*
श्री गणेश के धर शुभांक चल पड़ी लेखनी भूर्ज-पत्र पर
स्वर- शब्दों की गंगा-यमुना सरस्वती मय त्रिगुण रूप धर
उर पर धरा कठिन हिमगिरि सा भारत का यह महा कथानक
वाणी में ढल, वेद व्यास के शब्दों में बह चला अचानक !
*
ले उद्विग्न मनस्थिति , अनुभव ले कुछ कड़वे खट्टे ,तीते ,
अंतर-बहिर्द्वंद्व मनस-तल तक मथते जैसे युग बीते
तानो-बानो में पूर-पूर सारे आँसू, सारे अँगार
जय महाकाव्य की रचना में बुन डाला युग को आर-पार.
*
अंधे पांडुर ,विदुर सभी का वंश , तुम्हारा ही तो अंशज,
कौन दूध का धुला वहाँ पर, सब फिसले पड़ते ही संकट ,
क्या बीता तुम पर लिखने में अपनी संततियों का लेखा ,
कैसे यों निर्लिप्त भाव धर लिखा दिया सब आँखों देखा ,
*
कथरी जो ओढ़ी थी ,उसके टाँकों में जो शाप सिल गये ,
उन पात्रों को निज में जीते , सारे ही विश्वास हिल गये
उन पापों का अनुभव करते पाए हों कितने पश्च-ताप ,
तुम से विरक्त ने ओढ़ लिया पूरे युग का गहरा विषाद
*
अपने लिक्खे से छुटकारा ओ व्यास,कभी क्या मिल पाया
या घिरी रही अंतर्नभ पर वह छल-छद्मों वाली छाया
बाढ़ लौट जाए सारे तट पर ज्यों कूड़-कबाड़ छोड़ ,
अट्ठारह दिन सच और झूठ का द्वंद्व भरे आतंक ओढ़ !
*
और युद्ध के बाद नशा सा उतरा जब ,अवसाद शेष बस .
क्या समझा था किन्तु हुआ क्या फीका सब उछाह का उत्सव
क्या दायित्व निभा पाया ,ले शंका और हताशा मन में
प्राण भीष्म ने त्यागे होंगे इसी विषम चिन्ता के क्षण में ,,
*
उस दिनान्त के बाद अँधेरी रात ,व्याध के शर सी बेधक ,
गीता के गायक के स्वर चिर मौन हो गये होंगे लेखक
जिसने सबकी पीर सही ,जो अनासक्त ही रहा जनम भर ,
लिख उसका अवसान व्यास,क्या कर पाये थे तुम मन को थिर
*
युग के घटकों का संयोजन जिसके संकेतों पर निर्भर
कर लीला का संवरण गया वह एक रहा जो- परम्पूर्ण नर
काल-व्याध का एक तीर कर गया उसे भी एक किनारे
भील लूटते कुल-वधुओं को ,उघड़ी लज्जा कौन उबारे ,
*
कृष्ण बिना सब विरस,विषण्ण हताशा से संसार भर गया
शंकाओं से बोझिल सारा लोक -वेद व्यवहार रह गया
व्यास ,कहाँ ला छोड़ा तुमने नारायण से हीन धरा पर ,
सखा ,सारथी और गुरु बिना ,हत-सामर्थ्य मलीन हुआ नर !
*
पृष्ठों के उजलेपन पर भी फैल गई होगी कुछ स्याही
अंक विरूपित बिखरे होंगे ,घुले नयन जल में सहसा ही
लिखते हुये लेखनी रोई ,लगा कालिमा सी घिर आई
हे हेरंब ,लेखनी ठिठकी होगी नयन दृष्टि धुँधलाई!
*
जीता कौन ,पराजय किसकी किस पर राज करे हारा मन ,
सारे ही संबंध झूठ थे व्यर्थ हुआ सारा आयोजन
कौन सुखी हो सका ,कौन संतुष्ट हुआ क्या हाथ लगा रे
डूबे कितने वंश और कितने रोदन-रत साँझ-सकारे !
