मंगलवार, 27 अक्तूबर 2009

नियति

स्वयं ही के ताप में तपना सतत मेरी नियति है ,
नहीं संभव है रुकूं मेरी अप्रतिहत क्योंकि गति है
और दोनों छोर जलती वर्तिका ज्यों दीप्त रह कर
अचानक चुक जाय चाहे एक क्षण भर ही भभक कर

क्योंकि दो दो स्तरों पर साथ ही जीना कठिन है,
आत्मवञ्चन किन्तु उससे भी कहीं बढ़कर विषम है !
किन्तु मन का सत्य मेरे साथ है द्विविधा रहित हूँ
बदलते मौसम सरीखी पलट जाऊँ वह नहीं हूँ

सभी कुछ मिश्रित ,हँसी-आँसू,बुरा-अच्छा सभी कुछ ,
रिक्त गागर में भरूं मैं क्या यही अतिरिक्त अनुभव
समझ में आता न मुझको मैं सुखी हूँ या दुखी हूँ ,
सोचती हूँ मैं कि मैं संबद्ध भी हूँ या नहीं हूँ

जो अकेला भटकता अभिशप्त सा घर्षण समेटे
शून्य की गहराइयों में दग्ध उल्का पिण्ड जैसे
एक पग टिकता ,अचानक दूसरा उठता उसी पल ,
पाँव धरने के लिये मैं खोजती हर ओर क्षिति-तल !

कभी लगता पांव के नीचे कहीं धरती नहीं है !
यह नियति हर बार ही हर यत्न को छलती रही है !
और पथ चलना निरंतर इन पगों की एक गति है ,
वश न हो जिस पर,बदलना हो न संभव, वह नियति है !

1 टिप्पणी:

  1. 'रिक्त गागर में भरूं मैं क्या यही अतिरिक्त अनुभव?'
    कम से कम आपने संतुलित तो किया अनुभवों को.....कुछ लोग तो इतना ज़ाहिर करते हैं कि अहि एकमात्र दुखियारे हैं...:/

    'अभिशप्त सा घर्षण समेटे'
    wowwwww ....अदभुत...:D...मुझे बहुत बहुत सुंदर लगी ये वाली बात.....मैं तो कभी सपने में भी ये नहीं सोच पाती....:o:o !!

    'यह नियति हर बार ही हर यत्न को छलती रही है !'
    हम्म...सोलह आने सच है.....इस चीज़ को मैंने अपने पर भुगता है एक दफ़े...अन्यथा जीवन से जो चाहा वो मिला है मुझे...मगर एक बार नियति ने चाल चली और मेरा जीवन पथ ही बदल गया......:)

    'और पथ चलना निरंतर इन पगों की एक गति है ,'

    ये भी लाख रूपए की बात...:)...मैं भी बदले मार्ग पर बढ़ रही हूँ...बढती रहूंगी....मगर पलट कर देखती हूँ कभी कभी तो ज़रूर टीस सी होती है थोड़ी....:)
    खैर..
    'वश न हो जिस पर,बदलना हो न संभव, वह नियति है !'

    वाह!सही है एकदम.........:)यहाँ आपकी एक कविता और याद आई..आज ही पढ़ी थी....अन्तर्यामी वाली शायद..जिसमे कविता के अंत में आपने अपने आप को भगवानजी को ही सौंप दिया है.....कि जैसे चाहे अब आप ही जीवन की डोर संभालिये...:):)

    हम्म..अप्रतिहत यानि निरंतर...लगातार...है न प्रतिभा जी..??? :( गूगल से देखा...मगर उस पर बहुत भरोसा नहीं..चलिए खैर. मैं पक्का कर लूंगी...:)

    कविता बहुत अच्छी लगी..खासकर अंतिम वाला पद तो ह्रदय तक हो आया.....:)

    आभार इस 'नियति' के लिए !

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