गुरुवार, 22 अगस्त 2013

लड़की .

*
आती है एक लड़की ,
मगन -मुस्कराती ,
खिलखिलाकर हँसती है ,
सब चौंक उठते  -
क्यों हँसी लड़की ?
*
उसे क्या पता आगे का हाल ,
प्रसन्न भावनाओं में डूबी ,
कितनी जल्दी बड़ी हो जाती है ,
सारे संबंध मन से निभाती  !
कोई नहीं जानता ,
जानना चाहता भी नहीं 
क्या चाहती है लड़की .
मन की बात बोल दे 
तो बदनाम हो जाती है लड़की .
*
और एक दिन 
एक घर से दूसरे घर ,
अनजान लोगों में
चुपचाप चली जाती है .
नाम-धाम ,पहचान सब यहीं छोड़,
एकदम गुमनाम हो  जाती है लड़की.
निभाती है जीवन भर 
कभी इस घर, कभी उस घर .
देह में नई देह रचती 
विदेह होती लड़की.  
*
सब-कुछ सौंप सबको 
नये रूप, नये नाम  सिरज,
अरूप अनाम हो ,
झुर्रियोंदार काया ओढ़ 
 हवाओं में विलीन हो जाती.
कोई नही जानता ,  
यही थी 
वह हँसती-खिलखिलाती, 
नादान सी लड़की ! 
*

18 टिप्‍पणियां:

  1. यही हकीकत है, बहुत सी सटीक और मार्मिक रचना.

    रामराम.

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  2. एक लड़की की जिन्दगी कितने आयामों से बनी है
    लेकिन हर आयाम में मिलता है एक चीज 'त्याग'

    बहुत सुन्दर
    सादर!

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  3. सुंदर रचना...
    आप की ये रचना शनीवार यानी 24/08/2013 के ब्लौग प्रसारण में मेरा पहला प्रसारण पर लिंक की गयी है...
    इस संदर्व में आप के सुझावों का स्वागत है।

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  4. बहुत सुन्दर.....
    एक सच!!!
    दिल को छू गयी रचना...

    सादर
    अनु

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  5. प्रतिभा जी, आपकी कविता एक पूरे जीवन की कहानी कह गयी कितनी सरलता से.. लड़की की हँसी जैसे यह सब कुछ समेटे थी अपने भीतर !

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  6. बहुत सुन्दर प्रस्तुति.. हिंदी ब्लॉगर्स चौपाल {चर्चामंच} के शुभारंभ पर आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी पोस्ट को हिंदी ब्लॉगर्स चौपाल में शामिल किया गया है और आप की इस प्रविष्टि की चर्चा {रविवार} (25-08-2013) को हिंदी ब्लॉगर्स चौपाल {चर्चामंच} पर की जाएगी, ताकि अधिक से अधिक लोग आपकी रचना पढ़ सकें। कृपया पधारें, आपके विचार मेरे लिए "अमोल" होंगें | आपके नकारत्मक व सकारत्मक विचारों का स्वागत किया जायेगा | सादर .... Lalit Chahar

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  7. पता नहीं कितने रंगों में रंगना है,
    पता नहीं, वह रंग मिले, जो अपना है।

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  8. शकुन्तला बहादुर23 अगस्त 2013 को 6:11 pm

    नारीजीवन की करुणकथा का अत्यन्त मार्मिक चित्र है ये कविता।
    "सुना था कि दुनिया बड़ी ही सदय है,
    मग़र ये किसी ने न सोचा, न समझा,
    कि कोमल कली के सुकोमल हृदय है,
    कहाँ की कली है, कहाँ पर खिली है,
    कहाँ जा रही है, किसे अब मिली है?
    कि नैया किसी सी किसी के सहारे,
    किसी दूसरे ही किनारे लगी है,
    विदा की घड़ीहै, विदा की घड़ी है।।"

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  9. लड़की ! हाय तेरी यही कहानी या जानी-बुझी हुई नादानी ?

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  10. पूरा जीवन ही मानो एक जद्दोज़हद है ,....

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  11. प्रतिभा जी
    नमन
    सारगर्भित रचना, पठनीय ही नहीं माननीय भी है.
    Sanjiv verma 'Salil'
    salil.sanjiv@gmail.com
    http://divyanarmada.blogspot.in

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  12. हां बताइए..ये भी कोई बात हुी कि बेबात हंसने लगी है मूर्ख लड़की...क्या इसे पता नहीं कि अभी कई मिलों के एकांत बियाबन हैं...देर शाम सड़कों पर दौड़ती बसें हैं...जहां इनके होश ठिकाने लगाने के लिए हैवानों की टौली हरदम मौजूद रहती है...बताइए तो...हंसने की जरुर्त कैसे कर सकती है ...

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    1. हाँ रोहिताश जी,बड़ी देर में समझ पाती है बेवकूफ़ लड़की! बाप भाई जैसा निरापद समझ लेती है लोगों को,उनमें छिपा जानवर देर में सामने आता है .

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  13. उफ़! रुला देने वाला!
    आप जब भी इस विषय पे लिखती हैं, कमाल लिखतीं हैं! हृदयतल से जो निकलती है बात! अद्भुत कविता!
    सादर शार

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  14. vidambna aisi bhi hai ki kai saari ladkiyaan swayam ki ahamiyat jaanti hi nai..:( aur bahut saari aisin hain jo bahut adhik hi jaantin hain.....naari ho ya nar...gaurav donon ka tab tak hi hai...jab tak ki unka aatmsammaan santulit raha aaye.apne sangharshon ke liye swayam ko hi aage aana chahiye na bhale hi saari duniya ek taraf ho..magar himmat hausla dene ke baawjood kai saari ladkiyaan aage nai badhtin :-|
    bahut aitraaj hai mujhe jab sahi sahi baaton par bhi sanskaaron ka bojh uthaaye ek ladki chup reh jaati hai..kabhi maa bankar..kabhi beti..kabhi behan bahu ya patni bankar..:-|
    kaash kavita ko goli dawayi jaise khila sakte aur wo lahoo me ghul sakti to kitta achha rehta...aapki is kavita ka shaktishali prabhaav beemaar mastishkon par adhik samay tak reh paata.
    bahut hi sashakt kavita pratibha jee...mera khoon khaula diya thodu sa kavita ne :( ...to thode chheente comment pe bhi pad gaye..:( kshama kijiyega !

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