन-कण इन्द्रधनुष बन करते हों अभिषेक तुम्हारा!
ऐसा रूप तुम्हारा पावन , ओ मेरे चिर अंतर्यामी,
कुछ सार्थकता पा ले जीवन छू कर  शीतल छाँह तुम्हारी !
*
हिमगिरि के अभिषिक्त अरण्यों की हरीतिमा के उपभोगी,
हिमकन्या को अर्ध-अंग में धरे परम भोगी औ'योगी,
जीत मनोभव ,मनो-भावनाओं के आशुतोष तुम दाता,
परम-प्रिया दाक्षायनि के सुध -बुध खोये तुम  प्रेम वियोगी !
बन नटराज समाये निज में  अमिय-कोश भी, कालकूट भी
चरम ध्रुवों के धारक, परम निरामय, निस्पृह, निरहंकारी !
*
तापों में तप-तप कर कब से अंतर का आकुल स्वर टेरे
शीतल -शिखरों की छाया में धन्य हो उठें साँझ-सवेरे.
रति-रोदन से विगलित  पूर्णकाम करने की कथा पुरानी,
आशुतोष बन कितनों को  वरदान दे चुके औघड़दानी,
सभी यहाँ का छोड़  यहीं पर ,आसक्तियाँ तुम्हें अर्पित कर
मुक्ति विभ्रमों से पा ले  मति मेरी ऐहिकता की मारी
*
तपःपूत वनखंड कि जिस पर  जगदंबा के सँग विचरे हो ,
गहन- नील नभ तले  पावनी गंगा के आंचल लहरे हों ,
उन्हीं तटों पर कर दूँ अपना सारा आगत  तुम्हें समर्पित ,
भूत भस्म  हो , विद्यमान पर तव शुभ-ऐक्षण के पहरे हों,
अब मत वंचित करो  प्रवाहित होने दो करुणा कल्याणी ,
*
अवश कामना मेरी पर  ,अतुलित शुभकर सामर्थ्य तुम्हारी !
कहाँ तुम्हारे पुण्य-चरण ,मैं जनम-जनम की भटकी-हारी!
*

सोमवार, 3 अक्तूबर 2016

मातृभूमि के वीर जवानों से


(मातृभूमि की रक्षा में सतत तत्पर हमारे वीर जवानों के लिये जब कोई आपत्तिजनक भाषा बोलता है तो अंतर उद्वेलित हो उठता है. इस देश की प्रत्येक माँ के हृदय  में अपने व्रती पुत्रों के प्रति जो भाव उमड़ते हैं उन्हें व्यक्त करने का एक प्रयास है यह कविता ..)

मातृभूमि के वीर जवानों से ....

ज़रा झुको तो वत्स, भाल पर मंगल तिलक लगा दूँ 
उमड़े  अंतर के भीगे  आशीषों से नहला दूँ .
उन्नत भास्वर भाल भानु का जिस पर तेज निछावर 
अंकित कर दूँ वहीं यशस्वी जय के संकेताक्षर .

कृती, तुम्हारी ओर नीति है ,न्याय, मनुजता का सच,
कितना संयम रख तुमने स्वीकारा वीरोचित व्रत.
मेरा दृढ़ दाहिना अँगूठा परसे चक्र तुम्हारा,
रंध्र-रंध्र से फूट चले नव-ऊर्जाओं की धारा .
 ले लूँ  सभी बलायें अक्षत-कण धर दूँ चुटकी भर 

द्विधाहीन मन  जो निश्चय  कर डाले वही अटल है ,
तुम न अकेले साथ  सदा मानव-सत्यों का बल है 
 यहाँ  हमीं को निबटाना है पले हुये साँपों को
 भितरघात करते द्रोही  इन  धरती के पापों को 
 शेष न रहने देंगे अब  ऐसे  पामर इस भू पर .

जननी की ममता तुम पर हो छाँह बनी सी  छाई
बहनों के कच्चे धागों में कितनी आन समाई ,
वीर तुम्हारी प्रिया विकल हो पथ हेरे जब  पल-पल ,
युद्धभूमि में उद्धत बनी जवानी तोड़े रिपुबल 
आज हिसाब चुका लेने का मिला प्रतीक्षित अवसर .

