सोमवार, 14 जुलाई 2014

पानी बाबा आया.

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 भूरे रुएँ ,धुएँ सा तन   , पानी बाबा आया !
*
नई फसल  काँधे पर लादे,  बुँदियाँ बट-बट डोरी बाँधे   ,
टूटे-फूटे दाँत निपोरे ,दसों पोर  पानी में  बोरे ,
छींटे उड़ उड़ पड़ते  ,हँफ़नी से यों भर आया !

चढी साँस खींचे , झुक झुक के  चले बाय का मारा,
जटा जूट बिखरा ऊपर से, लथपथ  बेचारा ,
बूढ़-पुरातन मनई, डोले सलर-बलर काया !
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हिलता-डुलता भारी भरकम, कहीं रुका सा ले लेता दम ,
लाठी टेक कहीं , झटका दे टार्च फेंकता एकदम.
बज्जुर बादल गरज- तरज,  तीखा कौंधा  छाया ! 
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उमड़ -घुमड़ कर बोले अपने  अगड़म-बगड़म बोल,
करता गड़ड़-गड़ड़ गम, थम-थम जैसे बाजे ढोल .
ठोंक बजा कर पाँव बढ़ाता ,  सबको  भरमाया !

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 झल्ली भर भर  आम, पल्लियाँ भर भुट्टे-ककड़ी ,
फूले हुए फलैंदे जामुन, हरी साग गठरी, .
अँगना  भर नाती-पोते , छू-छू कर दुलराया !
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अन-धनवाली झोली खाली, में हरियाली भर दी,
मोर-नाचते बूटों वाली हरी  चुनरिया धर दी .
टर्र-टर्र दादुर , पी-पी  पपिहे  ने गुहराया !
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मटियाले पानी में , हाथ घँघोता छोटा लल्ला,
बौछारों में भीगे ,भागे- कूद मचाए हल्ला -

'निकल आओ रे , ये कागज़ की नाव चली  भाय्या' !
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आज जुड़ाई  दरकी छाती ,कब की सूखी- रूखी धरती, 
रोम-रोम हरसाया, सुख पा, नैन-तलैयाँ सरसीं. 
माटी में  सोंधी भभकन , हर झोंका  पछुआया !

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नेहा-मेहा लाया रे,  पानी बाबा आया !

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18 टिप्‍पणियां:

  1. मौसम एकदम सूखे का है। प्रचंड गर्मी पड़ रही है। लेकिन आपके इस नवगीत के क्या कहने! आनंद दायक।

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    1. सावन के महीने में भारत की बरसात खूब देखी है - यहाँ रह कर ,वहाँ की कल्पना अच्छा ही अच्छा दिखाती है .(वैसे दो बार पानी बरसने की ख़बर भी आ चुकी है ).

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  2. वाह !! अगड़म बगड़म बोल बोलता....
    बहुत ही सुन्दर !!

    सादर
    अनु

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  3. वाह...वारी जाएँ इस पानी बाबा के..और आपकी अछूती कल्पना के...

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  4. बस अब तो बरस ही जाना चाहिए पानी बाबा को ...
    आपकी कल्पना शक्ति, शब्द भण्डार और लेखन कला को नमन ...

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  5. आज तो आपने दुखती रग़ पर हाथ धर दिया माँ! काश, पानी बाबा हमारे पास भी आते! यहाँ तो कोई झोला-बाबा आया लगता है जो हमारी बारिश को लकड़ी सुँघाकर, झोले में बन्द कर ले भागा है. किसी सुन्दरी को बारिश में स्नान करते देख, कई फ़िल्मों में गीत बने हैं कि "सावन में आग लगी है". लेकिन यहाँ तो सचमुच शब्दश: सावन में आग ही लगी है!!
    .
    गर्द उड़े सड़कों पे, गदहा लोट-लोट कर हारा,
    सावन में है मानुस भीगा स्वेद-कणों बेचारा
    आग लगे इस सावन में झुलसी है सबकी काया
    का जानें पानी बाबा क्यों इहाँ की राह भुलाया!

    वैसे माँ, आपके इस गीत ने सचमुच समाँ बाँध दिया है!! भीग गये हम आनन्द में!!

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    1. लो सलिल, आ गए पानीबाबा,अपनी गठरी-मुठरी सँभाले ! छतरी खरीद ली ?अब मत कहना सावन सूखा है .
      (यहाँ अख़बार से खबरें मिली हैं)

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  6. Bahut khub...Sawan ka aaj tisra din par barish to mano ruthi hui hai.

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  7. मंत्र मुग्ध सी हो जाती हूँ आपको पढ़ते हुए. हार्दिक नमन आपकी लेखनी को , आपको भी .

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  8. बहुत सुंदर कविता, प्रवाह और ऐसे सुंदर शब्दों
    का चुनाव की हैरानी होती है की हिन्दुस्तान से इतनी door रह कर भी
    ऐसे देशज शब्दों को आपने अपनी कृति मे जीवित
    रखा है.

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  9. शकुन्तला बहादुर16 जुलाई 2014 को 4:17 pm

    ध्वन्यात्मक शब्दों के प्रयोग ने बरसात के विविध चित्रों में प्राण फूँककर
    सजीवता प्रदान की है | गीत के प्रवाह में मन तन्मय सा हो रिमझिम की फुहार में पूरी तरह भीग गया और गीत ने भारत की स्मृतियों को कुरेद दिया। मनमोहक प्रस्तुति के लिये आपका साधुवाद !!
    मनमोहक प्रस्तुति के लिये साधुवाद !!

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  10. बहुत सुंदर
    शब्दों पर अदभुत control हैं

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  11. बचपन याद आ गया..आभार आपका ! :)

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