*
बर्बरीक* का मुंड वृक्ष पर टँगा देखता आँखें फाड़े,
सब विरूप ,विशृंखल हो आ जाता दृष्टि पटल के आड़े
अमर पीर ले भटक रहे हैं अश्वत्थामा* कजरी वन में
मणिविहीन माथा चिर शापित-घाव टीस भऱता क्षण-क्षण में.
*
घटना क्रम का रंगमंच षड्यंत्र,छलों से रहा सजा है !
गीता का सारांश सौंपते लगा कि कुछ तो हाथ लगा है,
व्याकुलता को ढाँक सके जो मिला शान्ति का कहीं आवरण
उस अव्यक्त अथाह दाह से कैसे मुक्त हुए द्वैपायन ?
*
जब तक वाणी की करुणा-धारा से सिक्त न हो अंतरतम,
सघन शान्ति की मनोभूमि में जग न जाय कोई रचना-क्रम
वेदव्यास ,बस यह बतला दो ,,उबरे किस विध कठिन दाह से
महा समर के बाद कि जैसे शीतल औ'अतिशान्त तपोवन
*
फिर तुमने कुछ लिखा कि जिससे मन को कुछ आश्वस्ति मिल सके ,
अंतर्दाह शमित हो जाए , थकित चेत विश्रान्ति मिल सके ,
उस अन्याय अनीति कथा के बाद ,स्वस्थ हो सका विकल चित्
कुछ उपाय कर पाया हो तो व्यास बता दो स्वस्ति प्राप्ति हित .
*
हर रचना के बाद शेष रह जाता भीतर चुभता सा कुछ
जिसने भी दुख कथा लिखी उसके पल्ले बँध गया वही दुख
वह अभिशप्त जिये आजीवन, जीवन-विजन बने प्रायश्चित ,
कोई ठौर नहीं बचता केवल एकाकी औ'बीहड़ पथ !
*
अब तो सब लिख गया सदा को सोच हृदय अकुलाया होगा
वेदव्यास ,वह दाह कठिन किस तरह सहन कर पाया होगा
किस उपाय से शान्त कर सके वह उद्विग्न अवस्था मन की
या कि उसी द्विविधा में जीना नियति बनी बाकी जीवन की
*
रच युगंधरी गाथा तुम क्या पूर्णकाम हो सके व्यास या
घिर आया श्लथ मन पर प्रतिक्षण भारी होता घना कुहासा
वेद व्यास रचना के क्रम में ,आदि अंत तक सब जी डाला ,
सारा द्वापर आत्मसात् कर एक महाभारत रच डाला
*
सागर तक अविराम यात्रा करता व्याकुल एकाकी मन ,
महाविलय के साथ समर्पित आत्म-कथामय व्यथा कथा-क्रम
पाये करुणा-वरुणा के कण ,शाप-ताप से त्रस्त थकित स्वर,
व्यथित तप्त अचला को शीतल कर दे स्वस्ति शान्ति का निर्झर !
*
यह अपार गाथा मानव के संबंधों की ,दुर्बंधों की
तृष्णा ,लोभ अनीति असत्यों की दुर्मन के षड्यंत्रों की
कुछ सुन्दर करणीय नीति वच के पर खुले नये वातायन
महाकाव्य के महा रचयिता तुम्हें प्रणाम कृष्ण द्वैपायन!
