.*
चल रे हर सिंगार तुझे मैं साथ ले चलूँ.
चंदन कुंकुंम धारे तरु डालों पर जगतीं दीप शिखाएँ ,
संध्या के रेशमी पटों में शीतल सुरभित श्वास समाये
इस जीवन से माँग-जाँच कर थोड़ा-सा मधुमास ले चलूँ
यह उल्लास भरा उत्सव-क्रम मधुवर्षी लघुतम जीवन का
किसी प्रहर को रँग से भऱ दे , उज्ज्वल ,निर्मल हास सुमन का
अपने सँग अपनी माटी का नेह भरा आभास ले चलूँ.
सौरभमय सुकुमार रँगों में संध्याओं से भोर काल तक
आंगन की श्री-शोभा संग रातों के झिलमिल-से उजास तक
थोड़ा़ यह आकाश ले चलूँ ,अति प्रिय यह वातास ले चलूँ .
चल रे हर सिंगार तुझे मैं साथ ले चलूँ.
चंदन कुंकुंम धारे तरु डालों पर जगतीं दीप शिखाएँ ,
संध्या के रेशमी पटों में शीतल सुरभित श्वास समाये
इस जीवन से माँग-जाँच कर थोड़ा-सा मधुमास ले चलूँ
यह उल्लास भरा उत्सव-क्रम मधुवर्षी लघुतम जीवन का
किसी प्रहर को रँग से भऱ दे , उज्ज्वल ,निर्मल हास सुमन का
अपने सँग अपनी माटी का नेह भरा आभास ले चलूँ.
सौरभमय सुकुमार रँगों में संध्याओं से भोर काल तक
आंगन की श्री-शोभा संग रातों के झिलमिल-से उजास तक
थोड़ा़ यह आकाश ले चलूँ ,अति प्रिय यह वातास ले चलूँ .
चल रे हर सिंगार ....
*