ये सब तो मात्र मोहरे थे
यहाँ की चालों के .
इस महासमर की भूमिका
बहुत पहले से लिखी जाने लगी थी.
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जब बुढ़ापे की सर्वनाशी वासना ,
यौवन का उजला भविष्य निगल गई.
स्वयंवरा कन्या को लूट का माल बना
निःसत्व रोगियों के हवाले कर दिया गया.
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वंश न पांडु का, न कुरु का.
बीज बो गया धीवर-कन्या का पुत्र
भयभीत और वितृष्णामय परिवेश में ,
उन विकृत संतानो का इतिहास कितना चलता ?
जहाँ विवश नारी ,
पति का मुख देखे बिना
आँखों पर पट्टी बाँध
यंत्रवत् पैदा कर दे सौ पुत्र
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धर्म और नीति की ओट ले
जो चालें चली गईं -
एक द्रौपदी ही नहीं ,
क्या-क्या दांव लगाते गए वे लोग ,
होना ही था महासमर !
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रामायण और महाभारत !
एक व्याध का तीर
कर गया
एक युग-कथा का प्रारंभ ,
और दूसरी का समापन .
*बीत गए दोनों ,
पर बीत कर भी
कहीँ अटका ही रह गया है .
बहुत कुछ .
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