गुरुवार, 15 जनवरी 2015

मकर संक्रान्ति -एक चित्र.


*
बड़े दिनों बाद  पंथी आकाश का ,
उत्तर की  देहरी-घर  आ गया 
 रात लग गई  समेटने में सियाह पट
 दिनमान ठाठ से गगन-पट पे छा गया .
*
काँपती दिशाओं के हाथ-पाँव खुले और
कोहरे की चादर उतार मुख धो लिये,
बहुतै दिनन बाद फिर अइसा  लगा
जइस
 अड़ी हुई ठिठुरन ने दाँव सभी खो दिये!
*
 धुले-धुले आंगन चमक के गमक गये ,
सोंध सूँघ ,नये-नये चाउर की -सीझ से.
परसी हुई थाली में भाप भरी खीचरी ,
ऊपर जो
छोड़ दिया चमचा भर  नेह से-
*
 कन-कन पिघलता समाता-सुहाता रहा
गैया के दूध का सुनहरा रवेदार घी
लगे अइस अमरित के छींट बिखरा गया,
भरा चाव- तोष देख हो गया निहाल- जी .
*
कोरी हँडिया के दही में भीगते बरे,
हींग-ज़ीर-सोंठ  भरी  भावना  लुभा रही
छींट लाल-मिरच देख देख चटपटाय मन
खापें दुइ लाय धरीं आम  के अचार की ,
*
ताज़ी, खेत की सफ़ेद नरम पात मूलियाँ
 आँच- भुने प्लेट  धरे पापर  भी चुरमुरे 
जीभ  कुरकुराय भुरभुराय आस्वाद लेत 
धनिये की हरी-हरी चटनी और सेंत में!
*
लाय धरा तल अंगार, मंसने के हेत जल 

 देव अगनी को अरप देहु भोग अन्न का
साथ तिल-गुड़ का पाक भी प्रसन्न मन
परसाद बन जाय  पोसक  कुटुम्ब का
*
 सारे  हाथ-पाँव हाय,तिलकुट की चूर से
न्हाये-धोये बच्चों ने कइस चिपचिपा लिए
उधर अजिया ने उठा लड्डू-गुपाल भी
 देखो दही-खीचरी आरोगने बिठा लिए
 *

दौड़ो रे दौड़ो खिचड़िया सने हाथ से 
अरे गोलू ने मेरे गुपलू उठा लिये
ठैर बज्जुरी रे ठैर,महा-उत्पातिया
न्हाये-धोये  ठाकुर रे, तूने जुठा दिये .
*

 लड्डू-गुपाल चुपैचाप मुस्कराय रहे
खाय-खेल रहे छोट बच्चन के साथ ही
आज इस आँगन में सूरज उगा नया ,
हँसी-खिली धूप सी दिवार तक जा बिछी !
*

गुरुवार, 8 जनवरी 2015

कार्टूनिस्ट !

ओ कार्टूनिस्ट !
नमन करती हूँ तुम्हारी  दृष्टि को !
तुम्हारी दृष्टि-
बड़े गहरे पैठ ,खींच लाती है विसंगतियाँ .
सबको सिंगट्टा दिखाती चिढ़ाती ,
टेढ़े होंठों मुस्कराते  ,
भीतरी तहें तक उघाड़ जाती है
कटाक्षभरे व्यंग्य सी  तीखी और तुर्श!

दुनिया एक व्यंजना है तुम्हारे लिए  .
 जहाँ बेतुकापन छिपने के बजाय ,
 उभर आता है 
 कुछ श्वेत-श्याम अंकनों में .
 सच को उजागर करने की कला ,
और विचित्र रूपाकारों की मुखर भंगिमा 
 कोई  तुमसे  सीखे !
सचमुच -
सच  होता ही ऐसा है!

ऐसा ही अनोखा, अनभ्यस्त, अतर्क्य!
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शुक्रवार, 28 नवंबर 2014

गौरा का सुहाग.