*
बर्बरीक -
वे महान पाण्डव भीम के पुत्र घटोतकच्छ और नाग कन्या अहिलवती के पुत्र है। बाल्यकाल से ही वे बहुत वीर और महान यौद्धा थे।
महाभारत का युद्ध कौरवों और पाण्डवों के मध्य अपरिहार्य हो गया था, यह समाचार बर्बरीक को प्राप्त हुये तो उनकी भी युद्ध में सम्मिलित होने की इच्छा जाग्रत हुयी। जब वे अपनी माँ से आशीर्वाद प्राप्त करने पहुंचे तब माँ को हारे हुये पक्ष का साथ देने का वचन दिया।
कृष्ण ने बालक बर्बरीक से पूछा कि वह युद्ध में किस और से सम्मिलित होगा तो बर्बरीक ने अपनी माँ को दिये वचन दोहराये कि वह युद्ध में जिस और से भाग लेगा जो कि निर्बल हो और हार की और अग्रसर हो। कृष्ण जानते थे कि युद्ध में हार तो कौरवों की ही निश्चित है, और इस पर अगर बर्बरीक ने उनका साथ दिया तो परिणाम उनके पक्ष में ही होगा।
उन्होनें बर्बरीक को समझाया कि युद्ध आरम्भ होने से पहले युद्धभूमीं की पूजा के लिये एक वीर्यवीर क्षत्रिय के शीश के दान की आवश्यक्ता होती है, उन्होनें बर्बरीक को युद्ध में सबसे वीर की उपाधि से अलंकृत किया, अतैव उनका शीश दान में मांगा. बर्बरीक ने उनसे प्रार्थना की कि वह अंत तक युद्ध देखना चाहता है, श्री कृष्ण ने उनकी यह बात स्वीकार कर ली। नका सिर युद्धभुमि के समीप ही एक पहाडी पर सुशोभित किया गया, जहां से बर्बरीक सम्पूर्ण युद्ध का जायजा ले सकते थे।
-
अश्वत्थामा -
को मुख्यतः कौरव राजकुमार दुर्योधन के परम मित्र के रूप में जाना जाता है। जब भीम ने दुर्योधन का वध किया तो क्रोधित हो अश्वत्थामा ने पांडवों के सभी पुत्रों को मार डाला । जब पांडवों को पता चला तो वे उसे मारने को उद्यत हो गए। लेकिन कृष्ण ने उन्हें रोका । पर अश्वत्थामा ने उन सभी की हत्या करने के लिए ब्रह्मास्त्र निकाल लिया। लेकिन ब्रह्मा के यह उसे यह समझाया और उसने वह महाविनाशक अस्त्र उत्तरा के अजन्मे शिशु की तरफ मोड़ दिया । इस प्रकार वह बना इतिहास का सर्वप्रथम भ्रूण-हत्यारा। क्रोधित हो कृष्ण ने उसे शाप दिया और उसे मृत्यु से वंचित कर दिया । से मृत्यु -तुल्य पीड़ा का अनुभव तो मिलना था परन्तु मृत्यु नहीं ।
वहअमर है .
सूचना - अब कुछ समय यात्राओँ पर ,अतः 10-12 दिन की छुट्टी .
रविवार, 10 जुलाई 2011
शनिवार, 2 जुलाई 2011
जोड़-घटा.
*
जीवन में कितने दुख हैं ,
जीवन में कितने सुख हैं,
जोड़ घटा कर देख ज़रा ,थोड़ा सा अंतर होगा .
*
कितना थोथापन घेरे ,
थोड़ा कहीं वज़न हो रे ,
छान पछोर अलग कर ले ,असली उतना भर होगा .
*.
आती-जाती हैं राहें,
उठती है हरदम चाहें,
सारा रोना है मन का ,फिर काहे का डर होगा .
*
मेले की दूकानों में
बिके हुए इन नामों में
भरमाते हैं विज्ञापन , चेताता कुछ स्वर होगा .
*
शंका मत कर और न डर,
अपने को समझाये चल ,
जितना बने निभाये जा ,अंत परम सुन्दर होगा !
*
बुधवार, 15 जून 2011
अंतर्यामी से -
बहुत हुए अध्याय कथा के, रहे-बचे सो और निबेरो,
*
मेरे चाहे से क्या, होगा वही तुम्हारी जैसी इच्छा,
और कहाँ तक इसी तरह लोगे पग-पग पर विषम परीक्षा,
भार बढ़ रहा प्रतिपल कुछ तो सहन-शक्ति की सीमा हेरो .
*
मेरी लघु सामर्थ्य ,तुम्हारी अपरंपार अकथ क्षमताएं
कितना और सँभाल सकेंगी थकी हुई ये निर्बल बाहें ,
दीन न हो आश्वस्त रहे मन , ऐसे विश्वासों से घेरो !
*
थोड़ा सा विश्राम मिले जीवन भर के इस थके पथिक को ,
मेरा क्या था ,अब तक देते आए तुम अब वही समेटो.
