*
यह सर्वग्रासी राग !
संपूर्ण वृत्तियों को निज में समाहित कर ,
सारी बोधों आच्छादित कर,
वर्तमान से परे खींच ले जाता
अजाने काल-खंडों में . ,
धरी रह जाती है चाक-चौबन्द सजगता,
विदग्धता विवश ,अवधान भ्रमित ,
सारी सन्नद्धता हवा,
और दिशा-बोध खोई मैं !
*
अचानक रुकी रह जाती हूँ
जहाँ की तहाँ -
सब अनपहचाना ,
बेगाना ,निरर्थक .
लुप्त दिशा बोध .
वहीं के वहीं ,
कौन से आयामों में उतर कर
संपूर्ण चेतना अनायास ,
अस्तित्व विलीन !
*
निर्णय नहीं कर पाती -
कहाँ हूँ !
घेर लेता चतुर्दिक् जो सर्वग्रासी राग
जीने नहीं देता .
कैसी- तो अतीन्द्रियता
डुबा लेती अपने आप में .
जैसे मैं, मैं नहीं,
रह जाए अटकी-सी ,
हवाओं में भटकती,
कोई तन्मय तान !
*
यह सर्वग्रासी राग !
संपूर्ण वृत्तियों को निज में समाहित कर ,
सारी बोधों आच्छादित कर,
वर्तमान से परे खींच ले जाता
अजाने काल-खंडों में . ,
धरी रह जाती है चाक-चौबन्द सजगता,
विदग्धता विवश ,अवधान भ्रमित ,
सारी सन्नद्धता हवा,
और दिशा-बोध खोई मैं !
*
अचानक रुकी रह जाती हूँ
जहाँ की तहाँ -
सब अनपहचाना ,
बेगाना ,निरर्थक .
लुप्त दिशा बोध .
वहीं के वहीं ,
कौन से आयामों में उतर कर
संपूर्ण चेतना अनायास ,
अस्तित्व विलीन !
*
निर्णय नहीं कर पाती -
कहाँ हूँ !
घेर लेता चतुर्दिक् जो सर्वग्रासी राग
जीने नहीं देता .
कैसी- तो अतीन्द्रियता
डुबा लेती अपने आप में .
जैसे मैं, मैं नहीं,
रह जाए अटकी-सी ,
हवाओं में भटकती,
कोई तन्मय तान !
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