बुधवार, 5 फ़रवरी 2014

ठिठका खड़ा वसंत ..

 ठिठका खड़ा है वसंत कहीं रास्ते में,
झिझक भरा मन में विचारता -
रूखों में रस संचार नहीं ,
कहीं  गुँजार नहीं .
स्वर पड़े मौन,  कौन तान भरे ,
दिशाएँ सोई -सी ,
ले रहीं उबासी .

 ठिठुराया पवन शुष्क ,
गंध के झरने रुद्ध , 
गगन धुँधलाया,
हर प्रवाह में उदासी.
भावों में जागा नहीं  नेह अभी,
मधु और माधव का आगमन 
सँदेश लिए 
उतरी नहीं किरणें सुनहरी .
पाँवड़े बिछाए कहाँ स्वागत को,
कैसे पग धरें माँ भारती !

14 टिप्‍पणियां:

  1. देखिये क्या हाल
    हो गया है
    बसंत को भी कोई
    रोक ले रहा है
    आदमी भी अब
    नहीं ठिठकता कहीं
    इस बसंत को
    ना जाने क्या
    हो गया है :)

    वाह बहुत सुंदर !

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  2. अंतस उतर गई ...मर्मस्पर्शी रचना ....!!

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  3. बिडम्बना है... .
    गहरे उतर जाती है आपकी हर रचना.

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  4. बहुत ही गहरे और सुन्दर भावो को रचना में सजाया है आपने.....

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  5. बेचारा बसंत.. बेचारी माँ भारती!! हम बेचैन रहते हैं स्वागत को, लेकिन स्वागत की तैयारी सिर्फ ऊपरी आडम्बर!! बहुत गहरे जाकर यह कविता ख़ुद से एक सवाल पूछने को कहती है!! बहुत सुन्दर!

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  6. शीत लहरियाँ जाते जाते,
    ले आती मधुमय वसंत

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  7. सचमुच वसंत उदास है.. कोई नहीं तकता आम्र मंजरियों को आज के इस मशीनी युग में..

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  8. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल शनिवार (08-02-2014) को "विध्वंसों के बाद नया निर्माण सामने आता" (चर्चा मंच-1517) पर भी होगी!
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  9. बहुत सुन्दर .. वसंत में पतझड़ सी अनुभूति कराता हुआ ..

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  10. अंतस को छूती बहुत प्रभावी अभिव्यक्ति...

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  11. मर्म्स्पर्शीय ... पता नहीं क्यों हो गया है सपूतों को ... बसंत का स्वागत भी अब नहीं हो पाता ...

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  12. आज कल नहीं आता बसंत बस कैलेण्डर से अनुमान लगता है कि ऋतु बदल रही है ।

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