चरम निराशाएं घेरें जब कोई किरण-सँदेश उकेरो ,
*
उतनी खींचो डोर कि तनकर हो न जाय सब रेशा -रेशा ,
थोड़ा- सा विश्वास जगे तो, विचलित करता रहे अँदेशा .
अंतर की उत्तप्त व्यथाओं पर प्रसाद-कण आन बिखेरो !
*
मेरे अंतर्यामी ,दो सामर्थ्य कि निभा सकूँ अपना व्रत,
अंतिम क्षण तक खींच सकूँ इन चुकती क्षमताओं का संकट,
'थोड़ा-सा बस और' यही कह-कह कर अवश हृदय को प्रेरो !
*
मंगलवार, 7 जून 2011
हम चुप हैं .
हम चुप हैं ,
इसलिए नहीं कि कहने को कुछ नहीं .
कहानी जब
अपने आप कहने लगे ,
कि व्यक्ति की कुंठा
कितनी सीमाएँ लाँघ सकती है ,
उम्र का तकाज़ा सुने बिना,
लाज-लिहाज़ से किनारा कर
सिर्फ़ अहं की तुष्टि हेतु .,
हम बोल कर क्या करें ?
*
ऊपर लिपटे आवरण
पर्त-दर पर्त खुल रहे हों
उद्घाटित हो रहा हो जो स्वयं !
बोल कर बीच में ,
गुनहगार क्यों बने हम?
*
कुत्सित निर्लज्ज लाँछन,
पनपे जो द्वेष की खाद में .
बताते हैं विकृत रोगी मानसिकता का इतिहास ,
असलियत सामने आ कर बोलती है ,
इतना क्यों गिरें हम कि सफ़ाई देते फिरें .
चुप रह जाना श्रेयस्कर,
कि असली चेहरा ख़ुद सामने आए
अब तक के भुलावों के अर्थ खुल जाए,
टूट जायें बहुतों के भ्रम !
*
सच दीपक की लौ है ,
काले आवरणों में भी उजागर .
समझनेवाले समझ लेंगे ,
न समझे कोई
तो क्या फर्क पड़ता है?
*
लाउडस्पीकरी विलाप-प्रलाप से,
फैलाए गए प्रवाद से ,
निर्लिप्त-निर्विकार रह रे मन ,
बिना विरोध ,बिना अपराध -बोध .
शान्त-सुस्थिर, अविचलित ,
अपने स्वयं में स्थित .
*
गंभीर मौन सर्वश्रेष्ठ उपक्रम -
कि इस दुर्बंध का
कण भर संस्कार भी
तेरे किसी आगत काल खंड को
छू न पाए ! !
*
इसलिए नहीं कि कहने को कुछ नहीं .
कहानी जब
अपने आप कहने लगे ,
कि व्यक्ति की कुंठा
कितनी सीमाएँ लाँघ सकती है ,
उम्र का तकाज़ा सुने बिना,
लाज-लिहाज़ से किनारा कर
सिर्फ़ अहं की तुष्टि हेतु .,
हम बोल कर क्या करें ?
*
ऊपर लिपटे आवरण
पर्त-दर पर्त खुल रहे हों
उद्घाटित हो रहा हो जो स्वयं !
बोल कर बीच में ,
गुनहगार क्यों बने हम?
*
कुत्सित निर्लज्ज लाँछन,
पनपे जो द्वेष की खाद में .
बताते हैं विकृत रोगी मानसिकता का इतिहास ,
असलियत सामने आ कर बोलती है ,
इतना क्यों गिरें हम कि सफ़ाई देते फिरें .
चुप रह जाना श्रेयस्कर,
कि असली चेहरा ख़ुद सामने आए
अब तक के भुलावों के अर्थ खुल जाए,
टूट जायें बहुतों के भ्रम !
*
सच दीपक की लौ है ,
काले आवरणों में भी उजागर .
समझनेवाले समझ लेंगे ,
न समझे कोई
तो क्या फर्क पड़ता है?
