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रे मन,चल वृन्दावन- धाम !
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जहँ निचिंत, गत शोक-मोह ,व्यापे न कुमति -अज्ञान ,
घिरें न बोझिल मेघ ,तपन के मौसम घिरें न आन !
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भटक-भटक कर थकी देह औ' सधा न कौनो काम ,
कोई न स्वजन ,अजाना हर जन ,ऐसे जग हिं प्रणाम !
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जहां न दुख का लेश ,थकित तन को अनंत विश्राम ,
शंका ग्रसै, न डसै भीति ,चल रे, उहि लोक ललाम !
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