मंगलवार, 16 सितंबर 2014

कुँआरी नदी - 3 .

24.
बहता चला जा रहा शोण, ले के चढ़ती उमरिया  का रोर ,
अपने में डूबा ,उछाले मछरियाँ  उमंँगें तरंगे  अछोर .
सोने सा रँग ,रूप दमके सलोना , डोले तो धरती डुलाय,
गज भर का सीना ,पहारन सी देही ,बाहों में पौरुख अपार .
25.
देखा न ऐसा पुरुष कोई  अब लौं, जुहिला तो आपा भुलानी ,
पग की उतावल थकी,जइस उफनत गोरस पे छींट्यो पानी   .
मनकी ललक और तन की छलक पीर जागी हिया में अजानी
हाय रे ,कैसा बाँका मरद ,देख दूरहि ते जुहिला सिहानी.
26.
आई कहाँ से सुवास ,खिल गई ज्यों  बकावलि पाँत,
चौंका सा   देख रहा शोण,  नई रंगत नए आभास .
स्वप्न है  या कि सच ये यहाँ, मन अजाने भरमने लगा ,
एक दृष्यावली सामने और कौतुक संँवरने लगा .
27.

तन के वर्तुलों पर बिखरता  उमड़ी लहर का जल ,
उछलती  मोतियों सी ,झलकतीं बूँदें चमक चंचल ,
असंख्यक  झिलमिलाते कौंध जाते हार हीरों के -
नगों की जगमगाती जोत, जल में बिछलती पल-पल !

28.
 दिखाती इन्द्रधनु सतरंग बूँदों के,
दमकती देह लहराती बही आती -
फुहारें छूटतीं या टूटतीं नग-हार की लड़ियाँ ,

हिलोरे ले तटों तक की शिराएँ दीप्त कर जाती!
तभी मधु-स्वर -

' नमस्ते भद्र ,यह शुभ दिन दिखाया धन्य हूँ मैं तो '
जुड़े कर ,मोहिनी सी डाल ,लहराती  समुन्मुख हो .'
चकित बोला,'शुभागम हो ,तनिक विश्राम ले लें अब.

भ्रमण का हेतु,परिचय ,जानने को मन हुआ उत्सुक.'
30
' बदल इतने गए , पहचान मैेैं भी तो नहीं पाती,
वही तुम भद्र, बचपन के, न यह अनुमान भी पाती .'
भ्रमित -सा शोण, 'बचपन में कहाँ?' बोली,' अमरकंटक.
वहीं से तो चली  ,बीहड़ वनों में खोजती यह  पथ !'
31.
' बरस बीते, शिखर वह रम्य जीवन का 'अमरकंटक' 
सभी कुछ याद आया नाम सुन तुमसे 'अमरकंटक' !
तुम्हारी वास स्मृतियों को जगा, भटका रही है क्यों ?
'वही हो तुम, वही' - फिर फिर यही दोहरा रही है क्यों ?
32.
मिली है बुद्धि  इतनी तो कि मैं अनुमान कर पाऊँ
तुम्हारी राजसी भूषा निरख, पहचान मैं  जाऊं .
यही तो गंध मेरी है ,तुम्हें सौगंध है मेरी   .
बकावलि शर्त जीता मैं ,वही अनुबंध हो मेरी .'
33.
इसी के तो लिए मैं दुर्गमों में वर्ष भर भटका ,
अँधेरी घाटियों में पर्वतों में भी नहीं अटका .
भयंकर नाग-दानव-यक्ष सबसे पार पाया था  ,
बिंधा था कंटकों से ,मृत्यु से भी जूझ आया था.
34.
भरे व्रण देह के ,लेकिन कसक अब भी उभर आती ,
प्रिया को अंक में पाए बिना क्यों शान्त हो पाती .
सकारथ हो गया ,पाया तुम्हें, बस शेष अब कुछ दिन ,
तनिक तुम पास आओ,तृप्ति कुछ पाये,तृषित यह मन .
35.
तुम्हारे प्रेम की गरिमा, कठिन पथ चल यहाँ आईँ ,
सुकोमल पग-करों को ,पा गया सौभाग्य सहलाऊँ .'
तनिक मुड़, अँगुलियों से पत्र बाहर खींचने का क्रम ,
उसी क्षण  शोण उस  उत्तेजना में कर गया व्यतिक्रम.
36.
चौंक जुहिला गई और डगमग हुई
वह सँभलते-सँभलते थमी रह गई ,

नीर उफना उठा वेग-आवेग में ,
और पाती न जाने कहाँ बह गई !
37.
कुछ न पूछा, न कुछ भी बताया,
लहर से लहर मिल गई बोल चुप रह गये .
दो प्रवाहों का ऐसा उमँगता मिलन
शोण-जुहिला मिले साथ ही बह गए !
38.
सब भूल शोण की लहरों में जा डूबी,
फिर  लाज शरम सब बिला गई पानी में
आदिम नारी बन गई आदिवासिन तब ,
उस काम्य पुरुष की उद्धत मनमानी में !
39.
 जुहिला तो वहीं विलीन हो गई सचमुच ,
अब लौट कहाँ पाए अपनी  राहों में?
 सब कुछ बीता हो जाता, उस नारी का  ,
जो समा गई जाकर नर की बाहों में !
40
फिर देश-काल मर्यादा कौन विचारे ,
यह दोष स्वभावों में धर गया विधाता ,
देहोन्माद आवेग उमड़ता जब भी 
सुर-नर-मुनि कोई नहीं यहाँ बच पाता  !
*
 रात है या दिन न जाने शोण -
स्तब्ध बरहा ग्राम , दशरथ घाट .
हो गया क्या ,आँख फाड़े -

