रविवार, 25 अगस्त 2013

साक्षी हो तुम !

*
 मैं तुम पर विश्वास नहीं करती !
भीड़  के साथ,
 तमाशबीन बने ,
देखा है मैंने तुम्हें .
*
कभी गलियों में,
कभी गालियों में
औरत हमेशा घसीटी जाती है .
किसी की बेटी ,बहन ,माँ  नहीं
एक मादा भर  होती है जहाँ .
बिलकुल अकेली !
*
धरती-आकाश के बीच निराधार.
दृष्टियों के असह्य आघात,
कथरी के तार खींच-खींच,
सारी सिलाई उधेड़ने को उतारू.
कहीं कोई नहीं,
टेर ले जिसे ,
सारी भीड़ एक.
*
बिना चेहरे के लोग
खतरों से बचते.
सुरक्षा खोल में दुबके .
पौरुष का विकृत और विद्रूप,
ओह, कैसा अनुभव !
*
मैंने देखा है तुम्हें ,
उसी भीड़ में.
साक्षी हो तुम !
मैं तुम्हारा विश्वास नहीं करती .
मैं किसी का विश्वास नहीं करती !
*

23 टिप्‍पणियां:

  1. हालात यही हो गये हैं, बहुत ही सटीक चित्रण किया है आपने, शुभकामनाएं.

    रामराम.

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  2. जब विश्वास क्षीण होता है, यही उद्गार निकलते हैं।

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  3. भला कैसे हो विश्वास ....जब हर चेहरे के पीछे विद्रूपता ही नज़र आए ... भीड़ का तो कोई चेहरा भी नहीं होता ... सार्थक रचना ।

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  4. आपकी इस उत्कृष्ट रचना की चर्चा कल मंगलवार २७ /८ /१३ को चर्चा मंच पर राजेश कुमारी द्वारा की जायेगी आपका हार्दिक स्वागत है।

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  5. जब नारी का विश्वास टूटता है तो तो इसका प्रभाव कहाँ तक जाएगा ये अंदाज़ा समाज लगा नहीं पाता!
    सतील चित्रण आहात मन: स्थिति का.
    सादर शार

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  6. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  7. विश्वास करे भी कोई तो कैसे करे ?

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  8. जब रूह ही दगाबाजी पर उतर आये तो किस पर ऐतबार ? बस आह...

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  9. बहुत सुन्दर प्रस्तुति। ।

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  10. उफ़ ! यह अविश्वास कहाँ ले जायेगा..

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  11. बहुत उम्दा,सुन्दर व् सार्थक प्रस्तुति

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  12. स्वीकार्य हैं सब श्राप, उचित भी हैं।
    कैसा पौरुष, कौन बल?

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  13. गहरा क्षोभ ... आक्रोश का भाव लिए ...
    स्वयं ही उठना होगा ... भीड़ मोएँ तो सभी मिलेंगे ... अपने पन का दावा करने वाले भी ...

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  14. शकुन्तला बहादुर31 अगस्त 2013 को 12:08 am

    विक्षुब्ध और आहत मन के आक्रोश का सार्थक,सटीक और सशक्त चित्रण है।

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  15. :( apradhbodh se mann bhar gaya bahut sa..yahan likh bhi nai sakti :(.
    ek baat jaanti hoon..aur aapki is rachna ne shiddat se mujhe uska ehsaas kara diya...''bheed hum se hi banti hai...jaane anjaane,door ho ya paas,apna desh ho ya doosra..hum bhi utne hi bade apradhi hain..main bhi hoon :( '' hmm..aur dridh bhi hua mera hausla..ki jeevan me kabhi bhi kewal saakshi na banke rahun...tab bhi virodh karun anyaay ke viruddh jab 0% bhi sahyog na mile kisi ka.

    aur kya kahoon..?
    choonki ye maanti hoon ki ek vyakti me paurush aur naareetv donon hote hain....so avinash kee tarah maine apne paurush par bhi saare shraap sweekaar kiye :(
    naman aapki lekhni ko pratibha ji....kitte anubhav rang bhavnayein samete hai apne aap me ye!! aatma ko jaga detin hain aapki rachnayein..aabhaar inke liye :')

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