हर संकट में व्याकुल हो धरती ने तुम्हें पुकारा ,
व्रती,तुरत आगे बढ़ तुमने हर-विधि हमें उबारा .
कष्टों भरा विषम जीवन जी बने रहे तुम प्रहरी ,
मातृभूमि के लिये  हृदय में धारे निष्ठा गहरी .
अपने सारे पुण्यों का फल आज लुटा दूँ तुम पर !

कृती, प्रभंजन हार चले चरणों की गति के आगे ,
देख पराक्रम थिर न रहे बैरी का अंतर काँपे .
 मत्त चंडिका झूम उठे  पा  अरिमुंडों की माला,
शत्रु स्तब्ध रह जाय कि किससे आज पड़ गया पाला 
 गूँज रहा हो 'जय-जय-जय' की ध्वनि से सारा अंबर !

सिर ऊँचाकर  लौटो , कुशल मनाएँ यह मन पल-पल ,
नयनों के स्नेहाश्रु करें ओ व्रती , तुम्हारा मंगल  !
फिर दीवाली हो,घर-घर फुलझड़ियाँ  खील-बताशे ,
तुम आओ, यश की गाथायें चलें तुम्हारे आगे .
बिछा हुआ मेरा स्नेहांचल  वत्स, तुम्हारे पथ पर .
----- 
- प्रतिभा सक्सेना

सोमवार, 12 सितंबर 2016

सार्थक रहने दो शब्दों को --

*
क्या  शब्द था - दिव्य !!!
जैसे प्रसन्न आकाश , मुक्त,भव्य ,असीम .
कितना सार्थक दीप्त त्रुटिहीन .

अर्थ का अनर्थ ,
घोर अपकर्ष ,कैसी  मनमानी वंचना शब्दों से ,
कर डाला ,अपूर्ण ,विकल , विहीन.
*

 संज्ञा बदलने से गौरव  नहीं मिलता,  
 बिंब-प्रतिबिंब-सा
 है  दृष्य और दृष्टि का संबंध .
पूर्ण कौन  यहाँ ?
कहीं न कहीं सब  अधूरे .
और यही विकलता की तड़प 
नये मार्ग खोल, सारी क्षति पूर्ति के साथ 
नये अर्थ देती है .
*
 व्यक्तित्व से पाते हैं शब्द  
अर्थ और  उत्कर्ष -
जैसे सूर ,
अंधत्व को सूरत्व से प्रतिस्थापित , 
जैसे रैदास हीनता को
 गुरुत्व प्रदान कर गये .
जैसे एक दृष्टिहीन 
औरों को बना गया  समर्थ,
शब्दों का स्पर्श  दे कर .
*
एक और शब्द - हरिजन .
कितने सम्मान का पात्र रहा . 
 गिरा  डाला इसे भी -
खो बैठा वास्तविक अर्थ  और गरिमा 
बन गया  हत-नत कृपाकांक्षी   .
*
मत करो शब्दों की छीछालेदर ,
 सार्थक-समर्थ  निर्मल रहने दो ,
कि भाषा के अपने संसार में 
 पूरे अर्थ के साथ ज्योतित रहें.
आगत को संचित संस्कार देते   
अपनी विद्यमानता से 
चिरकाल धन्य करें !
*
प्रतिभा सक्सेना.

सोमवार, 22 अगस्त 2016

कवि से --

( यह कविता प्रस्तुत करते मन में संशय है कि कोई आद्यन्त पढ़ेगा भी  .फिर भी  ब्लाग है मेरा , यहाँ अंकित करूँगी तो ही ...)
*
 कवि,

