शनिवार, 14 जनवरी 2012

चंद लाइनें - आड़ी-तिरछी .

*
बस से उतरकर जेब में हाथ डाला।
 मैं चौंक पड़ा।
 जेब कट चुकी थी। जेब में था भी क्या? कुल नौ रुपए और एक खत, जो मैंने माँ को लिखा था कि—मेरी नौकरी छूट गई है;अभी पैसे नहीं भेज पाऊँगा…। तीन दिनों से वह पोस्टकार्ड जेब में पड़ा था। पोस्ट करने को मन ही नहीं कर रहा था। नौ रुपए जा चुके थे। यूँ नौ रुपए कोई बड़ी रकम नहीं थी, लेकिन जिसकी नौकरी छूट चुकी हो, उसके लिए नौ रुपए नौ सौ से कम नहीं होते।
  कुछ दिन गुजरे। माँ का खत मिला। पढ़ने से पूर्व मैं सहम गया। जरूर पैसे भेजने को लिखा होगा।…लेकिन, खत पढ़कर मैं हैरान रह गया।
 माँ ने लिखा था—“बेटा,तेरा पचास रुपए का भेजा हुआ मनीआर्डर मिल गया है। तू कितना अच्छा है रे!…पैसे भेजने में कभी लापरवाही नहीं बरतता।”
 मैं इसी उधेड़-बुन में लग गया कि आखिर माँ को मनीआर्डर किसने भेजा होगा? 
कुछ दिन बाद, एक और पत्र मिला।
 चंद लाइनें थीं—आड़ी-तिरछी।
 बड़ी मुश्किल से खत पढ़ पाया। लिखा था—“भाई, नौ रुपए तुम्हारे और इकतालीस रुपए अपनी ओर से मिलाकर मैंने तुम्हारी माँ को मनीआर्डर भेज दियाहै। फिकर न करना।… माँ तो सबकी एक-जैसी होती है न। वह क्यों भूखी रहे?…
तुम्हारा— जेबकतरा भाई

शुभम् भवतु कल्याणं.
* .....
( नोट- यह लघु-कथा मेरी मित्र डॉ. शकुन्तला बहादुर ने मुझे भेजी है, .मैं इसे आप सबसे बाँटने का लोभ संवरण नहीं कर पा रही हूँ .'आभार' इस कथा के अज्ञात लेखक के लिये  और' धन्यवाद' शकुन्तला जी के हिस्से में !)

शनिवार, 24 दिसंबर 2011

एक नज़्म .


आसरा मेरा ही लें और मुझ पे एहसान करें  ,
बाहरी दुनिया से हुई इस कदर हताश हूँ मैं !
किसी को क्या पता कि क्यों उदास हूँ मैं !
*
मैं इक किताब हूँ ,नंबर लगे सफ़होंवाली ,
इसकी इबारत नहीं कहने से बदल पाएगी ,
लाख टोको या  लानत-मलामत भी करो
और  किसी रूप में ढाले से न ढल पाएगी ,
*
मैं जो मजमून  हूँ  कोरे  सफ़हे पर छपा ,
लाख कोशिश करो उड़ पायेंगं कैसे हरूफ़ ,
भले गल जाय पानी में या लपटों में जले
उभर आएंगी वही सतरें  लिए वो ही वजूद
*
रंग फीके पड़े  ,देखी है कितनी छाँह-धूप .
 वर्क बिखरें  जो हवा  संग ही उड़ जाएंगे ,
मोड़ना चाहो तो वहीं इक दरार आएगी ,
टूटती सतरें  अगर जोड़ीं, भरम  पड़ जायेंगे
*
वक्त के साथ पुराने हुये फीके भी हुये    ,
इन पे लिक्खी जो इबारत वो  बहुत पक्की है ,
क्यों करें परवाह कोई कहता है तो कहता रहे ,
ये जो मुसम्मात है , सचमुच में बड़ी झक्की है .
*
कच्ची मिट्टी नहीं फितरत जो बदल जाय मेरी ,
पक चुकी आंवे में फिर न चाक पे धर पाओगे
टूट के भी ये किसी के काम नहीं आएगी .
चूर कर कोई नई-सी शक्ल न दे पाओगे ,
*
इसका उन्वान सिरफ़ मेरी दास्तान नहीं
सबके अपने ही वहम ,और सबके अपने अहम्,
अपने को  भूलूँ  ,बँटूँ मैं  या कि  बिखर,चुप ही रहूँ
ठीक  किसी को लगे तो मानना क्यों मेरा धरम?
*
मैं भी इक  इंसान हूँ ,तालीम औ तजुर्बा है ,
पाँव पर अपने खड़ी हूँ  तो चल भी लूँगी ,
मैं क्यों गलत हूँ कि तुमसे अगर  सलाह न लूँ ,
हो गई भूल  कहीं   फिर से सही कर लूँगी
*
मैं समझ पाऊँ  दुनिया ख़ुद का नजरिया लेकर
लगेगी ठोकर ज़रा कुछ और सँभल जाऊँगी
 तुमको ही मलाल रह जायगा सुनती ही नहीं
दौड़ के हर बात पे रोने न बैठ जाऊँगी .
*
चल रही हूँ रास्ता कुछ देर एक ही जो  रहे
भूल से कोई न  समझ ले  उसी के साथ हूँ मै ,
तिल का ताड़ करना यहाँ पे शगल पुराना है
सोच कर हैरान हूँ चुप हूँ  कि गुमहवास हूँ मैं ,
किसी को क्या पता ...
*

