*
कितनी मक्खियाँ उड़ रही हैं !
नहीं ये कविताएं हैं ,
पत्रिकाओं पर जम जाने के लिए -मिठाई हो जैसे !
हाथ हिलाता परेशान संपादक बेचारा ,
जितनी हटाओ और उड़ आती हैं ,
एक बार मे कितनी-कितनी !
सबसे आसान काम - कविता लिख डालो ,
दूसरे लोग हैं न सोचने को समझने को !
शब्द ?
डिक्शनरी उठा लो ,जितने चाहो छाँट लो !
तुक मिलाना जरूरी नहीं !
जो लिखो- वाह !वाह !
विज्ञापन से बची किसी खाली जगह को
भरने के काम आ जाय बस काफ़ी है !
*
शुक्रवार, 9 जुलाई 2010
बुधवार, 23 जून 2010
बंधु रे !
*
बंधु रे ,
लौट चलो अब !
इतनी देर मत कर देना
कि तुम्हारी ही धरती तुम्हें पहचान न सके ,
:भूल जाये तुम्हारा नाम और पहचान ।
*
अभी तुम्हें याद करते हैं सब ,
बहिन-भाई ,मित्र -पहपाठी अपने पराये :
सभी को ध्यान है तुम्हारा !
इतनी देर मत लगा देना कि ,
अपरिचित बन जायँ प्रिय स्थान ,
कभी ढूँढो किसी आँख में अपनापन,
पर रह जाओ एक अजनबी.
उसी मिट्टी के लिये ,जिसने रची यह देह ;
उसी हवा से जिसने जीवन को साँसें दीं !
उसी जल से जिसने सींचा तन- मन को
भरा कितने नयनों को चलती बार !
इन मौसमों ने बरसों रच -रच कर
सँवारा कि तुम 'तुम' बन सके !
*
नई धरती !
जहाँ जुड़ने के लिये खोजते हो हम वतन को !
घर में क्या कभी किसी को
ढूँढने की जरूरत पड़ी थी ?
ओ रे बंधु ,
इतनी देर मत कर देना कि
यहाँ की हवायें तुम्हारा रंग बदलने लगे
और अपनी ही पहचान गँवा बैठो तुम !
*
बस चलो अपने घऱ !
कहीं ऐसा न हो
कि फिर कभी
लौटना संभव न रहे !
*
बंधु रे ,
लौट चलो अब !
इतनी देर मत कर देना
कि तुम्हारी ही धरती तुम्हें पहचान न सके ,
:भूल जाये तुम्हारा नाम और पहचान ।
*
अभी तुम्हें याद करते हैं सब ,
बहिन-भाई ,मित्र -पहपाठी अपने पराये :
सभी को ध्यान है तुम्हारा !
इतनी देर मत लगा देना कि ,
अपरिचित बन जायँ प्रिय स्थान ,
कभी ढूँढो किसी आँख में अपनापन,
पर रह जाओ एक अजनबी.
उसी मिट्टी के लिये ,जिसने रची यह देह ;
उसी हवा से जिसने जीवन को साँसें दीं !
उसी जल से जिसने सींचा तन- मन को
भरा कितने नयनों को चलती बार !
इन मौसमों ने बरसों रच -रच कर
सँवारा कि तुम 'तुम' बन सके !
*
नई धरती !
जहाँ जुड़ने के लिये खोजते हो हम वतन को !
घर में क्या कभी किसी को
ढूँढने की जरूरत पड़ी थी ?
ओ रे बंधु ,
इतनी देर मत कर देना कि
यहाँ की हवायें तुम्हारा रंग बदलने लगे
और अपनी ही पहचान गँवा बैठो तुम !
*
बस चलो अपने घऱ !
कहीं ऐसा न हो
कि फिर कभी
लौटना संभव न रहे !
*
सोमवार, 14 जून 2010
मछरिया बता ,
भाग 1.
कितनी गहरी है नदिया मछरिया बता ,
*
पानी कितना है होगा तुझी को पता !
