शनिवार, 28 मई 2011

नचारी - वर की खोज

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बर खोजन चले विधना ,
 कन्या दोउ गुनखानी !


'ऋद्धि-सिद्धि दोउ जुड़वाँ बहिनी अब लौ क्वाँरी रहलीं,

का सों का भइल सँजोग ',विधात्री आकुल विधि सों कहिलीं !

'सुघर सयानी दोनिउ बहिनी बहुत जतन सों पालीं,

सुर नर देखि सिहावैं ,न जनौ केहिके भाग जगइलीं!

सुलच्छनी कल्यानी !

बर खोजन की ठानि मनहिं मन ठाड़े भै बिधना,

लायक लरिका होय, न जने दौरन परि है केतना !

सतुआ बाँध निकलि गे घर ते काँधे डारि अँगौछा,

बाँधि गठरिया धरि लीनो तिन संग डोर औ' लोटा!

मन में चिन्त समानी!

सूरज तपत ,चंद्रमा रोगी अइसन बर ना चहिले,

पवनदेव को ठौर-ठिकाना केऊ जान न पइले!

देवराज के देखि चरित्तर मुँह घुमाइ हँस रहिले,

पुरुसोत्तम हरि सेसनाग परि छीरसिन्धु में सोइले!

शिव-शंकर अवढर दानी !

सोर भयो सब लोकन में ,बर खोजन विधना आयेल

ऋषि-मुनि ललचैं ,रिधि-सिधि कारन ,जप-तप सबै हेराइल,

कौन उपाय मिलहि कन्या, जागी हिय अस अभिलासा,

भारी सोच कौन विध जीत लेहुँ विधि को बिसबासा!

मति सबहिन केर हिरानी !..

तीनहुँ लोक कउन अस जन्म्यो कन्यन के संजोगे,

घूमि,घूमि थक गइले विधना कोउ न लग अनुरूपे!!

आइ देवता सारे सजि-बजि , बढ़ि आपुन गुन बरनै!

विधि विसमित अब हँसैं कि रोवैं ,सिर पीटल खिसियौंने!

का सों कहों कहानी!

देवि सुरसती दया लागि -' काहे कैलास न गइले,

दुइ कुमार गिरिजा के अब तो ब्याहन लायक भइले

अन्नपूरणा सासु ,बहुरियाँ रिधि-सिधि अनुपम जोगा,

अरपन करि निज कर सों नरियल तुरतै करो बरीच्छा!

आपुन मन में ठानी!'

देखि्य़ो नारियर ,कुँवर मुदित भे ,हर-गिरजा हरषइले,

घूम मचिल सारे शंकर गण ताली दै-दै नचिले!

गौरा हँस चुप रहलीं ,बोलेल विधना ते तुरतै हर,

'पहिल परिच्छा होइल करबे काहू को केहि का बर!

दोउ कन्या गुनखानी!'

षड्मुख -गणपति देखि आँखि भऱ विधना सब सुख लहिले,

कोउ ब्याहिल पीछे तो का , कोऊ ब्याहिल पहिले!

'परिकरमा तीनिहुँ लोकन करि जौन पहिल जस लहिले

समरथ होइल , गुणमंती कन्या सो निहचय पइले!'

सुनि मुसुकाहिं भवानी

जबै बर खोजन चले बिधना !
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गुरुवार, 21 अप्रैल 2011

चलती बार ..



प्रस्थान की बेला,

चिर-प्रतीक्षित गंतव्य की ओर,

उत्तर दिशि वन-पगडंडियाँ ,

मन शान्त ,पुलकित !

*

सारा कुरुक्षेत्र बीता ,

राज पाट निरर्थक.

मान-अपमान ,शाप-ताप, सुख-दुख ,

सारे मनस्ताप छूटें यहीं .

इन्द्रियों के पाँच पाण्डव ,

अंतराग्नि-संभवा द्रौपदी सहित चलते हैं

देवात्मा हिमालय का

अपरिमित विस्तार है जहाँ !

*

अनायास होते रहे

मोहमयी मानसिकता के

दोष-अपराध,क्षमा कर

बिदा दो मीत ,

और आशीष भी

कि इस यात्रा का पुनरावर्तन न हो !

*

शुक्रवार, 15 अप्रैल 2011

नचारी - राम जी


*

सीता जी की मैया तो सासू तुम्हार भईँ ,राम जी कहाते तुम धरती के भरता ,

ताही सों कैकेयी दिबायो बनबास,तहाँ जाय के निसाचरन के भये संहर्ता.

मंथरा ने जाय के जनाई बात रानी को सुनि के बिहाल भई चिन्ता के कारनैं ,

दोष लै लीन आप ,कुल को बचाय दियो केकय सुता ने अपजस के निवारने ,

फिर हू तुम आय लै लीनो राज-पाट, तासों अवनि-सुता के भाग आयो वनवास है ,

बेटी और मात दोनों एक घरै कइस रहें कारन यही रह्यो हमारो मन जनात है .

सुधि हौ न लीन ,वा की मरत कि जियत ,बनैं माँ पठाय निहचिन्त भये राम जी .

ऐतो अपवाद सुनि ,छाँड़ि दियो साथ औ'विवाह के बचन को न राख्यो नेक मान जी,

अंत काल धरती में सीता समानी सरजू के जल माँहिं तुम लीन भए जाय के .