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 गौरा बिदा हुई चललीं  , धूम भइ तिहुँ खण्डा ,
नैना भरे माई दिहिले, सुहाग भरि- भरि हंडा.
फैली खबर, सब हरषीं ,मेहरियाँ दौरि  परलीं,
गौरा के चरनन लगि-लगि ,सुहाग जाँचन$ लगलीं !
*
खेतन ते भागीं, पनघट से भगि आईं, घाटन से दौरी  धुबिनियाँ,
गोरस बहिल, ऐसी लुढ़की मटकिया तौ हूँ न रुकली बवरिया.
दौरी भड़भूँजी, मालिन, कुम्हारिन ,बढ़नी उछारि  कामवारी,
गौरा लुटाइन सुहाग दोउ हाथन, लूटैं जगत के नारी !
 *
 ऊँची अटारिन खबर भइली,   साज साजै लागीं घरनियाँ,
करिके सिंगार,घर-आँगन अगोरे तक,बचली फकत एक हँडिया.
चुटकी भरि गौरा उनहिन को दिहला, 'एतना रे भाग तुम्हारा,
दौरि-दौरि लूटि-लूटि लै गईं लुगइयाँ, जिनके सिंगार न पटारा !
*
' एही चुटकिया जनम भर सहेजो, मँहगा सुहाग का सिंदुरवा.
तन-मन में पूरो, अइसल सँवारो रंग जाये सारी उमरिया !'
गिनती की चुरियाँ,बिछिया,महावर,सिंदुरा,सहेजें कुलीना ,
गौरा की किरपा कमहारिन पे तिनको सुहाग नित नवीना!
*
भुरजी, कुम्हरिन ते माँगे #दुआरे जाइ , आँचल पसारि गुहरावें ,
मंगल बियाह-काज इन बिन न पुरवै, कन्या सुहाग-भाग पावे .
 गौरा का सेंदुर अजर-अमर भइला, उन जइस को बड़भागिन रे,
इनही से पाये सुहाग-सुख-दूध-पूत, तीनिउँ जगत की वासिन रे !
*
( $ जाँचन= याचना करना ,माँगना .
# यह  एक रिवाज़ है कि विवाह से पहले स्त्रियाँ सुहाग की याचना करने भड़भूँजिन , कुम्हरिन आदि के पास जाती हैं , वही कन्या को चढ़ाया जाता है .). 
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बुधवार, 12 नवंबर 2014

नचारी - गौरा की बिदाई .

*
तोरा दुलहा जगत से निराला उमा, मैना कहिलीं,
कुल ना कुटुम्व, मैया बाबा, हम अब लौं चुप रहिलीं !
कोहबर्# से निकसे न दुलहा ,बरस कुल बीत गइला !
सिगरी बरात टिक रहिली  बियाही जब से गौरा.
*
रीत व्योहार न जाने बसन तन ना पहिरे ,
अद्भुत उमा सारे लच्छन, तू कइस पतियानी रे !
भूत औ परेत बराती, सब हि का अचरज होइला,
भोजन पचास मन चाबैं तओ भूखेइ रहिला !

*
रीत गइला पूरा खजाना कहाँ से खरचें बहिना ,
दिन-गिन  बरस बितावा परिल कब लौं  सहना ?
पारवती सुनि सकुची, संभु से बोलिल बा -
 केतिक दिवस बीत गइले , बिदा ना करबाइल का ?

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सारी जमात टिक गइली, सरम कुछू लागत ना ,
 अद्भुत बरात रे जमाई, हँसत बहिनी,- जीजा !
हँसे संभु, चलु गौरा  बिदा लै आवहु ना ,
सिगरी बरात, भाँग, डमरू समेट अब, जाइत बा !

*
गौरा चली ससुरारै, माई ते लपिटानी रे
केले के पातन लपेटी बिदा कर दीनी रे !
फूल-पात ओढ़िल भवानी ,लपेटे शिव बाघंबर ,
अद्भुत - अनूपम जोड़ी, चढ़े चलि बसहा पर !
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(# कोहबर - नव-दंपति का क्रीड़ागृह )

सोमवार, 27 अक्टूबर 2014

सुरभि -चन्दना

 *
ओ, सुरभि -चन्दना,
उल्लास की लहर सी
आ गई तू !
*
 
मेरे मौन पड़े प्रहरों को मुखर करने ,
दूध के टूटे दाँतों के अंतराल से अनायास झरती
हँसी की उजास बिखेरती ,
सुरभि-चन्दना ,

                                                       
परी- सी , आ गई तू !
*
देख रही थी मैं खिड़की से बाहर -
तप्त ,रिक्त आकाश को ,
शीतल पुरवा के झोंके सी छा गई तू ,

सरस फुहार -सी झरने!
उत्सुक चितवन ले ,
आ गई तू !

*
 चुप पड़े कमरे बोल उठे ,
अँगड़ाई ले जाग उठे कोने ,
खिड़कियाँ कौतुक से विहँस उठीं ,
कौतूहल भरे दरवाज़े झाँकने लगे अन्दर की ओर ,
ताज़गी भरी साँसें डोल गईं सारे घर में .
आ गई तू !
*
 
सहज स्नेह का विश्वास ले ,
मुझे गौरवान्वित करने !
इस शान्त -प्रहर में ,
उज्ज्वल रेखाओं की राँगोली रचने ,
रीते आँगन में !
उत्सव की गंध समाये,
अपने आप चलकर ,
आ गई तू !
 

*
ओ सुरभि-चन्दना, परी सी 
आ गई तू !

(रिटायरमेंट के बाद लिखी गई थी)

सोमवार, 20 अक्टूबर 2014

धनवंतरि- वंदना एवं अभिनन्दन!