और क्या-क्या लिखे जा रही ये लहर
साक्षी तू निरंतर , मुझे भी बता,
अक्षरों से बना औ' मिटा नीर पर
*
और बढ कर कहाँ से कहाँ जायगी
तू शुरू से बता ये पुरानी कथा ,
बुदबुदा कर हवा ने यहाँ जो कहा ,
और लहरों ने पानी में क्या क्या रचा
*
डूब कितनी लहर की मुझे तू बता !
बाँह फैला उमड़ती हुई बढ़ रही,
रूप औ रंग रच-रच सँवारे गये ,
फिर सभी कुछ समेटे लिये फिर गईं !
*
री बता तू कहाँ से चला सिलसिला
किस तरह काल ने लीं यहाँ करवटें !
गुज़रीं सदियाँ यहाँ काफिलों की तरह,
तल में शायद पड़ी हों कहीं सलवटें !
*
ओ री मछली, तुझे तो सभी है पता ,
कितनी गहरी है नदिया मछरिया बता !
*
भाग 2.
इस जल में भँवर जाल फैले हुए
मैं न जानू ये धारा कहाँ से चली ,
ये हैं सारी ही बाहर की परछाइयाँ!
और कोरी पड़ी भीतरी है तली !
**
नीर टिकता नहीं इस नदी में कहीं
चला आता है जाता है बहता चला ,
एक भी बूँद थिर रह न पाती कहीं
और रहता है उतना का उतना बना !
मैं न जानूँ कि कितना यहाँ नीर है,
ऊपरी तह सजाये है सब हलचलें ।
कैसी सीपें हैं कैसे हैं मोती यहाँ
कौन आये यहाँ डूब कर थाहने !
*
इसमें बहने से कोई नहीं बच सका ,
हाँ यहीं से चली है कथा काल की !
बस दिखाती हैं बाहर के रँग रूप को,
जो समाया कभी भी बताती नहीं!
*
और हर पल बिछलते लहर जाल में
डोलती झूलती सिर्फ़ परछाइयाँ ,
ये तो आता है जाता है बहता चला ,
रूप रंगों रचा, धूप- छाहों भरा !
*
रोशनी जो दिखाती अनूठा जगत ,
रूप के बिंब हैं बाहरी वे सभी !
ओ रे पागल ,जहाँ रम रहा आज तू
जाने कितने वहाँ बस चुके हैं कभी !
कितनी गहरी है नदिया मछरिया बता ,
*
पानी कितना है होगा तुझी को पता !
और क्या-क्या लिखे जा रही ये लहर
साक्षी तू निरंतर , मुझे भी बता,
अक्षरों से बना औ' मिटा नीर पर
*
और बढ कर कहाँ से कहाँ जायगी
तू शुरू से बता ये पुरानी कथा ,
बुदबुदा कर हवा ने यहाँ जो कहा ,
और लहरों ने पानी में क्या क्या रचा
*
डूब कितनी लहर की मुझे तू बता !
बाँह फैला उमड़ती हुई बढ़ रही,
रूप औ रंग रच-रच सँवारे गये ,
फिर सभी कुछ समेटे लिये फिर गईं !
*
री बता तू कहाँ से चला सिलसिला
किस तरह काल ने लीं यहाँ करवटें !
गुज़रीं सदियाँ यहाँ काफिलों की तरह,
तल में शायद पड़ी हों कहीं सलवटें !
*
ओ री मछली, तुझे तो सभी है पता ,
कितनी गहरी है नदिया मछरिया बता !
*
भाग 2.
इस जल में भँवर जाल फैले हुए
मैं न जानू ये धारा कहाँ से चली ,
ये हैं सारी ही बाहर की परछाइयाँ!
और कोरी पड़ी भीतरी है तली !
**
नीर टिकता नहीं इस नदी में कहीं
चला आता है जाता है बहता चला ,
एक भी बूँद थिर रह न पाती कहीं
और रहता है उतना का उतना बना !
मैं न जानूँ कि कितना यहाँ नीर है,
ऊपरी तह सजाये है सब हलचलें ।
कैसी सीपें हैं कैसे हैं मोती यहाँ
कौन आये यहाँ डूब कर थाहने !
