शुक्रवार, 28 फ़रवरी 2014

एक नचारी -

*
अब मैं ना पीसौंगी भाँग ,
   बहाये दिहौं सिल-बट्टा.
ऊँचे पहारन से फेंको सिलौटी ,
बट्टा, धरि दैहौं दुकाय.
*
काहे को बोई .काहे को सींची ,
रगड़त मोरी उमरिया बीती ,
अब तो सुनौंगी कछु नाय .
बहाये दिहौं सिल-बट्टा.
*
काहे  बैरिनिया ,सिव मन भाई ,
भाँग पिसत मोरी दुखत कलाई, 
उझकत करिहाँ पिराय .
बहाये दिहौं सिल-बट्टा.
*
भँगिया के लोटा में भरि हौं भभूती,
झोरी में लरिकन केर लँगोटी,
मोको ई ढंग ना भाय .
बहाये दिहौं सिल-बट्टा.

छुट्टे-छड़े, तनि देखो तो लच्छन ,
चिन्ता न कोऊ कहा कहि हैं जन 
काहे  कियो रे बियाह .
बहाये दिहौं सिल-बट्टा.
*

14 टिप्‍पणियां:

  1. तो अब गोरा पार्वती भी.......अबकी शिवशम्भू ज़रूर फ़ूड-प्रो खरीद
    लायेंगे ....बहुत सुंदर....!!!!!

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  2. ढोलक की थाप पर इस गीत की धुन गूँजने लगी मन में!!

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  3. यह उलाहना तो बनती है, कोई कितना करे भला?

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  4. इस सुन्दर लोकगीत का जब शहरीकरण होता है तब पैरोडी के रूप में कुछ इस तरह होता है----"तुम भंगिया जो घुटवाओगे गणपति के पप्पा ,कमण्डल तोड दूँगी ..।"

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  5. ये उलहान .. ये गीत .. जैसे कोई ठुमरी सी चल रही हो कहीं ...
    दिल को छूते हुए शब्द ...

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  6. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन ब्लॉग-बुलेटिन - आधा फागुन आधा मार्च मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  7. यथार्थ से परिचय कराता आपका यह आलेख बहुत ही अच्छा लगा।बहुत ही सुदर अभिव्यक्ति। मेरे नए पोस्ट Dreams also have life पर आपका इंतजार रहेगा। धन्यवाद।

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  8. भाषा का लोक सौंदर्य देखते ही बनता है सुन्दर पोस्ट

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  9. मन नाचने और गाने लगा इस सुन्दर नचारी पर .

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