मंगलवार, 27 अक्तूबर 2009

एक दिन पाँओं तले धरती न होगी

*
याद आती है मुझे तुमने रहा था ,
एक दिन पाँओं तले धरती न होगी !
जग कहेगा गीत ये जीवन भरे हैं ,
ज़िन्दगी इन स्वरों में बँधती न होगी !

आज पाँओं के तले धरती नहीं है ,
दूर हूँ मैं एक चिर-निर्वासिता-सी ,
काल के इस शून्य रेगिस्तान पथ पर ,
चल रही हूँ तरल मधु के कण लुटाती !
*
उन स्वरों के गीत जो सुख ने न गाये ,
स्वर्ग सपनों की नहीं जो गोद खेले ,
हलचलों से दूर अपने विजन पथ पर
छेड़ना मत विश्व ,गाने दो अकेले !
*
कहां इंसां को मिला है वह हृदय ,
जिसको कभी भी कामना छलती न होगी
याद फिर आई मुझे तुमने कहा था ,
एकदिन पाँओं तले धरती न होगी
*

12 टिप्‍पणियां:

  1. "कहाँ इंसान को मिला है वह हृदय
    जिसको कभी भी कामना छलती न होगी" बहुत खूब लिखा है |बधाई
    आशा

    उत्तर देंहटाएं
  2. कहां इंसां को मिला है वह हृदय ,
    जिसको कभी भी कामना छलती न होगी
    याद फिर आई मुझे तुमने कहा था ,

    बहुत सुंदर ह्रदय के उदगार ....!!

    उत्तर देंहटाएं
  3. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

    उत्तर देंहटाएं
  4. एकदिन पाँओं तले धरती न होगी

    Bahut sundar

    www.poeticprakash.com

    उत्तर देंहटाएं
  5. याद आती है मुझे तुमने रहा था ,
    एक दिन पाँओं तले धरती न होगी !

    वाह सुन्दर रचना...
    सादर बधाई

    उत्तर देंहटाएं
  6. सुन्दर बहुत सुंदर बेहतरीन। जीवन का गीत गाती रचना... बहुत खूब लिखा है

    उत्तर देंहटाएं
  7. कहां इंसां को मिला है वह हृदय ,
    जिसको कभी भी कामना छलती न होगी
    याद फिर आई मुझे तुमने कहा था ,
    एकदिन पाँओं तले धरती न होगी
    वाह ...बहुत ही अच्‍छा लिखा है आपने ।

    उत्तर देंहटाएं