*
लाउडस्पीकरी विलाप-प्रलाप से,
फैलाए गए प्रवाद से ,
निर्लिप्त-निर्विकार रह रे मन ,
बिना विरोध ,बिना अपराध -बोध .
शान्त-सुस्थिर, अविचलित ,
अपने स्वयं में स्थित .
*
गंभीर मौन सर्वश्रेष्ठ उपक्रम -
कि इस दुर्बंध का
कण भर संस्कार भी
तेरे किसी आगत काल खंड को
छू न पाए ! !
*
सोमवार, 30 मई 2011
नचारी (वर की खोज), भाग 2 - . & भाग 3 - .
भाग 2 -
(परीक्षा.)
परीच्छा अहै बहुत भारी ,
इहाँ देखौ कौने हारी!
*
मात-पिता के माथ नवाइल षड्मुख तुरत पयाने,
चढ़ि मयूर- वाहन पल भर में हुइ गे अंतरधाने!
परिल सोच में गनपति ,मूसा देखि वियाकुल भइले,
एतन भारी बदन पहिल, कइसन परिकम्मा कइले!
कौन विधि साधौं पितु महतारी!
*
वेद-पुरान ग्रंथ सुमिरे ,कोऊ उपाय मिलि जाई,
आपुन बुद्धि भरोसो करि ई बाजी जीतौं जाई!
हँसि परनाम किहिल दोउन को विधिवत करि परिकम्मा
सम्मुख आइल चरन परस फिर बोले पाइ अनुज्ञा-
' तीनि लोकन ते तुम भारी !
*
'तिहुँ लोकन की परकम्मा सम माय-पिता की भइली,
सबहि लोक इन चरनन में देखिल ,अस बानी कहली!'
'धन-धन पूत , बड़ो सुख दीन्हों तुहै बियाहिल पहिले,
सब लोकन में बुद्धि प्रदाता ,विघ्न-विनाशक भइले!
अब तुम्हरे बियाह की बारी!'
*
भाग - 3.
(विवाह)
षड्मुख घूमि तीन लोकन में आइ चरन सिर नाये !
स्रम से थकित आइ बइठे, देखित गणेश मुस्काये !
'गये न तुम ,काहे से अपनो वाहन देख डेराने ?'
'पूरन काज कियो बुधिृबल ते गजमुख परम सयाने .
गणपति पहिल बियाहे कन्या ,पहिल पूजि सनमाने !'
शंकर कहिन ,'सबै साधन में श्रद्धा -बुधि है भारी !'
गुस्सइले कुमार,' बातन से मोहे पितु महतारी ,
गई सबहिन की मति मारी !'
*
'समरथ औ सुभ-मति से पूरन उचित पात्र अधिकारी,
इनका धारन करै बिस्व हित होवे मंगल कारी !
तनबल ,मनबल और बुद्धिबल की हम लीन परीच्छा ,
जा सों होय सकारथ रिधि -सिधि हमरी इहै सदिच्छा !'
शिकायत षड्मुख की भारी !
*
'पार्वती समुझावैं ,' तुम अति वीर महा-बलधारी ,
साधन और उपाव सहज करि देत काज सब भारी !
बल ते सरै न काज अगम, तब बुद्धि उपाय सुझावै ,
हर्र-फिटकरी बिना रंग पूरो-पूरो चढ़ि जावे !
पूत तुम समुझौ बात हमारी !'
*
'बुद्धि वीर बे ,वे बाहु वीर तुम दोनिउ मोर दुलारे ,
दुइ कन्यन सों दोऊ भैया ब्याह करहु मोरे बारे !'
खिन्न कुमार उठे बोले 'तुम जौन कहा हम कीन्हा ,
आज्ञा सिर धरि दौरि थक्यो, तौहूँ जस नेक न दीन्हा !
करो तुम ,जो भावै महतारी !
*
'स्रम पुरुषारथ भयो अकारथ हम बियाह ना करिबे ,
उचटि गयो मन, अब हम जाइ कहूँ अनतै ही रहिबे !'
गौरा गनपति करैं जतन ,पै अइस कुमार रिसाने .