हुइ के गिरस्थ पूत-जाया न साथ , धर्म लीनो निभाय एक मूरत बनाय के .

पतनी की कनक मयी काया सों काज ,ताके मानस की थाह काहे पाई ना विचारि के,

अस्वमेघ जीत्यो जभै सीता के पुत्रन नें लै आए तिन्हें सब ही विधि हारि के .

पालक प्रजा के न्याय बाँटत जगत को पै आपनी ही संतति के पालक कहाए ना ,

राज-काज हेतु तीन भाई समर्थ तहूँ , जाया के सँग सहधर्मी बनि पाये ना .

लछिमन सो भाई ,हनुमान सो सुसेवक तुम्हार लागि आपुनो जनम जो न वारते ,

बड़ो नाम है तुम्हार,साधि रहे इ है चार, जो न होते राम- काज केहि विधि सँवारते .

सीता और कैकयी बिरथ बदनाम भईँ इन सम कोउ नहीं देख्यो निहकाम जी ,

भरत सो भाई ,विभीषण सो भेदी गए सुजस तिहारे ही नाम लिख्यो राम जी !

*

सोमवार, 4 अप्रैल 2011

नव-संवत्सर पर


पथ के साथी !
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नव-संवत्सर पर हम सबकी शुभ-कामनाएँ विश्व-मंगल का हेतु बने !


भारतीय-मनीषा ने जीवन को कभी देश,धर्म आदि की संकुचित सीमाओं में नहीं बाँधा ,वसुधा को एक कुटुंब सम देखा है - सबके साथ आप और हम भी आनन्द और उत्कर्ष को प्राप्त करें !

माँ ,नव-ऊर्जा के इस उदय-काल में तुम्हारी शक्तियों के सभी स्वरूप मंगल का विधान और अमंगल का शमन करें !
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- प्रतिभा सक्सेना.

मंगलवार, 29 मार्च 2011

वही मैं

*

जब होती हूँ अपने आप में

वर्जना-हीन ,अबाध, मुक्त .

अपनी पूरी मानसिक सत्ता के साथ,

इन मानो-प्रतिमानो से निरपेक्ष.

किसी का कहना सुनना

कोई अर्थ नहीं रखता मेरे लिए !

आत्म में निवसित ,

शीष उठाए संनद्ध ,

अविभाजित ,अनिरुद्ध ,

अपनी संपूर्णता में स्थित !

वही हूँ मैं ,

बस वही !
*

गुरुवार, 17 मार्च 2011

वाह रे ,चाँद !

*
वाह रे ,चाँद !
तुम्हें भी चैन नहीं पड़ता !
इतना पानी बरसा
आसमान तो क्या साफ़ होता
सारे में किच-किच और हो गई .
काले-काले,दल-दल बादल जहाँ-तहाँ .
*
तुम भी चाँद ,बाज़ नहीं आते
खेल रहे दौड़-दौड़ छिपा-छिपी !
बात ,सुनते ही नहीं
फिसल रहे बार-बार .
उफ़, वहीं लोट गए ,
दल-दल -बादल में डूबी -सी देह .
*
चलो उठो, उठो ,
साबुन लगा कर नहला दूँ .
चलो साथ ,
धुले पुछे, फिर से चमक जाओगे !
*
कोई मत आना .
सारे कपड़े उतार
नहा रहा है मेरा चंदा .
हँसते फेन-बुलबुलों वाली
हर-हर गंगा !
*
आसमान में बादल दल-दल,
मेरा धुला-पुँछा चंदा चमक गया रे !
कोई नज़र न लगा दे
ये लो, काजल का टीका .
वाह,
लो,अब देखो सब लोग.
है कोई मेरे चंदा सरीखा ?
*

रविवार, 13 मार्च 2011

ओ अरुणा !

*

बहुत अस्थिर हो उठती हूँ ,

पल-पल अनुभव करती हूँ तुम्हें अपने में ,

कि नींद में चलती चली आती हो मुझ तक !

अरुणा,

सैंतीस साल बीत गए

लोग जगाना चाहते हैं !

जगोगी?

बड़ी मुश्किल होगी ,

झटके पर झटके .

आँखें फाड़ देखोगी चतुर्दिक

सब अजनवी ,

माँ-पिता भाई-बहिन मित्र संबंधी,

कहींकुछ नहीं .

ख़ुद का वजू़द एक सवाल-सा .

दर्पण से ताकेगी

टूटी-हारी ढली एक पस्त औरत.

अपने को कहां ढूँढोगी ,

कैसे पार पाओगी ?

*

तुम जो थीं -

अंतर में रह-रह फूटता

आनन्द का उत्स,स्वप्निल नयन,

मधु- गंध व्याकुल पुष्पित पुलकित

यौवन भार नत,

प्रतीक्षाकुल तरुणा-अरुणा

 समर्पित होने अपने  प्रिय पुरुष को !

एक पिशाच लीला रौंद गई ,

ऊर्जा के अमृत-कण खींच ,

रोम-रोम में तेज़ाब उँडेल गई .

*

पच्चीस साल की युवती

जो सो गई थी उस दिन,

कभी नहीं जगेगी .

सामने है हत विद्रूप ,

ढहता जा रहा भग्नावशेष !

*