महाकाल ,माँगता नहीं मृदु-मधुर मात्र ,
 सारे स्वादों से युक्त परोसा वह लेगा.
 भोजक, सब रस वाले व्यंजन प्रस्तुत कर दे
 अपनी रुचि का वह ग्रास स्वयं ही भर लेगा .
रसपूरित  मधु भावों के संग तीखे कषाय भी हों अर्पण
वर्णों -वर्गों में स्वर के सँग धर दो  कठोर और कटु व्यंजन
उसकी थाली में सभी स्वाद ,सारे रस- भावनुभाव  रहें
अन्यथा सभी को उलट-पलट अपना आस्वादन ढूँढेगा !
*
रुचि का परिमार्जन है अनिवार्य शर्त उसकी
उन दाढ़ों में सामर्थ्य कि सभी करे चर्वण ,
कड़ुए का खट्टे का परिपाक न पाया तो
अपने हिसाब से औटेगा ले वही स्वयं.
उस रुद्र रूप को  ,तीखापन ज़्यादा भाता
युग -युग के संचित कर्मों के  आसव के सँग
नयनों में उसके थोड़ा नशा उतर आता ,
खप्पर में भरे तरल का ले अरुणाभ रंग ! 
*
वह ग्रास-ग्रास कर जो भाये वह खायेगा ,
जब चाहे जागे  या चाहे सो जायेगा
उसकी अपनी ही मौज और अपनी तरंग !
 कवि ,उसको दो जीवन का  आस्वादन समग्र !
सबसे प्रिय भावांजलि ही स्वीकारेगा
दिख रहा सभी जो उसका एक परोसा है ,
क्रम--क्रम से कवलित कर लेना उसका स्वभाव .
*
बाँटता अवधि का दान कि जिसका जो हिस्सा ,
 सिर चढ़ कर वह कीमत भी स्वयं वसूलेगा ?
भोजन परसो कवि ,महाकाल की थाली में,
षट्र्स  नव रस में परिणत कर दो  नये स्वाद ,
पकने  दो उत्तापों की आँच निरंतर दे ,
रच रच पागो  अंतर की कड़ुआहट- मिठास
नित-नूतन स्वाद ग्रहण करने का आदी है ,
परिपक्व बना प्रस्तुत कर दो
स्वर के व्यंजन
नव रस भर धर  उसके समक्ष .
*
हो वीर -रौद्र सँग करुणा में डूबा विषाद !
वत्सलता उन नन्हों को जो बच जाते हैं
निर्- आश्रित  हो उस विषम काल के तुरत बाद !
कवि अगर दे सको ,अपने कोमल भाव उन्हें ,
दे दो उछाह से भरा प्रेम का राग उन्हें !
मुरझाई छिन्न  कली को साहस शान्ति धीर ,
बेआस बुढ़ापा शान्ति- भक्ति  से संजीवन !
 सब उस अदम्य की थाती  शिरसा स्वीकारो
कुछ नये मंत्र उच्चार करो दे नये तंत्र का आश्वासन !
*
निश्चिंत हृदय निश्चित सीमा , अग्रिम ही सब कुछ लो सँवार,
सब डाल चले अपने खप्पर में भऱ वह जब
यों ग्रहण करे तो धन्य समझ अन्अन्य भाग !

वह जन्म-मृत्यु का भोग लगाता नित चलता !
जो दाँव स्वयं को लगा ,सके आगे आये
अपनी अभिलाषा आशायें आकर्षण भी
 सारे सपने उसके खप्पर में धर जाये !
कवि वह अपराजित टेर रहा ,लाओ दो धर
बढ कर चुन  लेगा  ताज़े पुष्प मरंद भरे
सबसे टटकी कलियाँ बिंध माल सजायें उसकी छाती पर ,
उसकी पूजा में  कौन डाल पाये अंतर !
*
अक्षत अंजलि संकल्पित हो सम्मान सहित  ,
जो बिना शिकायत सहज भाव  न्योछावर  दे
बिन झिझके सौंपे अपने प्रियतम चरम भाव
निरउद्विग्न मनस् धर चले ,आरती- भाँवर दे !
 
