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शनिवार, 20 अगस्त 2011

बाँसुरी मैं .


*
ग्रंथियों के बंध से कर मुक्त तुमने
काठ थी सूखी, कि रच-रच कर सँवारा ,
रंध्र, रच ,जड़ सुप्त उर के द्वार खोले
राग से भर कर मुझे तुमने  पुकारा,
*
पोरुओं से परस, कैसा तंत्र साधा
 कर दिया तुमने सकारथ वेदना को ,
मंत्र जाग्रत कर दिया फिर-फिर स्वरित  कर ,
दीप्ति दी , धुँधला रही-सी चेतना को .
*
जुड़ गई जिस क्षण तुम्हारी दिव्यता से
देह की जड़ता जकड़ किस भाँति पाये ,
नहीं कुछ भी व्यापता तन्मय हृदय को
बोध तो सारे तुम्हीं में जा समाये .
* ,
बाह्य से हो कर विमुख अंतस्थता में
डूब कर ही तो व्यथा से त्राण पाया ,
आत्म-विस्मृति से उबर किस भाँति पाऊँ,
उच्छलित आनन्द जब उर में समाया .
*
पात्रता दी राग भर अपना   तुम्हीं ने  ,
साध कर अपने करों में मान्यता दी .
बावली मति धार सिर, आश्वस्ति दे दी
सरस अधरों से परस कर धन्यता दी.
   *
फूँक दे तुमने कि मोहन मंत्र साधा
गा उठीं जीवन्त हो कर तंत्रिकायें ,
भर दिये उर में अचिर अनुराग के कण
नाच उठतीं  मोरपंखी चंद्रिकायें .
*
चल रहा अभिचार यह कैसा तुम्हारा,
 प्राण , वीणा से सतत झंकारते हैं ,
उमड़ आते ज्वार ,मानस के जलधि में,
  तोड़ते तटबंध तुम्हें पुकारते हैं  .
*  
फिर वही स्वर जागते अंतरभुवन में,
 रास राका ज्योत्स्ना जमुना किनारे .
प्रेम का संदेश जब भी गूँज भरता ,
 तुम्ही -तुम हर ओर शत-शत रूप धारे .
*
वंश की लघु- खंडता से  मुक्ति दे,
अवरुद्ध अंतर-वासना तुमने सँवारी .
पूर्णता पाई तुम्हारे अंग से लग ,
चिर-सुहागिन, बाँसुरी मैं हूँ तुम्हारी !
*