*
इसमें बहने से कोई नहीं बच सका ,
हाँ यहीं से चली है कथा काल की !
बस दिखाती हैं बाहर के रँग रूप को,
जो समाया कभी भी बताती नहीं!
*
और हर पल बिछलते लहर जाल में
डोलती झूलती सिर्फ़ परछाइयाँ ,
ये तो आता है जाता है बहता चला ,
रूप रंगों रचा, धूप- छाहों भरा !
*
रोशनी जो दिखाती अनूठा जगत ,
रूप के बिंब हैं बाहरी वे सभी !
ओ रे पागल ,जहाँ रम रहा आज तू
जाने कितने वहाँ बस चुके हैं कभी !
गुरुवार, 10 जून 2010
रोशनाई से .
स्याही से नहीं रोशनाई से लिखो कलम !
लेखनी , सँवारो रूप-रंग शब्दों का भी,
उद्घाटित कर दो मर्म कि सब छँट जायँ भरम.
*
अध्याय बदल दो ,पन्ना नया पलट लो अब ,
कुछ नई अर्थिता चिंगारियां बिखर जाएं.
इस अंध तमस में तपन प्रज्ज्वलित भऱ स्वर की
निर्बाध बहें शिव-संकल्पों की धाराएँ !
निखरे-निखरे पल हों, विरोध- प्रतिरोध शमन.
*
कैसा विश्राम ? थकन का नाम न ले यह गति ,
मति आत्मसीमिता रहे न विभ्रम की कारा.
यह समय निरर्थक जाय न ऊहापोहों में ,
ऊर्जित मन के आकाशों में हो ध्रुव तारा.
नभ छोर जगा दें प्रखर दीप्ति के आवाहन !
*
स्याही से नहीं रोशनाई से लिखो कलम !
*
लेखनी , सँवारो रूप-रंग शब्दों का भी,
उद्घाटित कर दो मर्म कि सब छँट जायँ भरम.
*
अध्याय बदल दो ,पन्ना नया पलट लो अब ,
कुछ नई अर्थिता चिंगारियां बिखर जाएं.
इस अंध तमस में तपन प्रज्ज्वलित भऱ स्वर की
निर्बाध बहें शिव-संकल्पों की धाराएँ !
निखरे-निखरे पल हों, विरोध- प्रतिरोध शमन.
*
कैसा विश्राम ? थकन का नाम न ले यह गति ,
मति आत्मसीमिता रहे न विभ्रम की कारा.
यह समय निरर्थक जाय न ऊहापोहों में ,
ऊर्जित मन के आकाशों में हो ध्रुव तारा.
नभ छोर जगा दें प्रखर दीप्ति के आवाहन !
*
स्याही से नहीं रोशनाई से लिखो कलम !
*
गुरुवार, 6 मई 2010
असल के बंद
*
कमल के फूल देखे ?
हुँह..!
हवाई बात अब छोड़ो ,
जो जीवन असलियत में हो ,
चलो ,कविता उधर मोड़ो.
*
किनारा मत करो अब वास्तविक रस से -
असल है फूल गोभी का ,
कि जैसे घाट धोबी का
इसी से पेट पलता ,
ज़िन्दगी का काम सब चलता .
ये नन्हें फूल धनिये के कलात्मक पत्तियाँ उनकी,
बड़ी सुकुमार सुन्दरता अनोखी गंध से तनतीं !
कि पत्ते पीस लो तो चाट वाला स्वाद आ जाए ,
कि रूखी रोटियाँ चटनी लगा कर चटपटा जाएँ .
यही हो स्वाद कविता का !
*
गुलाबों को भुला दो .
फूल सरसों के यहाँ लाओ ,
वसंती फूल हैं उनको सजाओ,
और बस जाओ
उन्हीं तैलीय गंधों में ,
डुबोए शब्द हों सारे .
यही तो मज़ा मौसम का तुम्हें दे जाएंगे प्यारे .