 धर दे निजत्व उसके आगे विरहित प्रमाद !
प्रस्तुत कर दे रे, महाकाल का महा- भोग
तू भी है उसकी भेंट ,स्वयं बन जा प्रसाद !
*
उसके कदमों की आहट पर जीते हैं युग ,
उसके पद-चाप बदल देते इतिहासों को !
संसार सर्ग,युग एक भाव ,
मन्वंतर कल्प करवटें ,युग-संध्यायें निश्वास हेतु
इस महाकाश में लेते उसके चित्र रूप !
है महाकाव्य यह सृष्टि, बाह्य-अंतःस्वरूप
अनगिनती नभ-गंगायें ये विस्तृत-विशाल ,
उसका आवेष्टन रूप व्याप्तिमय व्याल-जाल !
उस महाराट् के लिये
बहुत लघु,लघुतम हम ,
पर उस लघुता में भी है उसका एक रूप !
*
बस यही शर्त ,जिसको भाये आगे आये
आमंत्रण स्वीकारे , तम के  प्रतिकार हेतु ,

अनसुनी करे जो इस दुर्वह पुकार को सुन,
वह लौट जाय निज शयन-भवन अभिसार  हेतु !
*  
कवि ,चिर प्रणम्य वह माँग रहा
तेरे उदात्ततम अंतःस्वर !
जिसमें युगंधरा गाथायें निज को रचतीं !
जो महाभाव से  आत्मसात् हो सके सतत्
 उसका अपना स्व-भाव उसकी तो परख यही
सत्कृत कर ,धरो सधे शब्दों का ऐसा क्रम ,
जिसमें तुम समा सको संसृति के चरम भाव !
*
वह नृत्य करेगा महसृष्टि को मंच बना ,
लपटों को हहराता सब तमस् जला देगा ,
उन्मत्त चरण धर आकाशों को चीर-चीर
क्षितिजों के घेरे तोड़ गगन दहका देगा !
*
भीषण भावों के व्यक्त रूप मुद्राओं में
भर मृत्यु- राग उठते भैरव डमरू के स्वर
लिपि बद्ध कर सको भाषा में लक्षित-व्यंजित
तो समझो तुम तद्रूप हो गये अमर-अजर !

*

बुधवार, 13 जुलाई 2016

काँच की चूड़ियाँ -

*
स्वर्ण मुक्ता रतन की ठनक है बहुत ,
काँच की चूड़ियों की खनक और है .
मोल उनका बज़ारों में खुल कर लगे ,
पाप इनके लिये  दूसरा ठौर है .
*
झिलमिली सी झनक में बिखरती 
लहर सी ,तरंगित तरल-सी मधुर व्यंजना.
रेशमी रंग की पारदर्शी दमक
पर सँभल कर कि कस कर पकड़ना मना .
*
टूटने का ,बिखरने का, चुभने का डर
 चूड़ियाँ मौल जायें तो जुड़ती नहीं 
काँच की चूड़ियाँ लिख गईं नाम से 
रत्न-मु्क्ता किसी के हुये हैं कहीं !
*
काँच की चूड़ियों में प्रणत स्वर लिये  ,
मान भीनी,सहज भंगिमा भाव की
कुछ लजीली झिझक की निमंत्रण भरी 
मोहमय एक मनु हार  सुकुमार-सी .
*
चार दीवार औ' छाँह सिर पर मिले ,
घर बनातीं ,रहो  तुम कि अधिकार से ,
काम रोके बिना ही खनक या छनक
मूड़ अपना जतातीं मुखर नाद से  .
*
राग सुन ,बेलने का इशारा समझ ,
लोइयाँ नाचतीं  गोल रोटी बनीं ,
दाल  में तुर्श तड़का झनाके भरा, 
सब्जि़याँ  बिन छनाके के रसती नहीं  . 
*
 मिल गईं भाग से तो जतन से रखो   ,
चोट खाकर न चटकें  चुभन से भरें .
 ये असीसों भरी चूड़ियाँ  रँग-रची ,
 नेह-बाती बनी पंथ रोशन करें !
*

गुरुवार, 7 जुलाई 2016

कृष्ण या राधा !

*
प्रेम की परिकल्पना राधा ,
जहाँ कोई भी न भव बाधा !


भावना सशरीर, मर्यादा अभौतिक,
गहनतम अनुभूति की यह डूब ,
मग्नता का कहीं ओर न छोर.

बिंब औ'प्रतिबिंब दोनों एक ,
 राग की अभिव्यंजना राधा !
*
विरह पलती  प्रेम  की गाथा ,
निविड़ उर- एकान्त ने साधा.

सम समर्पण जहाँ दोनों ओर,
शेष रह जाता अरूपित भाव
नाम हो फिर कृष्ण या राधा ! 