गुरुवार, 15 दिसंबर 2011

यात्री .


मौन , मै अनजान फिर बोलो कहां आवास मेरा !
*
जिन्दगी की राह रुकने को नहीं विश्राम-बेला ,
आज है यदि साथ लेकिन कल कहीं रहना अकेला !
आज आ पहुँची यहाँ कल लौट जाना ही पडेगा ,
और यह परिचय पहीं पर छोड जाना ही पडेगा !
स्मृतियाँ अनगिन बनी रह जायँगी उर भार मेरा !
*
इन्हीं दो परिचय क्षणों मे ,आज हँस लो बोल भी लो ,
फिर नहीं अवकाश होगा , आज गाँठें खोल भी लो ,
मै नहीं प्रतिबन्ध कोई भी लगाना चाहती हूँ ,
इसी क्रम में ,मित्रवत् ,तुमको समाना चाहती हूँ !
मै प्रवासी ,कहीं बसने का नहीं अधिकार मेरा !

मै स्वयं ही पास आती ,पर यहाँ से दूर जाना ,
रह न जायेगा मिलन के हेतु फिर कोई बहाना !
मंजिलें ये जिन्दगी की विवश रुकती जा रही हूं ,
प्रति चरण पर नेह का उपहार धरती जा रही हूँ !
मोह भर मन साथ पा ले यह नहीं सौभाग्य मेरा !
*
राह मे इस भाँति कितने सुहृद् छूटे ,बन्धु छूटे ,
भार उर पर रह गया सम्बन्ध के सब तार टूटे !
दुख कहीं भी देख मन ,जीने स्वयं लगता उसीको ,
शान्ति से वंचित करूँ क्यों साथ मे लेकर किसी को ,
इन्हीं दो परिचय क्षणों के छोर पर अभियान मेरा !
*
रोक पाये कौन मुझको .ये न चंचल पग थमेगे ,
कौन बाँधेगा,न ये उन्मुक्त बन्धन मे बँधेंगे ,
इसी जीवन यात्रा मे मोह भी है द्रोह भी है ,
है अगर आरोह पहले बाद मे अवरोह भी है
एक उलझन सी अबूझी कौन सा हो नाम मेरा !
*
आज के आवेग बन रह जायँगे बस एक कंपन ,
एक परिचय बन रहेगा आज का यह स्नेह-बंधन !
दो दिनो का साथ देकर याद लेती जा रही हूं ,
औ' तुम्हारे भाव अपने साथ लेती जा रही हूँ ,
आँसुओं के मोल होता हास का व्यापार मेरा !
*
अब यहाँ तो तब वहाँ ,कोई नहीं मेरा ठिकाना ,
आज जी बहला रही हूँ ,शेष है कल दूर जाना ,
आज आई हूँ यहाँ पर है यही मेरी कहानी ,
और स्मृति- शेष होगी एक भूली सी निशानी ,
चार प्रहरों की अवधि फिर तो घिरेगा ही अँधेरा !
*
दो क्षणों से बना जीवन ,यही परिचय ,और क्या दूँ
हास भी है अश्रु भी है अधिक इस से साथ क्या लूं ?
कामना छलना जहाँ औ' शब्द भी हों जाल केवल
भावना अभिनय बने ,लेकर बढूँ मै कौन संबल ,
एक निश्चितत गति भले हो पंथ सीमाहीन मेरा !
*
इस अकेली यात्रा मे राग से वैराग्य तक की ,
मै बनी बेमेल मेले मे ,अनेकों बार भटकी ,
उसी स्नेहिल दृष्टि का अभिषेक चलती बार पा लूँ ,
कर्ण-कुहरों मे गहन ,आश्वस्ति देते स्वर समा लूँ
क्या पता अनिकेत मन लेगा कहाँ जाकर बसेरा !
*
दूर हूं पर पास हूँ मै ,पास हूं पर दूर भी हूं ,
एक परिचय हूं सभी की .दो दिनो की मीत भी हूँ ,
चल रही ,पाथेय लेकर ,जगत की जीवन व्यथा का ,
फिर नया अध्याय रचने के लिये अपनी कथा का ,
मुक्त पंछी मै जहाँ रह लूँ वहीं पर नीड मेरा !
*
यह थकन पथ की, विसंगतियों भरी जीवन -कथा यह,
अनवरत यह यात्रा ,अनुतप्त भटकाती व्यथा यह !
कर्म जो कर्तव्य, मै चुपचाप करती जा रही हूँ,
जगत के अन्तर्विरोधों से गुजरती जा रही हूँ,
यहाँ कुछ अपना न था, क्या नकद और उधार मेरा !
*
रखा जाता यहाँ पर पूरा हिसाब-किताब पल -छिन ,
कर लिया तैयार कागज, बाद मे दीं साँस गिन-गिन !
अब अगर लिखवार ने पूछा ,कहूँगी -' खुद समझ लो !
प्रश्न मुझसे क्यों ,अरे ,लिक्खा तुम्हीं ने,तुम्हीं पढ लो ;
निभा दी वह भूमिका ,जिस पर लिखा था नाम मेरा ! '
*
कहां मेरा जन्म था होगा कहाँ अवसान मेरा
मौन , मै अनजान ,फिर बोलो कहां आवास मेरा !
*
शकुन्तला जी ,
आपने कविता का स्मरण किया .मैं आभारी हूँ (पहले भी मुझसे इसके लिये जिनने कहा - उनकी भी) 
 अपने ब्लाग 'यात्रा - एक मन की ' पर से इसे यहाँ
स्थानान्तरित कर रही हूँ .
- प्रतिभा.

