*
कहाँ तू स्वच्छंद ,तेरे छंद कस्तूरी ,
गंध योजन भर बिखेरे ,
दूर से ही जो दिपे रे ,
तंत्र में जब से बसी अभिशप्त कस्तूरी.
*
बन गया संदेश दुर्धर,
फूटता यह गंध निर्झर
नाभि-मंडल में समाये,
मर न पाये, जी न पाये
भटकती आकुल, किये मद-अंध कस्तूरी !
*
सूर्य कर से दमकता तन ,
दे रहा हो स्वर्ण का भ्रम
री मृगी ,वन-पर्वतों में,
खोजती फिरती तृणों में
प्रबल आकर्षण विकल, हर रंध्र कस्तूरी !
*
देह के अस्तित्व में धर ,
दिया कैसा गंध निर्झर !
किस तरह निज में समेटे
बोध अपने ही ठगे से,
स्वयं से अनभिज्ञ रची अनंग कस्तूरी!
*
प्राण तेरे खींचने को
बाण साधा व्याध ने जो
कर रहा संधान पीछे ,
एक भी अवसर न चूके.
व्याध से दूरी निभे किस ढंग कस्तूरी ,
*
और फिर देता निमंत्रण ,
साँस से महका समीरण
शत शरों के दंशवाली
चुभन भरती नोक ढाली ,
मार्ग क्षण-क्षण हो रहा दुर्लंघ्य कस्तूरी .
*
दहकते क्रीड़ा-वनों में
छिटकते जलते तृणों में
प्रज्ज्वलन हर ओर दारुण,
बने अग्नि-स्तंभ तरुगण
नाभि कुंडल रची वही अदम्य कस्तूरी !
*
रूप-गुण ने बैर साधा,
श्वास भी बन जाय बाधा
दौड़ अंधाधुंध तब तक,
रक्त आलक्तक रचें पग.
करुण मरण-मृदंग कर दे मौन कस्तूरी , !
*
मत्त बन, कर लिया धारण ,
किस तरह हो फिर निवारण,
शाप बन कर ग्रस रहा वर
टीसता अंतर विषम-शर.
एक दिन तुझको करे निस्पंद कस्तूरी ,
*
प्राण ले कर भागती डर,
काल से कैसे बचे पर,
वही कर्षण खींच लाता
दिशा देता पथ बताता.
इन्द्रियों के बोध भी अवसन्न कस्तूरी.
*
आ गई क्यों इस धरा पर ,
वेदना- संस्कार लेकर?
कुछ न पायेगी यहाँ तू
दुसह व्रत-आचार लेकर,
सिर्फ़ सहना ही, भटक निस्संग कस्तूरी !
*
अब कहाँ का शान्ति औ-सुख ,
कुछ नहीं री. मनोवांछित.,
भाग कर जाये कहाँ
हिरनी शरण पाये कहाँ ?
कुरंगिनि री, मरण का अनुबंध कस्तूरी !
तू कहाँ स्वच्छंद तेरे छंद कस्तूरी !
*
कहाँ तू स्वच्छंद ,तेरे छंद कस्तूरी ,
गंध योजन भर बिखेरे ,
दूर से ही जो दिपे रे ,
तंत्र में जब से बसी अभिशप्त कस्तूरी.
*
बन गया संदेश दुर्धर,
फूटता यह गंध निर्झर
नाभि-मंडल में समाये,
मर न पाये, जी न पाये
भटकती आकुल, किये मद-अंध कस्तूरी !
*
सूर्य कर से दमकता तन ,
दे रहा हो स्वर्ण का भ्रम
री मृगी ,वन-पर्वतों में,
खोजती फिरती तृणों में
प्रबल आकर्षण विकल, हर रंध्र कस्तूरी !
*
देह के अस्तित्व में धर ,
दिया कैसा गंध निर्झर !
किस तरह निज में समेटे
बोध अपने ही ठगे से,
स्वयं से अनभिज्ञ रची अनंग कस्तूरी!
*
प्राण तेरे खींचने को
बाण साधा व्याध ने जो
कर रहा संधान पीछे ,
एक भी अवसर न चूके.
व्याध से दूरी निभे किस ढंग कस्तूरी ,
*
और फिर देता निमंत्रण ,
साँस से महका समीरण
शत शरों के दंशवाली
चुभन भरती नोक ढाली ,
मार्ग क्षण-क्षण हो रहा दुर्लंघ्य कस्तूरी .
*
दहकते क्रीड़ा-वनों में
छिटकते जलते तृणों में
प्रज्ज्वलन हर ओर दारुण,
बने अग्नि-स्तंभ तरुगण
नाभि कुंडल रची वही अदम्य कस्तूरी !
*
रूप-गुण ने बैर साधा,
श्वास भी बन जाय बाधा
दौड़ अंधाधुंध तब तक,
रक्त आलक्तक रचें पग.
करुण मरण-मृदंग कर दे मौन कस्तूरी , !
*
मत्त बन, कर लिया धारण ,
किस तरह हो फिर निवारण,
शाप बन कर ग्रस रहा वर
टीसता अंतर विषम-शर.
एक दिन तुझको करे निस्पंद कस्तूरी ,
*
प्राण ले कर भागती डर,
काल से कैसे बचे पर,
वही कर्षण खींच लाता
दिशा देता पथ बताता.
इन्द्रियों के बोध भी अवसन्न कस्तूरी.
*
आ गई क्यों इस धरा पर ,
वेदना- संस्कार लेकर?
कुछ न पायेगी यहाँ तू
दुसह व्रत-आचार लेकर,
सिर्फ़ सहना ही, भटक निस्संग कस्तूरी !
*
अब कहाँ का शान्ति औ-सुख ,
कुछ नहीं री. मनोवांछित.,
भाग कर जाये कहाँ
हिरनी शरण पाये कहाँ ?
कुरंगिनि री, मरण का अनुबंध कस्तूरी !
तू कहाँ स्वच्छंद तेरे छंद कस्तूरी !
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