बहुत करी विनती कर जोरे ,विधि निरास पछिताने ,
*
पसुपति करि परबोध थकाने केहू भाँति न मानै ,
दोनिहुँ कन्या एकहि बर सों ब्याहन की तब ठाने !
'लिखी जो कउन सकै , टारी !'
*
भयो बियाह वेद-विधि गिरिजा परिछन कीन्ह बधुन को ,
गौरा को परिवार निरखि अति अचरज देव-मुनिन को !
गनपति पाये रिद्धिृ-सिद्धि ,द्वौ पुत्र लाभ-सुभ जनमे ,
सुर-मुनि सबै सिहात कामना करत कृपा की मन में !
बिघनहर्ता गजमुख धारी ,
देउ सारी बाधा टारी !
*
(परीक्षा.)
परीच्छा अहै बहुत भारी ,
इहाँ देखौ कौने हारी!
*
मात-पिता के माथ नवाइल षड्मुख तुरत पयाने,
चढ़ि मयूर- वाहन पल भर में हुइ गे अंतरधाने!
परिल सोच में गनपति ,मूसा देखि वियाकुल भइले,
एतन भारी बदन पहिल, कइसन परिकम्मा कइले!
कौन विधि साधौं पितु महतारी!
*
वेद-पुरान ग्रंथ सुमिरे ,कोऊ उपाय मिलि जाई,
आपुन बुद्धि भरोसो करि ई बाजी जीतौं जाई!
हँसि परनाम किहिल दोउन को विधिवत करि परिकम्मा
सम्मुख आइल चरन परस फिर बोले पाइ अनुज्ञा-
' तीनि लोकन ते तुम भारी !
*
'तिहुँ लोकन की परकम्मा सम माय-पिता की भइली,
सबहि लोक इन चरनन में देखिल ,अस बानी कहली!'
'धन-धन पूत , बड़ो सुख दीन्हों तुहै बियाहिल पहिले,
सब लोकन में बुद्धि प्रदाता ,विघ्न-विनाशक भइले!
अब तुम्हरे बियाह की बारी!'
*
भाग - 3.
(विवाह)
षड्मुख घूमि तीन लोकन में आइ चरन सिर नाये !
स्रम से थकित आइ बइठे, देखित गणेश मुस्काये !
'गये न तुम ,काहे से अपनो वाहन देख डेराने ?'
'पूरन काज कियो बुधिृबल ते गजमुख परम सयाने .
गणपति पहिल बियाहे कन्या ,पहिल पूजि सनमाने !'
शंकर कहिन ,'सबै साधन में श्रद्धा -बुधि है भारी !'
गुस्सइले कुमार,' बातन से मोहे पितु महतारी ,
गई सबहिन की मति मारी !'
*
'समरथ औ सुभ-मति से पूरन उचित पात्र अधिकारी,
इनका धारन करै बिस्व हित होवे मंगल कारी !
तनबल ,मनबल और बुद्धिबल की हम लीन परीच्छा ,
जा सों होय सकारथ रिधि -सिधि हमरी इहै सदिच्छा !'
शिकायत षड्मुख की भारी !
*
'पार्वती समुझावैं ,' तुम अति वीर महा-बलधारी ,
साधन और उपाव सहज करि देत काज सब भारी !
बल ते सरै न काज अगम, तब बुद्धि उपाय सुझावै ,
हर्र-फिटकरी बिना रंग पूरो-पूरो चढ़ि जावे !
पूत तुम समुझौ बात हमारी !'
*
'बुद्धि वीर बे ,वे बाहु वीर तुम दोनिउ मोर दुलारे ,
दुइ कन्यन सों दोऊ भैया ब्याह करहु मोरे बारे !'
खिन्न कुमार उठे बोले 'तुम जौन कहा हम कीन्हा ,
आज्ञा सिर धरि दौरि थक्यो, तौहूँ जस नेक न दीन्हा !
करो तुम ,जो भावै महतारी !
*
'स्रम पुरुषारथ भयो अकारथ हम बियाह ना करिबे ,
उचटि गयो मन, अब हम जाइ कहूँ अनतै ही रहिबे !'
गौरा गनपति करैं जतन ,पै अइस कुमार रिसाने .