*

रविवार, 19 जून 2016

पितृत्व -

*
नहीं,
मैं नहीं एकान्त निर्मात्री,
इस सद्य-प्रस्फुट जीवन की,
रचना मेरी, आधान तुम्हारा
सँजो कर गढ़ दिया मैंने नया रूप .
प्रेय था!


पौरुष का माधुर्य छलक उठा जब
नयनों में वात्सल्य बन,
जैसे चाँदनी में नहाई बिरछ की डाल,
स्निग्ध कान्ति से दीप्त तुम्हारा मुख!
मुग्ध हो गई मैं .


कृतज्ञ दृष्टि कह गई-
'जहाँ मैं अगुन-अरूप-अव्यक्त रहा,
तुमने ग्रहण किया.
प्रतिष्ठित कर दिया मुझे!
अपने से पार
पुनर्जीवन पा गया मैं,
तुम्हारे रचे प्रतिरूप में! '


सृष्टि का श्रेय आँचल में समाये
मुदित परितृप्ति का प्रसाद,
मिल गया मुझे,
और देहानुभूतियों से परे,
मन की विदेह-व्याप्ति!

*
- प्रतिभा.

सोमवार, 6 जून 2016

लेखन और नारी

*
रचनात्मकता का पर्याय है नारी ,
प्रकृति ने दिया सृजन का वरदान -
नेहामृत से सींच  ,भावनाओं से पाग
नेह-मोह के सूत्रो से संचार
नित नये स्वरूप सजा रंगभूमि पूरे    
 कि अभिनय क्रम टूटे नहीं  ,
 लीला अविराम चले !
*
सब कुछ अनायास ,
सरल-सहज-संगत,
कोई शिकायत नहीं,
मन में प्रतीति लिये
निर्द्वंद्व सहचर  भाव.
नैसर्गिक जीवन.
शान्ति, सहयोग ,अपनत्व आश्वस्ति भरा .    
*
 

    होने लगा पौरुष का भान ,
 सर्वश्रेष्ठ मैं समर्थ .जागा अभिमान
  स्वामी हूँ, कर्ता हूँ ,धरता हूँ भार
 सेवा-सुविधा का अधिकारी विशेष.  .
 नियमन-नियंत्रण के रहें प्रतिमान
 सारी व्यवस्था हो मेरेअधीन
रीति-नीति मान-मर्यादा, व्यवहार
*
शान्ति रहे ,
संसृति न बाधित  हो 
 तुष्टि रहे ,पुष्टि रहे
सुख से समष्टि रहे
चलता रहे गति का  सम  .
समझौता करने में
कौन फ़रक पड़ता है
बात एक ही है 
तुम और मैं मिल हो गये एक - हम ,
*
लेकिन
बात एक कहाँ ?
श्रेय सिर्फ़ स्वामी को मिलता है !
अनुसारी आज्ञा पर चलता है.
भार मैं लिये हूँ,  तुम आश्रय पाती हो
गाती रहो  माँडने सजाती रहो
रहो अनुकूल ,सदा यों ही निभाती रहो,
हो कर समर्पित ,चैन की धुन बजाती रहो .
*
कभी मन मचलता है ,
कुछ कहने देने को अंतस् उबलता है
 मौन नहीं रहता आवेग मुखर होता जब
 बिखर-बिखर जाता  
 कभी चक्की के पाटों सँग ,थकी हुई  रातों में ,
 करुण-मधुर, सुख-दुख के गीत बना
कुछ भी न कह भी बहुत कुछ जताती रही!
 हृदय  भर आये  तो रोती और गाती रही.
हँसा - तभी तो दुर्बलता नाम नारी है .
औरत है ,रोने की आदत है ,
 सोच-समझ कहाँ ,अक्ल से तो अदावत है.
*

एक प्रश्न पूछूँ नर -
कल्पना-कथायें गढ़ लेना है और बात,
 सचमुच संवेदना के साथ निभा पाये क्या ?
 घेर कर दिवारें कभी बना तुम पाये घर ?
शिशु के भिगोये में सोये हो रात भर ?
कन-कन बटोर कभी राँध कर खिलाया,
 भूखे बालक को  कभी नेह भऱ हँसाया ?
लगातार कमियों से जूझे चुपचाप कभी
या कि सब झमेला छोड़ कर गये पलायन 
खोल लिये नये द्वार, नये वातायन?
*
 रोशनी में लाये कौन,
 देखे बिना माने कौन
 सुविधा,और साधन सभी तो तुम्हारे
 ये फैली हुई धरती और  खुला हुआ आसमान.
 किन्तु हर ओर घात ,देखो रे खोल आँख 
 सूचना उसी के लिये -  
 - 'सावधान , सावधान !'    
सच-सच बताओ, अपने समान माना कभी?

