प्रस्थान की बेला,
चिर-प्रतीक्षित गंतव्य की ओर,
उत्तर दिशि वन-पगडंडियाँ ,
मन शान्त ,पुलकित !
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सारा कुरुक्षेत्र बीता ,
राज पाट निरर्थक.
मान-अपमान ,शाप-ताप, सुख-दुख ,
सारे मनस्ताप छूटें यहीं .
इन्द्रियों के पाँच पाण्डव ,
अंतराग्नि-संभवा द्रौपदी सहित चलते हैं
देवात्मा हिमालय का
अपरिमित विस्तार है जहाँ !
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अनायास होते रहे
मोहमयी मानसिकता के
दोष-अपराध,क्षमा कर
बिदा दो मीत ,
और आशीष भी
कि इस यात्रा का पुनरावर्तन न हो !
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