बहुत करी विनती कर जोरे ,विधि निरास पछिताने ,
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पसुपति करि परबोध थकाने केहू भाँति न मानै ,
दोनिहुँ कन्या एकहि बर सों ब्याहन की तब ठाने !
'लिखी जो कउन सकै , टारी !'
*
भयो बियाह वेद-विधि गिरिजा परिछन कीन्ह बधुन को ,
गौरा को परिवार निरखि अति अचरज देव-मुनिन को !
गनपति पाये रिद्धिृ-सिद्धि ,द्वौ पुत्र लाभ-सुभ जनमे ,
सुर-मुनि सबै सिहात कामना करत कृपा की मन में !
बिघनहर्ता गजमुख धारी ,
देउ सारी बाधा टारी !
*
शनिवार, 28 मई 2011
नचारी - वर की खोज
**
बर खोजन चले विधना ,
कन्या दोउ गुनखानी !
'ऋद्धि-सिद्धि दोउ जुड़वाँ बहिनी अब लौ क्वाँरी रहलीं,
का सों का भइल सँजोग ',विधात्री आकुल विधि सों कहिलीं !
'सुघर सयानी दोनिउ बहिनी बहुत जतन सों पालीं,
सुर नर देखि सिहावैं ,न जनौ केहिके भाग जगइलीं!
सुलच्छनी कल्यानी !
बर खोजन की ठानि मनहिं मन ठाड़े भै बिधना,
लायक लरिका होय, न जने दौरन परि है केतना !
सतुआ बाँध निकलि गे घर ते काँधे डारि अँगौछा,
बाँधि गठरिया धरि लीनो तिन संग डोर औ' लोटा!
मन में चिन्त समानी!
सूरज तपत ,चंद्रमा रोगी अइसन बर ना चहिले,
पवनदेव को ठौर-ठिकाना केऊ जान न पइले!
देवराज के देखि चरित्तर मुँह घुमाइ हँस रहिले,
पुरुसोत्तम हरि सेसनाग परि छीरसिन्धु में सोइले!
शिव-शंकर अवढर दानी !
सोर भयो सब लोकन में ,बर खोजन विधना आयेल
ऋषि-मुनि ललचैं ,रिधि-सिधि कारन ,जप-तप सबै हेराइल,
कौन उपाय मिलहि कन्या, जागी हिय अस अभिलासा,
भारी सोच कौन विध जीत लेहुँ विधि को बिसबासा!
मति सबहिन केर हिरानी !..
तीनहुँ लोक कउन अस जन्म्यो कन्यन के संजोगे,
घूमि,घूमि थक गइले विधना कोउ न लग अनुरूपे!!
आइ देवता सारे सजि-बजि , बढ़ि आपुन गुन बरनै!
विधि विसमित अब हँसैं कि रोवैं ,सिर पीटल खिसियौंने!
का सों कहों कहानी!
देवि सुरसती दया लागि -' काहे कैलास न गइले,
दुइ कुमार गिरिजा के अब तो ब्याहन लायक भइले
अन्नपूरणा सासु ,बहुरियाँ रिधि-सिधि अनुपम जोगा,
अरपन करि निज कर सों नरियल तुरतै करो बरीच्छा!
आपुन मन में ठानी!'
देखि्य़ो नारियर ,कुँवर मुदित भे ,हर-गिरजा हरषइले,
घूम मचिल सारे शंकर गण ताली दै-दै नचिले!
गौरा हँस चुप रहलीं ,बोलेल विधना ते तुरतै हर,
'पहिल परिच्छा होइल करबे काहू को केहि का बर!
दोउ कन्या गुनखानी!'
षड्मुख -गणपति देखि आँखि भऱ विधना सब सुख लहिले,
कोउ ब्याहिल पीछे तो का , कोऊ ब्याहिल पहिले!
'परिकरमा तीनिहुँ लोकन करि जौन पहिल जस लहिले
समरथ होइल , गुणमंती कन्या सो निहचय पइले!'
सुनि मुसुकाहिं भवानी
जबै बर खोजन चले बिधना !
***
..
