बुधवार, 13 जुलाई 2016

काँच की चूड़ियाँ -

*
स्वर्ण मुक्ता रतन की ठनक है बहुत ,
काँच की चूड़ियों की खनक और है .
मोल उनका बज़ारों में खुल कर लगे ,
पाप इनके लिये  दूसरा ठौर है .
*
झिलमिली सी झनक में बिखरती 
लहर सी ,तरंगित तरल-सी मधुर व्यंजना.
रेशमी रंग की पारदर्शी दमक
पर सँभल कर कि कस कर पकड़ना मना .
*
टूटने का ,बिखरने का, चुभने का डर
 चूड़ियाँ मौल जायें तो जुड़ती नहीं 
काँच की चूड़ियाँ लिख गईं नाम से 
रत्न-मु्क्ता किसी के हुये हैं कहीं !
*
काँच की चूड़ियों में प्रणत स्वर लिये  ,
मान भीनी,सहज भंगिमा भाव की
कुछ लजीली झिझक की निमंत्रण भरी 
मोहमय एक मनु हार  सुकुमार-सी .
*
चार दीवार औ' छाँह सिर पर मिले ,
घर बनातीं ,रहो  तुम कि अधिकार से ,
काम रोके बिना ही खनक या छनक
मूड़ अपना जतातीं मुखर नाद से  .
*
राग सुन ,बेलने का इशारा समझ ,
लोइयाँ नाचतीं  गोल रोटी बनीं ,
दाल  में तुर्श तड़का झनाके भरा, 
सब्जि़याँ  बिन छनाके के रसती नहीं  . 
*
 मिल गईं भाग से तो जतन से रखो   ,
चोट खाकर न चटकें  चुभन से भरें .
 ये असीसों भरी चूड़ियाँ  रँग-रची ,
 नेह-बाती बनी पंथ रोशन करें !
*

9 टिप्‍पणियां:

  1. जय मां हाटेशवरी...
    अनेक रचनाएं पढ़ी...
    पर आप की रचना पसंद आयी...
    हम चाहते हैं इसे अधिक से अधिक लोग पढ़ें...
    इस लिये आप की रचना...
    दिनांक 15/07/2016 को
    पांच लिंकों का आनंद
    पर लिंक की गयी है...
    इस प्रस्तुति में आप भी सादर आमंत्रित है।

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  2. वाकई कांच की चूड़ियों की खनक और धनक की बात ही कुछ और है..आपके संगीतमय शब्दों ने जब उनकी महिमा गाई हो तो क्या कहने..आजकल तो इनका प्रचलन कम होता जा रहा है पर अभी भी कितनी ही कलाइयों की शोभा बढ़ाती हैं...हरे कांच की चूड़ियाँ...

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  3. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (16-07-2016) को "धरती पर हरियाली छाई" (चर्चा अंक-2405) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  4. शकुन्तला बहादुर23 जुलाई 2016 को 10:25 pm

    नारी के सौभाग्य एवं शृँगार की प्रतीक काँच की चूड़ियों की खनक मन को
    उल्लसित कर जाती है । नारी भावनात्मक रूप से काँच की चूड़ियों से जुड़कर स्वयं को गौरवान्वित भी अनुभव करती है । उस आनन्दानुभूति को सुन्दर शब्दों में सँजोने के लिये कवयित्री को अनेक साधुवाद !!

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  5. वाह ... कितने कितने आयाम ... कितने बिम्ब, कितने मंजर खड़े कर दिए कांच की चूड़ियों की थाह को सार्थक कर दिया आपने ...

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  6. रीझि रीझि रहसि रहसि ज्यों चूँड़ियाँ रंग रचीं

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  7. नेह भरे शब्दों से समझाना चाहा है कि जातां से रखो , इन चूड़ियों वाले हाथ जिनके हों उन्हें कोई चुभन न हो .... पर होता कहाँ है ऐसा ..सबसे ज्यादा चोट तो इनको ही मिलती है .

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