*
रसों की भाप में हो स्वरित
गंध -सुस्वाद भर रुचि कर
इन्हीं का पाक बनता है ,
तभी व्यंजन सँवरता है .
परम परितृप्त करता है .
*
लता सी यौवना क्यों ?
लचकती सहिजन फली बोलो ,
मसालेदार सोंधा रूप फिर-फिर याद आएगा.
कि सब्ज़ी कह कदर मत कम करो ,
तरकारियाँ बोलो
कि मन भी सीझ जाए, रीझ जाएगा .
*
चटक सुर्खी टमाटर की मटर की कचकची फलियाँ,
अरे ये प्याज़ जैसे ताम्रवर्णी आचमन- लुटियाँ ।
लपट-सी गाजरों का रंग खिलाता देख कर पालक ,
चमकते बैंगनों की श्यामता में भक्तिवाला पुट ,
सलोनी भिंडियाँ जब उंगलियों जैसी सुझाई दे .
कि कोई देख कर ही हो न जाए चारखाने चित !
*
कि जाए झूम कवि का मन .
यही सौंन्दर्य के उपभोग का
रसभोग का मौसम.
शकर के कंद का मौसम,
असल के बंद का मौसम !
*
कमल के फूल देखे ?
हुँह..!
हवाई बात अब छोड़ो ,
जो जीवन असलियत में हो ,
चलो ,कविता उधर मोड़ो.
*
किनारा मत करो अब वास्तविक रस से -
असल है फूल गोभी का ,
कि जैसे घाट धोबी का
इसी से पेट पलता ,
ज़िन्दगी का काम सब चलता .
ये नन्हें फूल धनिये के कलात्मक पत्तियाँ उनकी,
बड़ी सुकुमार सुन्दरता अनोखी गंध से तनतीं !
कि पत्ते पीस लो तो चाट वाला स्वाद आ जाए ,
कि रूखी रोटियाँ चटनी लगा कर चटपटा जाएँ .
यही हो स्वाद कविता का !
*
गुलाबों को भुला दो .
फूल सरसों के यहाँ लाओ ,
वसंती फूल हैं उनको सजाओ,
और बस जाओ
उन्हीं तैलीय गंधों में ,
डुबोए शब्द हों सारे .
यही तो मज़ा मौसम का तुम्हें दे जाएंगे प्यारे .
*
रसों की भाप में हो स्वरित
गंध -सुस्वाद भर रुचि कर
इन्हीं का पाक बनता है ,
तभी व्यंजन सँवरता है .
परम परितृप्त करता है .
*
लता सी यौवना क्यों ?
लचकती सहिजन फली बोलो ,
मसालेदार सोंधा रूप फिर-फिर याद आएगा.
कि सब्ज़ी कह कदर मत कम करो ,
तरकारियाँ बोलो
कि मन भी सीझ जाए, रीझ जाएगा .
*
चटक सुर्खी टमाटर की मटर की कचकची फलियाँ,
अरे ये प्याज़ जैसे ताम्रवर्णी आचमन- लुटियाँ ।
लपट-सी गाजरों का रंग खिलाता देख कर पालक ,
चमकते बैंगनों की श्यामता में भक्तिवाला पुट ,
सलोनी भिंडियाँ जब उंगलियों जैसी सुझाई दे .
कि कोई देख कर ही हो न जाए चारखाने चित !
*
कि जाए झूम कवि का मन .
यही सौंन्दर्य के उपभोग का
रसभोग का मौसम.
शकर के कंद का मौसम,
असल के बंद का मौसम !
*
शुक्रवार, 30 अप्रैल 2010
कभी कभी
कभी कभी महफिल से उठ कर चल देने का मन होता है,
*
जो देना था भूल गई ,आई सबसे ही अब तक लेती
कैसी यह अदम्य तृष्णा,जो नयनो को ही छाये लेती .
दृष्टि उन्हीं में रमी कि सारी समझ-बूझ हो गई किनारे
अभी रोशनी के घेरे हैं यह केवल मति-भ्रम होता है .