व्यक्ति और व्यक्ति का संबंध - पहचाना कभी?
*
कैसा प्रकाशन, हर ओर गिद्ध और बाज़,
केवल अँधेरा पाख ,कहाँ नहीं सौदेबाज़,
 भाँप रहे - कौन चाल चलें, हो जायें निहाल.
शर्तें हज़ार , रपटीली है सारी डगर,
 नारी के लेखन पर ,लगे बड़े मगर-अगर !
 *
- प्रतिभा सक्सेना.

( यह पोस्ट पहले प्रकाशित हुई थी किन्तु किसी त्रुटि के कारण  ग़ायब हो गई अतः पुनः डाल रही हूँ - जो बहुमूल्य टिप्पणियाँ इस पर  अंकित थीं , मुझे दुख अहै कि यहाँ अप्राप्य हैंं .
मैं उनके  लिये  क्षमा प्रार्थी  हूँ .- प्रतिभा. .)

सोमवार, 15 फ़रवरी 2016

रुकी हूँ अभी

*
घुट कर रह जाते शब्द, ,
व्यक्त नहीं होते मनोभाव - 
मैं तुम्हें श्रद्धाञ्जलि कैसे दूँ ?
*
पल-पल मनाया था -
 जीत जाओ काल से ,
तुम - जिसने हाड़ गलाते हिम झंझाओँ में
झोंक दिया था जीवन -
तन, यौवन सारे सपन ,
परिणीता का सुहाग , पुत्री का वत्सल-प्रेम ,
जननी-जनक का आसरा .
 *
सिर पर कफ़न बाँध
कैसे जिये होगे उन मरणान्तक दुर्गमों में,
 कि दुश्मन के पाँव छू न सके हमारी मातृ-भू .
*
स्तब्ध रह जाती हूँ सोच कर -
आज को तुम होते.....
 कैसे झेल पाते ,
यहाँ चल रही घातें
धूर्तों की करतूतें,
देश-द्रोहियों की जमातें ?
*
जूझे तुम जिन दुश्मनों से
उन्ही के पिट्ठू और उन के आका,
 यहीं बैठे हैं ठाठ से नमक हरामी,
तुम्हारे किये धरे पर पानी फेरते
 षड्यंत्र रचते ,इस धऱती की  बर्बादी के.
दूध पी-पी कर ये जहरीले साँप
 विष-वमन करते अबाध  घूम रहे चारों ओर !,
और यहाँ बसे  कायर ?
हाथ पर हाथ धरे देखे जा रहे जैसे कोई तमाशा !
 क्या-क्या बताऊँ  तुम्हें ,और कैसे ?
*
 नहीं अभी नहीं ,
तुम्हारी निष्ठा को नमन करते शब्द जागे नहीं अभी.
 लोक में  भावों का बड़ा अभाव  है .
चेत जाये मन  ,
एक झटके से आँख खुल गई हो  ज्यों ,
तन्द्रा से जाग 
 अँगड़ाई  ले  अलस पड़ा तन
ऊर्जस्वित हो उठे देश का यौवन. 
कुछ कर डालने को तत्पर .
*
रुकी हूँ कि ये विष- बेलें कट जायें ,
इस धरती के कलंक मिट जायें
वातावरण स्वच्छ , दृष्टियाँ स्वस्थ  ,
और मन निस्वार्थ निश्छल.
तब हे परमवीर ,(शायद किसी दूसरे जनम मे),
अर्पण करने आऊँगी

तुम्हारी प्रतिष्ठा में
अंतःस्रजित भावाञ्जलियाँ सजल !
*
- प्रतिभा सक्सेना.