*
बहुत अस्थिर हो उठती हूँ ,
पल-पल अनुभव करती हूँ तुम्हें अपने में ,
कि नींद में चलती चली आती हो मुझ तक !
अरुणा,
सैंतीस साल बीत गए
लोग जगाना चाहते हैं !
जगोगी?
बड़ी मुश्किल होगी ,
झटके पर झटके .
आँखें फाड़ देखोगी चतुर्दिक
सब अजनवी ,
माँ-पिता भाई-बहिन मित्र संबंधी,
कहींकुछ नहीं .
ख़ुद का वजू़द एक सवाल-सा .
दर्पण से ताकेगी
टूटी-हारी ढली एक पस्त औरत.
अपने को कहां ढूँढोगी ,
कैसे पार पाओगी ?
*
तुम जो थीं -
अंतर में रह-रह फूटता
आनन्द का उत्स,स्वप्निल नयन,
मधु- गंध व्याकुल पुष्पित पुलकित
यौवन भार नत,
प्रतीक्षाकुल तरुणा-अरुणा
समर्पित होने अपने प्रिय पुरुष को !
एक पिशाच लीला रौंद गई ,
ऊर्जा के अमृत-कण खींच ,
रोम-रोम में तेज़ाब उँडेल गई .
*
पच्चीस साल की युवती
जो सो गई थी उस दिन,
कभी नहीं जगेगी .
सामने है हत विद्रूप ,
ढहता जा रहा भग्नावशेष !
*
बहुत अस्थिर हो उठती हूँ ,
पल-पल अनुभव करती हूँ तुम्हें अपने में ,
कि नींद में चलती चली आती हो मुझ तक !
अरुणा,
सैंतीस साल बीत गए
लोग जगाना चाहते हैं !
जगोगी?
बड़ी मुश्किल होगी ,
झटके पर झटके .
आँखें फाड़ देखोगी चतुर्दिक
सब अजनवी ,
माँ-पिता भाई-बहिन मित्र संबंधी,
कहींकुछ नहीं .
ख़ुद का वजू़द एक सवाल-सा .
दर्पण से ताकेगी
टूटी-हारी ढली एक पस्त औरत.
अपने को कहां ढूँढोगी ,
कैसे पार पाओगी ?
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तुम जो थीं -
अंतर में रह-रह फूटता
आनन्द का उत्स,स्वप्निल नयन,
मधु- गंध व्याकुल पुष्पित पुलकित
यौवन भार नत,
प्रतीक्षाकुल तरुणा-अरुणा
समर्पित होने अपने प्रिय पुरुष को !
एक पिशाच लीला रौंद गई ,
ऊर्जा के अमृत-कण खींच ,
रोम-रोम में तेज़ाब उँडेल गई .
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पच्चीस साल की युवती
जो सो गई थी उस दिन,
कभी नहीं जगेगी .
सामने है हत विद्रूप ,
ढहता जा रहा भग्नावशेष !
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