मौन छाया है  ,महा-आकाश !
*

(क्रमशः)

18 टिप्‍पणियां:

  1. आपने 'झेलम का पत्र ' में 'लहरों की लिपि' लिखा है न ! एकदम वही आभास हुआ. मैं कैसे शब्द दूँ अपने मनोभावों को,समझ नहीं पा रही हूँ. २८ वां पद बहुत बहुत सुन्दर लगा, जैसे शहद चख लिया हो. कितना मधुर, मनोहर, अलंकारिक और गरिमामयी काव्य है!! आरंभ में पढ़ते हुए शोण ने एक पुरुष देह का आकार लेना शुरू किया। किन्तु पूर्ण होने के पहले ही वही 'लहरों की तरल वर्णमाला ' shuru ho gayi. itna sheetal saundary aapke shabdon ka...jaise aankhon ko chhute hue sab thahar bhi gaya ho..aur fisal bhi gaya ho. thande paani se mukh dhone ke baad kee sheetalta jaisa anubhav..!
    jab aapne ziqr kiya tha k aap maa narmada pe likhne walin hain..tab nahin socha tha maine ki itna maadhury hoga kavya me..maine gadhy rachna sochi thi.
    naman hai aapki lekhni aur hriday ko Pratibha ji...:-)

    (pun: aapki 'jhelam ka patr' bhi padh kar aa rahi hoon...aur 'shiv virah' bhi revise ki jaake. ek aagrah karna chahti hoon. 'shiv virah' repost kariye nakripya yahan..mere jaise agyani pathkon ke liye bahut achhi rahegi.vichar kijiyega :(...)

    adha roman me isliye likha k net weak ho gaya tha beech raah mein :''-(

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    1. तरु, 'शिव विरह 'बहुत लंबी कविता है ,सामान्यतया कोई इतनी लंबी रचना नहीं पढ़ना चाहता ,और फिर कविताएं ,वैसे भी कम पढ़ी जाती हैं .मैंने ऐसी कविताओं को अलग ब्लाग'मनःराग' में संचित कर दिया है .इस पृष्ठ पर ऊपर दूसरे नंबर पर 'लंबी कविताएँ ' शीर्षक है .जिसे पढ़ना हो, उस पर क्लिक कर उन तक पहुँच सकता है .
      तुमने इतनी रुचि से पढ़ीं और याद रखीं- लेखन सफल हुआ और मैं कृतज्ञ !

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    2. ji..behtar hai. bahut zara si narazgi wala mail kar diya aapko. baaqi kritagyata kaisi Pratibhaji..:") main hi aapki ek do poems par do do baar review diye hain..wo b aise jaisepehli dafe dkehi ho..tab to aapne merko nai daanta tha :):) abhar uttar dene k liye :')

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  2. बहुत बहुत सुन्दर !

    सादर
    अनु

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  3. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 18-09-2014 को चर्चा मंच पर चर्चा - 1740 में दिया गया है ।
    आभार ।

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  4. अद्भुत..पढ़ते पढ़ते मन कहीं खो गया...शब्दों का चयन बहुत अनोखा है और भावलोक में ले जाता है..

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  5. पूरा काव्य झंकृत कर देने वाला है ह्रदय को ...
    गहरे ताल से निकला मोतियों का खजाना ...

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  6. अद्भुत ... हमेशा की तरह प्रभावी और सशक्त अभिव्यक्ति

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  7. शकुन्तला बहादुर18 सितंबर 2014 को 8:14 pm

    शोण,जुहिला एवं नर्मदा का मानवीकरण अत्यन्त स्वाभाविक एवं ललित रूप में प्रस्तुत है ।इसभव्य काव्यात्मक चित्रण में मन डूब गया । भावों की मधुमती भूमिका ने रस से सराबोर कर दिया । इस तन्मयता में मैं कुछ भी लिखने में स्वयं को असमर्थ पा रही हूँ। क्या कहूँ ?लेखनी को सादर नमन !!

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  8. समुन्द्र से गहरा सशक्त प्रभावी रचना..आभार

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  9. प्रांजल हिन्दी के साथ लोकभाषा का समावेश सुंडा लग रहा है !

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  10. बहुत सुन्दर भावों से रचाई है ये रचना....बधाई

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  11. अद्भुत...बहुत सशक्त सभिव्यक्ति...

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  12. इतना भव्य!
    इतना सूक्ष्म!
    मैं अत्यंत भाग्यशाली हूँ जो इन क्षणों को जी रहा हूँ।
    शब्द नहीं हैं मेरे पास, शीश नवा लूँ श्रद्धा से, धन्य हुआ।

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