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देह को परिमापते अक्षाँश-देशान्तर सुकल्पित ,
रुचिर रेशम-डोरियाँ ज्यों कसें तन-संभार सुललित
शिखर हिम के धर धरणि, हेमल किरीटी हो रहीं तुम
दिवस के स्वर्णावरण , हर रात्रि का अभिसार नूतन ,
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स्वर्ण -रत्नों भरा अंतर सजल करुणा से भरा उर
.खग-मृगों से क्रीड़िता ,कल्लोल कलरव से रहीं भर
नित नया धन-धान्य पूरित धारतीं भंडार अक्षय
सहन शक्ति अपार सबका ही बनी आधार निर्भय ..
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स्नेह उर से हो निसृत अमृतमयी पय धार सरसा
पर्णपाती कहीं सदाबहार वन ,के रोम हरषा,.
घाटियाँ फूलोंभरी ,तरुराजियों से पूर गिरि वन ,
ले अमित वरदान जगती के लिये वात्सल्यमयि तुम
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आदि- अंत विहीन अव्यय-नाद की अनुगूँज धारे
धरणि-गंधा रज बनाती औ'समाती रूप सारे
शरण्ये,,श्री-सहचरी, तुम रेणुमयि परमा परम् हे
महा करुणा रूपिणी जननी तुम्हें शत-कोटि वंदन .
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किन्तु जब अतिचार पर उद्धत मनुज स्वार्थांध होकर
लालसाओं के लिये औचित्य को दे मार ठोकर ,
निराकृत हो रूप धर प्रतिकार हित बन सर्वनाशी
सृष्टि के उस पाप को जड़-मूल से उच्छिन्न करतीं ..
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थरथरातीं दिशायें ,अँगड़ाइयाँ जब क्रुद्ध भरतीं ,
तुम्हीं ले भूकंप ,सागर जल उलटतीं औ'पलटतीं ,
फूँक ज्वालायें गगन में धूम की जलती फुहारें
तरल अग्रि -प्रवाह सा लावा उगलतीं क्रुद्ध धारें.
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रौद्र रूप धरे ,कि अंतर में उठे जब क्षुब्ध ज्वाला,
प्रलय सी उद्धत ,तुम्हीं बन चंडिका काली कराला,
कर रहीं प्रतिकार लिप्सा -लोभ अति दुर्नीतियों का ,
द्रोह का ,निस्सीम बढ़ती लालसा के संवरण का .
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माँ धरणि के पुत्र तुम मानव समर्थ सुबुद्ध दृढ़मति
मिली क्षमतायें सभी, मत स्वा,र्थ वश करना न तुम अति
बने एक कुटुंब वसुधा ,जीव-जग सब ही सहोदर
सभी को अधिकार देना और उनका भाग सादर..
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पूर्ण विकसित रूप दे मानव तुझे माँ ने सहेजा,
शुभाशंसा सृष्टि की ले सर्वभूतों की कुशलता ,
मान कर दायित्व अपना ,आत्म निष्ठ विचारणा से
भावना से भर विवेकी बुद्धि से, शुभ-कामना से .
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फिर धरा के मंच पर नव-सृष्टि का शुभ अवतरण हो,
कुटुंबिनि का रूप धऱ सब प्राणियों में भाव सम हो !
.हो सभी चैतन्य पाकर दिव्यता के अमृत स्पंदन,
इसी रज से रचित हो कर सुवासित तन ,धन्य जीवन .
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