शनिवार, 7 अगस्त 2010

भूख -

*
बहुत भूख भरी है दुनियाँ में!
तरह-तरह की भूख -
भटका रही है , मृगतृष्णाओं में !
मन की भूख --
भोग की , धन की ,यश की , बल की ,
और भी अनेकानेक रूप धर
विकृत कर जाती है
कि पीछे भागता है आदमी
भूत की तरह !
*
पर बहुत दारुण है पेट की भूख !
जब आक्रमण करती है, ,
रक्त पीती ,चमड़ी सुखाती ,
आँतें मरोड़ आग सी लपलपाती
यह सर्वभक्षी सर्वव्यापी भूख
जब कुछ नहीं पाती तो अपने पात्र को ही चाटती है ,
अपनी तीक्ष्ण जिह्वा से
तिल-तिल कर सुखाती है ,
सोख लेती है एक-एक रोम उसके शरीर का !
*
जिसने सही है यह दारुण यंत्रणा,
किसी की भूख नहीं देख सकता !
क्योंकि, दसरे को देख
वह अपनी ही यंत्रणा को बार-बार जीता है १
अपने अन्न का अंतिम कण तक देकर
वह छुटकारा पाना चाहता है उस दुख से !
नहीं सह पाता वह किसी के पेट की भूख ,
नहीं सह पाता !
*

2 टिप्‍पणियां:

  1. पेट की भूख क्या क्या नहीं कराती है।

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  2. यह सर्वभक्षी सर्वव्यापी भूख
    जब कुछ नहीं पाती तो अपने पात्र को ही चाटती है ,
    अपनी तीक्ष्ण जिह्वा से
    तिल-तिल कर सुखाती है ,
    सोख लेती है एक-एक रोम उसके शरीर का !

    बहुत ही मजबूत और सार्थक पंक्तियाँ....पराकाष्ठा है भूख की....पहली बार इतने सशक्त लहज़े में पढ़ने को मिली......शायद अपनेपन को पाने की भूख और तलब भी ऐसी ही होती होगी....कोई अपना कहने वाला नहीं मिलता होगा तो एकाकी पाकर मन को ही खा खा के खोखला कर देती है...:(

    क्योंकि, दसरे को देख
    वह अपनी ही यंत्रणा को बार-बार जीता है

    ..हम्म...ये बात तो हर तरह के दुःख के लिए सही ही कही है आपने....जहाँ दुःख एक हो जाते हों दो लोगों के...तो परस्पर परिचय की उतनी आवश्यकता नहीं रह जाती....पीड़ा के बंधन मन को स्वयं जोड़ देते हैं.......ऐसा कई दफे मैंने खुद महसूस किया है...:)

    बधाई रचना के लिए !

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