विसर्जन के फूल
*
फूल उतराते रहे दूर तक,
महासागर के अथाह जल में.
समा गये संचित अवशेष
कलश से बिखर हवाओं से टकराते,
सर्पिल जल-जाल में
विलीन हो गए .
*
अपार सिंधु की
उठती-गिरती लहरों में
ओर- छोरहीन,
अनर्गल पलों में परिणत,
बिंबित होते बरस- बरस,
जैसे अनायास पलटने लगें
एल्बम के पृष्ठ.
*
समर्पित फूल
जल के वर्तुलों में
चक्कर खाते, थरथराते, थमते
लौट आने के उपक्रम में
फिर-फिर पलटते
उमड़ती लहरों के साथ.
अनजान तट बह गए.
*
नाव की पहुँच ,
आगे बस पटाक्षेप.
अरूप-अनाम निष्क्रम
गहन प्रशान्त के अतल
अपरम्पार में,
शेष का विसर्जन .
अराल सिन्धु-छोर ,
आगे कुछ नहीं !
*
फूल उतराते रहे दूर तक,
महासागर के अथाह जल में.
समा गये संचित अवशेष
कलश से बिखर हवाओं से टकराते,
सर्पिल जल-जाल में
विलीन हो गए .
*
अपार सिंधु की
उठती-गिरती लहरों में
ओर- छोरहीन,
अनर्गल पलों में परिणत,
बिंबित होते बरस- बरस,
जैसे अनायास पलटने लगें
एल्बम के पृष्ठ.
*
समर्पित फूल
जल के वर्तुलों में
चक्कर खाते, थरथराते, थमते
लौट आने के उपक्रम में
फिर-फिर पलटते
उमड़ती लहरों के साथ.
अनजान तट बह गए.
*
नाव की पहुँच ,
आगे बस पटाक्षेप.
अरूप-अनाम निष्क्रम
गहन प्रशान्त के अतल
अपरम्पार में,
शेष का विसर्जन .
अराल सिन्धु-छोर ,
आगे कुछ नहीं !
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