शुक्रवार, 2 दिसंबर 2011

लोक - रंग : छिंगुनिया क छल्ला.


*
छिंगुनिया क छल्ला पे तोहि का नचइबे !
नथुनियाँ न झुलनी न मुँदरी जुड़ी ,
आयो लै के कनैठी अंगुरिया को छल्ला !
इहै छोट छल्ला पे ढपली बजइबे !
*
कितै दिन नचइबे ,गबइबे ,खिजइबे
कसर सब निकार लेई ,फिन मोर लल्ला
कबहुँ गोरिया तोर पल्ला न छोड़ब ,
चिपक रहिबे बनिके तोरा पुछल्ला !
करइ ले अपुन मनमानी कुछू दिन
उहै छोट लल्ला तुही का नचइबे !
*
भये साँझ आवै दुहू हाथ खाली
जिलेबी के दोना न चाटन के पत्ता ,
मेला में सैकल से जावत इकल्ला ,
सनीमा के नामै दिखावे सिंगट्टा !
हमहूँ चली जाब देउर के संगै
उहै ऊँच चक्कर पे झूला झुलइबे !
*
काहे मुँहै तू लगावत सबन का
लगावत हैं चक्कर ऊ लरिका निठल्ला !
उहाँ गाँव माँ घूँघटा काढ रहितिउ ,
इहाँ तू दिखावत सबै मूड़ खुल्ला !
न केहू का हम ई घरै माँ घुसै देब ,
चपड़-चूँ करे तौन मइके पठइबे !
*
लरिकन को किरकट दुआरे मचत ,
मोर मुँगरी का रोजै बनावत है बल्ला ,
इहाँ देउरन की न कौनो कमी
मोय भौजी बुलावत ई सारा मोहल्ला !
छप्पन छूरी इन छुकरियन में छुट्टा
तुहै छोड़ छैला,  न जइबे,न जइबे  !
*
मचावत है काहे से बेबात हल्ला ,
अगिल बेर तोहका चुनरिया बनइबे ,
पड़ी जौन लौंडे-लपाड़न के चक्कर
दुहू गोड़ तोड़ब घरै माँ बिठइबे !
छिंगुनियाके छल्ला पे ...!
- प्रतिभा सक्सेना.
*
थोड़ा-सा मनोरंजन  - एक पुरानी रचना .

