मंगलवार, 6 अप्रैल 2010

कठपुतली

कठपुतली !
इंगित पर नाचती ,
डोरियों से बँधी
झूमती है मंच पर.
बाजीगर के इशारे -
खिंचती डोरियाँ
नाचती है ,
लोगों का मन बहलाने !
*
पुतली ? अलंकरणों से सजी
रिझायेगी जन-मन .
संवेदना तरल हृदय
बुद्धि की तेजस्विता ,
नारीत्व का प्रखर चेत
अपना सत्व,अपनी गरिमा
कहां से लाएगी कठपुतली ?
*
रीढ़ ही नहीं जब
कैसे थिर हो
कैसे जम कर खड़ी हो
बोध कैसे जागे अपना ,
अपने ही गर्भ-जन्मी पीढ़ियों का !
*
इस मंच का खेल खत्म होगा एक दिन ,
फीकी बेरंग , दाग़दार बनी,
फ़ालतू कबाड़ में
डाल दी जाएगी कठपुतली !
*

गुरुवार, 1 अप्रैल 2010

हिसा हिलाल !

हिसा हिलाल !
अभिनन्दन करती हूँ
मैं तुम्हारा !
तुमने सिद्ध कर दिया
कि अबला नहीं है एक अकेली नारी भी !
समर्थ है वह अकेली ही
उस समूची व्यवस्था को हिला देने में
जो अपने दानवी शिकंजों में
मानव-जीवन की सारी उपलब्धियाँ
नष्ट-भ्रष्ट करने पर उतारू है !
इन्सानियत को पैदा कर
ममता से पोषण देने वाली
मातृशक्ति को पैरों तले रौंद कर
वर्जनाओं में लपेट कर
बंद कर दिया सात तालों में ,
कि सारी मानवता को भेड़-बकरी बना कर
चरागाहों में बाँध दें !
कि इस धऱती के उज्ज्वल भविष्य को
अँधेरों में परिणत कर जकड़ दें
कि वे अपनी दानवी लीला का विस्तार कर सकें !
*
हिसा हिलाल ,
नमन करती हूँ -
तुममें निहित उस आदि शक्ति को,
जो पशुता के सामने सिर उठा कर डट गई है!
जो अतिचारी के अधीन कभी नहीं हुई ,
जो सदा शिवत्व हेतु तपी ,
और प्राप्त कर के रही !
जगत का नारीत्व संन्नद्ध हो रहा है
अपनी शक्तियाँ संयोजित कर ,
तुम्हारे साथ आने को !
*
स्वागत है तुम्हारा
उज्ज्वल भविष्य की वैतालिका,
सफलता तुम्हारा प्राप्य है !

शनिवार, 20 मार्च 2010

निवृत्ति

*
चाहती हूँ जिऊं जीवन के बचे दिन ,
यहाँ के कोलाहलों से दूर सुरसरि के किनारे !
*
देव-सा हिमगिरि जहां दर्शन दिखाए ,
प्रकाशित निर्मल रहें सारी दिशाएँ
मन यही करता यहाँ से दूर जिस थल
न हों जटिला बुद्धि के तर्किल सहारे !
*
द्वंद्व-रहित निचिन्त होकर जी सकूँ मैं ,
शान्ति को पंचामृतों सा पी सकूँ मैं ,
बँधी सारी डोरियों को खोल कर ,
उन्मुक्ति का संज्ञान अंतर में सँवारे
*
सभी आपाधापियाँ छूटें यहीं पर ,
तू न मैं, सारे अहं बीतें यहीं पर ,
एक हल्कापन सहज ही घेर ले
छाये चतुर्दिक जाल कर दे स्वच्छ सारे !
*
दर्शकों में जा मिलूँ कपड़े बदल कर ,
आज तक के सभी आरोपण निफल कर
नाट्य -रूपक जो निभाने में लगे थे ,
मंच छोड़ूँ , फेंक दूँ संवाद सारे !
*
मित्र यह तन की नहीं, मन की थकन है ,
तुम हँसो तो यह तुम्हारा ही वहम है ,
व्यर्थ मत संवेदना का बोझ देना
बेवजह कहना न कुछ बिन ही विचारे !
*
मिला मन ऐसा, कहीं लगता नहीं है ,
लोक का व्यवहार अब सधता नहीं है ,
खड़ी चकराई रहूँ बेमेल सी
इस अजनबीयत को कहां तक शीश धारे !
*

शुक्रवार, 12 मार्च 2010

धन्य हो उठें साँझ-सवेरे

धन्य हो उठें साँझ-सवेरे
*
तप-तप कर हो गई अपर्णा, जिसके हित नगराज कुमारी ,
कहाँ तुम्हारे पुण्य-चरण मैं कहाँ जनम की भटकी-हारी!
*
कहीं शान्त तरु की छाया में बैठे होगे आसन मारे,
मूँदे नयन शान्त औ'निश्छल , गरल कंठ शशि माथे धारे ,
और जटाओं से हर-हर कर झरती हो गंगा की धारा ,
मलय-पवन-कण इन्द्रधनुष बन करते हों अभिषेक तुम्हारा!
ऐसा रूप तुम्हारा पावन , ओ मेरे चिर अंतर्यामी
सार्थकता जीवन की पा लूं मिले अंततः छाँह तुम्हारी !
*
हिमगिरि के अभिषिक्त अरण्यों की हरीतिमा के उपभोगी,
हिमकन्या को वामअंग में धरे परम भोगी औ'योगी,
जीत मनोभव ,मनो-भावनाओं के आशुतोष तुम दाता,
परम-प्रिया दाक्षायनि के सुध -बुध खोये तुम प्रेम वियोगी !
तुम नटराज समाकर निज में अमिय-कोश भी, कालकूट भी
चरम ध्रुवों के धारक, परम निरामय, निस्पृह, निरहंकारी !
*
तापों में तप-तप कर कब से अंतर का आकुल स्वर टेरे
शीतल -शिखरों की छाया में धन्य हो उठें साँझ-सवेरे
रति-रोदन से विगलित पूर्णकाम करने की कथा पुरानी,
आशुतोष बन कितनों को वरदान दे चुके औघड़दानी,
सभी यहाँ का छोड़ यहीं पर आसक्तियाँ तुम्हें अर्पित कर
मुक्ति विभ्रमों से पा ले मति मेरी ऐहिकता की मारी
*
तपःपूत वनखंड कि जिस पर जगदंबा के सँग विचरे हो ,
गहन- नील नभ तले पावनी गंगा के आंचल लहरे हों ,
उन्हीं तटों पर कर दूँ अपना सारा आगत तुम्हें समर्पित ,
भूत भस्म हो , विद्यमान पर तव शुभ-ऐक्षण के पहरे हों,
अब मत वंचित करो प्रवाहित होने दो करुणा कल्याणी ,
अवश कामना मेरी पर ,पर अतुलित शुभकर सामर्थ्य तुम्हारी !
*