*
कितना जतन ,और क्या साधन, जो कुछ समाधान दे पाए
भीतर-बाहर के आरोपण हटा पात्र, दर्शक रह जाए .
डुबा-डुबा कर हारी, तन की गागर तिरती रही अकेली ,
हलका करना चाहा कितना, उर का भार न कम होता है .
*
चुप रहने से क्या जब जतला दे उतरा आता भीगापन
जिह्वा पर आ कह जाए लो चख लो अब अपना खारापन
उठते हुए सवालों का उत्तर देना हो जाय असंभव
सब से ओझल हो जाने को यही शेष उपक्रम होता है !
*
*
जो देना था भूल गई ,आई सबसे ही अब तक लेती
कैसी यह अदम्य तृष्णा,जो नयनो को ही छाये लेती .
दृष्टि उन्हीं में रमी कि सारी समझ-बूझ हो गई किनारे
अभी रोशनी के घेरे हैं यह केवल मति-भ्रम होता है .
*
कितना जतन ,और क्या साधन, जो कुछ समाधान दे पाए
भीतर-बाहर के आरोपण हटा पात्र, दर्शक रह जाए .
डुबा-डुबा कर हारी, तन की गागर तिरती रही अकेली ,
हलका करना चाहा कितना, उर का भार न कम होता है .
*
चुप रहने से क्या जब जतला दे उतरा आता भीगापन
जिह्वा पर आ कह जाए लो चख लो अब अपना खारापन
उठते हुए सवालों का उत्तर देना हो जाय असंभव
सब से ओझल हो जाने को यही शेष उपक्रम होता है !
*
शनिवार, 17 अप्रैल 2010
क्या कर लोगी
*
स्वेच्छाचारिणी ,
एक गाली है तुम्हारे लिए .
जैसा चलाया जाय चलो
और सन्नारी कहाओ!
*
स्वयंवर ?
कैसी बात करती हो !
ज़बर्दस्ती उठा लाएँगे तुम्हें ,
हो गया स्वयंवर!
*
हमारी लूट का माल ,
हमने जीता !
देंगे जिसे चाहे !
नकारा पति ,संतान पैदा न कर सका तो क्या ,
जिससे चाहें ,नियोग करवा देंगे
तुम्हारी स्वीकृति का सवाल कहाँ !
और तुम्हारी रुचि?
बेकार बात !
*
स्वीकार करना पड़ेगा जिससे हम कहें ,
चाहे वितृष्णा से आँखें बंद कर लो ,
चाहे भय से पीली पड़ी रहो ,
धृतराष्ट्र और पाँडु पैदा हो जायँ ,
हो जाने दो !
पैदा हम करवा रहे हैं .
*
हम जो चाहे करेंगे ,
बुढ़ापे को भड़काती इच्छाएँ पूरी करेंगे ,
जवान पुत्र दाँव लगा कर .
कोई क्या कर लेगा हमारा ?
*
स्वेच्छाचारिणी ,
एक गाली है तुम्हारे लिए .
जैसा चलाया जाय चलो
और सन्नारी कहाओ!
*
स्वयंवर ?
कैसी बात करती हो !
ज़बर्दस्ती उठा लाएँगे तुम्हें ,
हो गया स्वयंवर!
*
हमारी लूट का माल ,
हमने जीता !
देंगे जिसे चाहे !
नकारा पति ,संतान पैदा न कर सका तो क्या ,
जिससे चाहें ,नियोग करवा देंगे
तुम्हारी स्वीकृति का सवाल कहाँ !
और तुम्हारी रुचि?
बेकार बात !
*
स्वीकार करना पड़ेगा जिससे हम कहें ,
चाहे वितृष्णा से आँखें बंद कर लो ,
चाहे भय से पीली पड़ी रहो ,
धृतराष्ट्र और पाँडु पैदा हो जायँ ,
हो जाने दो !
पैदा हम करवा रहे हैं .
*
हम जो चाहे करेंगे ,
बुढ़ापे को भड़काती इच्छाएँ पूरी करेंगे ,
जवान पुत्र दाँव लगा कर .
कोई क्या कर लेगा हमारा ?
*
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