बुधवार, 30 नवंबर 2011

अक्षरित


*
एक  जीवन्त रचना -
नव - नीड़ ,
चिड़ी-चिड़ा - सहचरी-सहचर .
अथक श्रम
रात-दिन,दिन-रात
दौड़ते-भागते श्रम के पहर !
काल - बिरछ की  टहनी पर
जमा लिया चुन-चुन, तिन-तिन
आस- विश्वास की  डोरियों से बाँधं,
नेह-मोह लिपटे आस के रेशों से
 एक संसार !
*
बरसा-बूँदी के घात,
हवाओं की बिखेर झेलते
सेते रहे हिरण्यगर्भी कल्पनायें ,
कि नीड़ से आगे  खुले आकाश में
उड़ेंगे ये  हमारे संस्करण !
पुरी आस ,सफल प्रयास,
खुली दिशायें ,
नये आकाश ,नयी बातास !
*
ऋतुयें आयें-जायेंगी ,
पुराने पात जगह देंगे कि
नई बहार खिलती रहे !
नये अवतरण,
होते रहेंगे बारंबार
वही  नेह जतन !
लघु-लघु अँकनों में ,
एक ही कथा के
आगे के प्रकरणों जैसे .
अध्याय पर अध्याय ,
पंक्ति-बद्ध   ,
अनवरत-अविरल ,अनुक्रम !
*
बिखेर तिनके पुराने
काल - क्रम में चक्कर काटते
उड़ जाएंगे चिड़ा-चिड़ी ,
जीवन की चिर-नव्यता
का पाठ फिर-फिर दोहराने !
सृष्टि की महागाथा के
अक्षरित सम में .
*

रविवार, 13 नवंबर 2011

वृन्दावन- धाम.


*
रे मन,चल वृन्दावन- धाम !
*
जहँ निचिंत, गत शोक-मोह ,व्यापे न कुमति -अज्ञान ,
घिरें न बोझिल मेघ ,तपन के मौसम घिरें न आन !
*
भटक-भटक कर थकी देह औ' सधा न कौनो काम ,
कोई न स्वजन ,अजाना हर जन ,ऐसे  जग हिं प्रणाम !
*
जहां न दुख का लेश ,थकित तन को अनंत विश्राम ,
शंका  ग्रसै,  न डसै भीति ,चल रे, उहि लोक ललाम !
*

शनिवार, 29 अक्टूबर 2011

शार्दुला की आस्था के स्वर.

 आज की पोस्ट में, अपनी मित्र शार्दुला जी की आस्था के स्वर आप सब तक पहुँचाना  चाहती हूँ ,उन्हीं के वक्तव्य के साथ -
     
(भारत की धऱती से  से दूर ,सारे दिन  ऑफ़िस में व्यस्त ) ..इतनी  सरूफ़ियत के बावजूद ये गीत इसलिए लिखा गया क्योंकि अन्नकूट के दिन सुबह अन्नकूट नहीं बना सकी थी सुबह ,जल्दी से बस जो सबके टिफिन के लिए बनाया था, रायता और केला माधव को चढ़ा के आ गई थी... पसाद चढाते समय आँखों में आँसू आ गए और मन ने कहा गोपाला, जो भी जहाँ  भी है सब तेरा है, सब तुझे अर्पित है... अब यही खाओ जब तक लौट नहीं आती घर शाम में...

 रात को फ़िर अन्कूट बनाते बनाते नौ बज गए थे..
बस  गोवर्धन पूजा के दिन दफ़्तर जाते समय मेट्रो ट्रेन में ये कविता बन गई थी ..." जो जैसा है वैसा अर्पण".
.
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माधव तेरे श्री चरणों में

माधव तेरे श्री चरणों में जो जैसा है, वैसा अर्पित
आर्द्र अरुण अड़हुल का आंचल, नाद शंख सागर में गुंजित
गंध, हवाएं, ऋतु की डलिया, फल-फूलों से भरी-भरी सी
सबमें है तू, तुझमें हैं सब, तू ही याचक, तू ही वन्दित
*
उन्नत शिखर, घुमंतू बादल, रज नटखट शीशे चमकाती
उषा सुन्दरी, निशा सहचरी, संध्या वंदन, लीन प्रभाती
गोचर स्पर्श, खिलौने तेरे, बिखराए तूने गोपाला
तेरे अर्पण को वनदेवी, मोर-पंख पे मणि रख जाती
*
भाव-रुंधे स्वर, प्रीत-जुड़े कर, शुचि, संपन्न, शुभ्र सब तेरे
तिमिर हृदय के, तुमुल विलय के, पातक-हरण ग्रहण कर मेरे
जीवन-धारा, कूल-किनारा, यश-अपयश, सुख-दुःख की लहरें
देय-अदेय, बिंधे छन्दों की बाँसुरिया वनमाली ले रे!
 *
सादर ,
शार्दुला.
(गोवर्धनपूजा, २७ अक्टूबर २०११).
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मेरी बधाई स्वीकार करो ,प्रिय शार्दुला!