मंगलवार, 12 जनवरी 2010

तेरे नाम हो गई

तू जैसा का तैसा कान्हा राधा तो बदनाम हो गई.
*
मटकी सिर धर गाँव-गली में कान्हा-कान्हा टेरे ,
कोई गाहक कहाँ ?लगाले चाहे जित्ते फेरे ,
बड़े भोर की निकली घर से टेर-टेर कर शाम हो गई!
*
लाद मटकिया रही भटकती ,दर-दर घर-घर अटकी
द्वारे पहरेदार सभी के बात न बस कोई की
माथे नाम चढ़ाया तेरा ,पर ग्वालिन गुमनाम हो गई !
*
कोई पीर न जाने मनवा चुपके चुपके रोवे
साँझ कौन मुख ले घर जाये कहाँ चैन जो सोवे
किसका थामें हाथ निगोड़ी काया तेरे नाम हो गई .
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पहले किसे सँभाले मन को या कि सिरधरी मटकी ,
दोनों एक साथ ले ग्वालन फिरती भटकी भटकी ,
तेरा पता तो न पाया अपने से अनजान हो गई !
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पहले किसे सँभाले मन को या कि सिरधरी मटकी ,
दोनों एक साथ ले ग्वालन फिरती भटकी भटकी ,
तेरा पता तो न पाया अपने से अनजान हो गई !
*

सुमिरनी हो गई रे

तेरा रट-रट के नाम घनश्याम ,सुमिरनी हो गई रे !
जहाँ जाऊं न पाऊँ कोई आपुना ,
मोरे नयनो में तेरी ही थापना
कहीं पाऊँ न चैन ,जिया दुखे दिन-रैन
मन लेवे कहीं ना विसराम, सुमिरनी हो गई रे !
*
चिर दिन भटका किया जियरा ,
बस तुझे पहचाने मेरा हियरा
कोई नाता न माने ,कैसे किसे पहचाने
मेरा कोई न धाम कोई काम,सुमिरनी हो गई रे
*
अब इतनी तो तू कर सँवरिया ,
रह जाऊँ नहिं बीच डगरिया ,
होवे सीतल तपन मन होवे मगन
जा पहुँचूँ वृंदावन धाम, सुमिरनी हो गई रे !

बुधवार, 6 जनवरी 2010

बाकड़िया बड़

*
बाकड़िया बड़
यहाँ पर एक बरगद था पुरातन पूर्वजों जैसा
जटायें भूमि तक आतीं तना सुदृढ़ असीसों सा
*
मुझे तो दूर से पल्लव- हथेली हिल बुला लेतीं
ज़रा ले छाँह बाबा की थकन तो दूर कर लेतीं .
वही उज्जैन का वट-वृक्ष बाकड़िया जिये कहते
कि जिसका नाम लेकर लोग फिर अपना पता देते .
न भूलूँगी अरे ओ वट प्रियम् संवाद कुछ दिन का !
*
मुझे लगता कि यह छाया ,पिता की गोद जैसी है ,
थकन के बाद, थपकी से मिले आमोद जैसी है
पितर सम हर सुहागिन पूजती, आँचल पकड़ झुकती
लपेटे सूत के दे , व्रत अमावस का सफल करती
उसी की छाँह में भीगा हुआ विश्वास कुछ दिन का
*
कि जैसे दीर्घवय मुनि जटिल, अपने बाहु फैलाये
धरे आशीष की मुद्रा ,स्वस्ति औ' शान्ति से छाये
पखेरू कोटरों में बसा कर परिवार रहते थे
घने पत्ते दुपहरी में सुशीतल छाँह देते थे
बहुत कुछ जो घटा सदियों वही तो एक साक्षी था ,
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मुझे तो याद है बरगद तले अपना खड़ा होना ,,
नगर को छोड़ते पर उन असीसों से नहा लेना ,
उसे छूना, वहाँ की याद आँखों में समा लेना
बहुत-कुछ धर निगाहों में , विकल मन से बिदा लेना ।
वहीं के भवन ,वह अभ्यास औ आवास कुछ दिन का ,
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उसे क्यों काट फेंका यों किसी का क्या बिगाड़ा था ,
पुरानी उस धरोहर को ,सभी से प्यार गाढ़ा था ।
बताओ काटने वालों ,तुम्हारे हाथ थे कैसे !
कभी क्या महत् तरुवर फिर उगा लोगे उसी जैसे ?
यही लगता, कि अब चुक जायगा यह राग कुछ दिन का !
यहाँ पर ज़िन्दगी भी क्या, बड़ा खटराग कुछ दिन का!
*