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गुरुवार, 21 अप्रैल 2011

चलती बार ..



प्रस्थान की बेला,

चिर-प्रतीक्षित गंतव्य की ओर,

उत्तर दिशि वन-पगडंडियाँ ,

मन शान्त ,पुलकित !

*

सारा कुरुक्षेत्र बीता ,

राज पाट निरर्थक.

मान-अपमान ,शाप-ताप, सुख-दुख ,

सारे मनस्ताप छूटें यहीं .

इन्द्रियों के पाँच पाण्डव ,

अंतराग्नि-संभवा द्रौपदी सहित चलते हैं

देवात्मा हिमालय का

अपरिमित विस्तार है जहाँ !

*

अनायास होते रहे

मोहमयी मानसिकता के

दोष-अपराध,क्षमा कर

बिदा दो मीत ,

और आशीष भी

कि इस यात्रा का पुनरावर्तन न हो !

*