(धन-तेरस  के शुभ-दिवस हेतु  मेरी मित्र  'शार्दुला नोगजा ' ने यह सुन्दर 'धनवंतरि-वंदना ' प्रेषित की है ,ये कल्याणकारी भावनाएँ मेरे सभी मित्र एवं परिजन  आत्मस्थ कर सकें , इसलिए यहाँ  प्रस्तुत कर रही हूँ.
मैं आभारी हूँ  प्रिय शार्दुला की,   इन मंगलमय-वचनों  के लिए - )

*
धनवंतरि, वंदन अभिनन्दन
दैनन्दिन जीवन में नित हम 
पाएं आशातीत पराक्रम 
खिलती रहे हर्ष की बगिया 
मिलती रहे सफलता अनुपम 

चिंतन में सच्चिदानन्द का 
महक उठे चन्दन ही चन्दन 
धनवंतरि, वंदन अभिनन्दन!

हम निश्छल हों, रहें निरामय 
हमें बना दो निर्मल निर्भय 
न्याय नीति स्थापित कर जग में 
दूर करें जन-जन का संशय 

उपकारों का नेह बहा कर 
हरें दीन दुखियों का क्रंदन 
धनवंतरि, वंदन अभिनन्दन 

स्वस्थ रहे हम, करो अनुग्रह 
भार न बनने पाये दुर्वह 
रोम-रोम में रहे हमारे 
अंतहीन उर्जा का संग्रह 

हमें लक्ष्य के इस जय-पथ में 
दीर्घ आयु का दो अवलम्बन 
धनवंतरी वंदन अभिनन्दन!
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( बचपन में  किसी अखबार से उतारी थी ये प्रार्थना। लेखक का नाम नहीं उतारा था. हर साल आरती की तरह इसे ही गाते हैं! - शार्दुला नोगजा )
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श्री  धनवंतरि-वंदन के अनंतर
 आप सब को अर्पित हैं ज्योतिपर्व की मंगल-कामनाएँ -
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रोशनी के जाल यों बुने ,
किरन-तंतु कात कर  शिखा ,
ओढ़नी उजास की बने ,
श्याम-देहिनी महानिशा !
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वायु-जल सुस्निग्ध-स्वस्थ हों,
करे अष्ट-लक्ष्मि  अवतरण !
खील-सी बिखर चले हँसी ,
शुभ्र फेनि* सा हरेक मन !

(*बताशफेनी)
*
दीपावली का पर्व मंगलमय हो !
 - प्रतिभा सक्सेना
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 (चित्र - गूगल से साभार)




रविवार, 12 अक्टूबर 2014

पहला दीप -

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मेरे बच्चों, दीवाली का पहला दीप वहाँ धर आना...

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जिस घर से कोई निकला हो अपने सिर पर कफ़न बाँधकर ,
सुख-सुविधा, घर-द्वार छोड़ कर मातृभूमि के आवाहन पर .
बच्चों, उसके घर जा कर तुम उन सबकी भी सुध ले लेना
खील-बताशे लाने वाला कोई है क्या उनके भी घर.
अपने साथ उन्हें भी थोड़ी ,इस दिन तो खुशियाँ दे आना .
*
छाँह पिता की छिनी सिरों से जिनकी, सिर्फ़ हमारे कारण 
हम सब रहें सुरक्षित .जो बलिदान कर गए अपना जीवन
बूढ़े माता-पिता विवश से , आदर सहित चरण छू लेना,
अपने साथ हँसाना ,भर देना उनके मन का सूनापन ,
आदर-मान और अपनापन दे कर उनका आशिष पाना !
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दीवाली की धूम-धाम से अलग न वे रह जायँ अकेले ,
तुम सुख-शान्ति पा सको, इसीलिए तो उनने यह दुख झेले.
उन सबका जीवन खो बैठा धूम-धाम फुलझड़ी पटाखे ,
रह न जायँ वे अलग -थलग जब लगें पर्व-तिथियों के मेले.
उनकी जगह अगर तुम होते, यही सोच सद्भाव दिखाना .
 *
हम निचिंत हो पनप सके वे मातृभूमि की खाद बन  गये ,
रक्त-धार से सींची माटी  ,सीने पर ले घाव सो गए  .
वह उदास नारी, जिसके माथे का सूरज अस्त हो गया ,
तुम क्या दे पाओगे ,जिसके आगत सभी विहान  खो गए !
उसने तो दे दिया सभी कुछ, अब तुम उसकी आन निभाना.
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अपने जैसा ही समझो, उन का मुरझाया जो बेबस  मन ,
देखो ,बिना दुलार -प्यार के बीत न जाए कोई बचपन .
न्यायोचित व्यवहार यही है- उनका हिस्सा मिले उन्हें ही ,
वे जीवन्त प्रमाण रख गए, साधी कठिन काल की थ्योरम
अपनी ही सामर्थ्यों से, बच्चों तुम 'इतिसिद्धम्' लिख जाना !
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थ्योरम = Theorem.,प्रमेय .