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शनिवार, 6 सितंबर 2014

कुँआरी नदी - 2 .

 12.

पूर्वराग# में मगन नरमदा रहती खोई-खोई ,
जुहिला सखि,के नाते करती रहती थी दिलजोई.
'प्रीत पाल ली मन में ,चुपके जाकर मिल भी आ, री ?'
'चुप्पै बैठ जुहिलिया, लाज शरम तू कुछ न विचारी .'
*
( और फिर एक दिन -)
13.
कुहनी टिकाये अधलेटी-सी रेवा पी को लिखे प्रेम पाती,
ऐसी मगन सुध खोई, न जानी ,जुहिला खड़ी मुसकराती .
'पाती  लिखै, बेसरम - बेहया ,कइस   बैठी इहाँ पे अकेली ,
मो सों न चोरी चलिबे तिहारी, बचपन से मो संग खेली !
14.
'सुन री सखी ,मोरी जोहिला बहिनियाँ,जाने तू मनवा की पीर ,
चाहों में काटूँ जो रतियाँ अकेली तू ही बँधावे धीर .
साथी रहे शोण बालापने को, मँगेतर भयो मन हुलास .
मैं तो सयानी भई ,मेरी सजनी , पी से मिलन की  आस !'
15.
दोनों सखी साथ बहती चलीं एक दूजी से कर मन की बात
'कासे कहूँ, लाज लागे मोहे, एक तू ही पे मोरा बिसास.
जुहिला री गुइयाँ , मोरी सखी ,काके हाथन पठाऊँ सँदेस? '
'चिन्ता न कर मोरी बहिनी नरबदा ,काहे करे हिय हरास !
16.
'अबके सहालग पे आयेंगे ब्याहन दूल्हा बने सिर मौर ,
फिर हम कहाँ साथ ,होंगे सहेली , थोरी सबूरी    और .
तोरी लिखी प्रेम-पाती ला बहिनी, ले  जाऊँ जीजा के पास .'
हुलसी नरबदा ,आगे बढ़ी थाम लीन्हें जुहिलिया के हाथ.
17.
'एकै तु ही , मोरे हियरा की जाने ,तो से ही पाऊँ मैं धीर,
मोरे  लिख्यो तू ही पहुँचाय दीजो, मोरे पिया जी के तीर.
 तुरतै न पकराय  दीजो, तभै  जब ओ ही  करें  मोहे याद  .
  पहले परीच्छा लीजो सखी , जान लीजो हिया को  सुभाव .'

18 .
 थोरा खिजा के, थोरा  रिझा के ,बातन से करके बनाव,
चक्कर में जीजा को डालूंगी पहले  ,संदेसवा ताके बाद .
 विरहा की पाती अपने से  बाँचेगा तेरा पिया हो निरांत$ !
गुनती रहौंगी   चेहरे की भंगी, हियरा का पढ़ लूँगी साँच.

19.
 तेरी सखी हूँ ,जानेगा तब ही  ,ला री ला, चिठिया दे  हाथ.
 पहनावा तेरा धारूँगी गुइयाँ , होवे बड़ा ही   मजाक.
हँस के नरबदा ने खोली पिटारी ,पहिना दी भूषण-वस्त्र .
'जुहिला ,अरी तू  पिछानी न जाये ',रेवा तो एकदम निःशब्द !
20.
'अँगियामें,घाघरमें,चूनरमें,चोलीमें रेवा री,का की सुगंधि?'
'पिया की लाई बकावलि धरी ही, ऐ ही पिटरिया में संचि.
 या ही में मोरे प्राण बसत हैं ,हे सखि ,  कहियो जाय !'
रेवा ने जुहिला को तुरतै पठायो अापुन सौंह दिबाय
21.
रेशम की अंगिया,लहरिया की चूनर,घघरी की घूमें अछोर,
बाहों में जगमग  सतरँग चुरियाँ  , छाती पे हारें हिलोर.
 जुहिला चलीें ,तन लहरे    ,सुगंधी मह-मह पवन  उड़ाय,
 यौवन का मद अइस भारी,धरति पे धारत पग डगमगाय.
*
22
 पाती अंगिया  ठूँस धरी,गति बल खाती,लहराती ,
देख कुमारी रेवा की रह गई धक्क से छाती .
देखत रही लगाए  टक-टक  , उठी हिया में हूक,
अइस  मरोर उठे , हुइ जाये कहीं कलेजा  टूक  .
22
बावलिया सी जुहिला नेह- मुग्ध  पर  रीत  न जाने,
क्या कुछ  ये कह डाले ,फिर क्या सोचे शोण न जाने.
 गई ,गई वह गई ,न जाने वो लौटे  क्या करके ,
चैन न पल भर पाए रेवा ,समय न आगे सरके .

*

# पूर्वराग --विरह के चार प्रकारों - पूर्वराग ,मान ,प्रवास और करुण, में से प्रथम.
$ निरांत --इत्मीनान से .
(क्रमशः )