बर खोजन चले विधना ,
कन्या दोउ गुनखानी !
'ऋद्धि-सिद्धि दोउ जुड़वाँ बहिनी अब लौ क्वाँरी रहलीं,
का सों का भइल सँजोग ',विधात्री आकुल विधि सों कहिलीं !
'सुघर सयानी दोनिउ बहिनी बहुत जतन सों पालीं,
सुर नर देखि सिहावैं ,न जनौ केहिके भाग जगइलीं!
सुलच्छनी कल्यानी !
बर खोजन की ठानि मनहिं मन ठाड़े भै बिधना,
लायक लरिका होय, न जने दौरन परि है केतना !
सतुआ बाँध निकलि गे घर ते काँधे डारि अँगौछा,
बाँधि गठरिया धरि लीनो तिन संग डोर औ' लोटा!
मन में चिन्त समानी!
सूरज तपत ,चंद्रमा रोगी अइसन बर ना चहिले,
पवनदेव को ठौर-ठिकाना केऊ जान न पइले!
देवराज के देखि चरित्तर मुँह घुमाइ हँस रहिले,
पुरुसोत्तम हरि सेसनाग परि छीरसिन्धु में सोइले!
शिव-शंकर अवढर दानी !
सोर भयो सब लोकन में ,बर खोजन विधना आयेल
ऋषि-मुनि ललचैं ,रिधि-सिधि कारन ,जप-तप सबै हेराइल,
कौन उपाय मिलहि कन्या, जागी हिय अस अभिलासा,
भारी सोच कौन विध जीत लेहुँ विधि को बिसबासा!
मति सबहिन केर हिरानी !..
तीनहुँ लोक कउन अस जन्म्यो कन्यन के संजोगे,
घूमि,घूमि थक गइले विधना कोउ न लग अनुरूपे!!
आइ देवता सारे सजि-बजि , बढ़ि आपुन गुन बरनै!
विधि विसमित अब हँसैं कि रोवैं ,सिर पीटल खिसियौंने!
का सों कहों कहानी!
देवि सुरसती दया लागि -' काहे कैलास न गइले,
दुइ कुमार गिरिजा के अब तो ब्याहन लायक भइले
अन्नपूरणा सासु ,बहुरियाँ रिधि-सिधि अनुपम जोगा,
अरपन करि निज कर सों नरियल तुरतै करो बरीच्छा!
आपुन मन में ठानी!'
देखि्य़ो नारियर ,कुँवर मुदित भे ,हर-गिरजा हरषइले,
घूम मचिल सारे शंकर गण ताली दै-दै नचिले!
गौरा हँस चुप रहलीं ,बोलेल विधना ते तुरतै हर,
'पहिल परिच्छा होइल करबे काहू को केहि का बर!
दोउ कन्या गुनखानी!'
षड्मुख -गणपति देखि आँखि भऱ विधना सब सुख लहिले,
कोउ ब्याहिल पीछे तो का , कोऊ ब्याहिल पहिले!
'परिकरमा तीनिहुँ लोकन करि जौन पहिल जस लहिले
समरथ होइल , गुणमंती कन्या सो निहचय पइले!'
सुनि मुसुकाहिं भवानी
जबै बर खोजन चले बिधना !
***
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गुरुवार, 21 अप्रैल 2011
चलती बार ..
प्रस्थान की बेला,
चिर-प्रतीक्षित गंतव्य की ओर,
उत्तर दिशि वन-पगडंडियाँ ,
मन शान्त ,पुलकित !
*
सारा कुरुक्षेत्र बीता ,
राज पाट निरर्थक.
मान-अपमान ,शाप-ताप, सुख-दुख ,
सारे मनस्ताप छूटें यहीं .
इन्द्रियों के पाँच पाण्डव ,
अंतराग्नि-संभवा द्रौपदी सहित चलते हैं
देवात्मा हिमालय का
अपरिमित विस्तार है जहाँ !
*
अनायास होते रहे
मोहमयी मानसिकता के
दोष-अपराध,क्षमा कर
बिदा दो मीत ,
और आशीष भी
कि इस यात्रा का पुनरावर्तन न हो !
*
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