सोमवार, 14 जून 2010

मछरिया बता ,

भाग 1.
कितनी गहरी है नदिया मछरिया बता ,
*
पानी कितना है होगा तुझी को पता !
और क्या-क्या लिखे जा रही ये लहर
साक्षी तू निरंतर , मुझे भी बता,
अक्षरों से बना औ' मिटा नीर पर
*
और बढ कर कहाँ से कहाँ जायगी
तू शुरू से बता ये पुरानी कथा ,
बुदबुदा कर हवा ने यहाँ जो कहा ,
और लहरों ने पानी में क्या क्या रचा
*
डूब कितनी लहर की मुझे तू बता !
बाँह फैला उमड़ती हुई बढ़ रही,
रूप औ रंग रच-रच सँवारे गये ,
फिर सभी कुछ समेटे लिये फिर गईं !
*
री बता तू कहाँ से चला सिलसिला
किस तरह काल ने लीं यहाँ करवटें !
गुज़रीं सदियाँ यहाँ काफिलों की तरह,
तल में शायद पड़ी हों कहीं सलवटें !
*
ओ री मछली, तुझे तो सभी है पता ,
कितनी गहरी है नदिया मछरिया बता !
*
भाग 2.
इस जल में भँवर जाल फैले हुए
मैं न जानू ये धारा कहाँ से चली ,
ये हैं सारी ही बाहर की परछाइयाँ!
और कोरी पड़ी भीतरी है तली !
**
नीर टिकता नहीं इस नदी में कहीं
चला आता है जाता है बहता चला ,
एक भी बूँद थिर रह न पाती कहीं
और रहता है उतना का उतना बना !

मैं न जानूँ कि कितना यहाँ नीर है,
ऊपरी तह सजाये है सब हलचलें ।
कैसी सीपें हैं कैसे हैं मोती यहाँ
कौन आये यहाँ डूब कर थाहने !
*
इसमें बहने से कोई नहीं बच सका ,
हाँ यहीं से चली है कथा काल की !
बस दिखाती हैं बाहर के रँग रूप को,
जो समाया कभी भी बताती नहीं!
*
और हर पल बिछलते लहर जाल में
डोलती झूलती सिर्फ़ परछाइयाँ ,
ये तो आता है जाता है बहता चला ,
रूप रंगों रचा, धूप- छाहों भरा !
*
रोशनी जो दिखाती अनूठा जगत ,
रूप के बिंब हैं बाहरी वे सभी !
ओ रे पागल ,जहाँ रम रहा आज तू
जाने कितने वहाँ बस चुके हैं कभी !

1 टिप्पणी:

  1. ओ रे पागल ,जहाँ रम रहा आज तू
    जाने कितने वहाँ बस चुके हैं कभी !..

    bahut meaningful lagin ye lines..bahut zyada meaningful.........


    मछली का उत्तर मुझे बड़ा पसंद आया..खासकर वही आखिरी पंक्तियाँ.....
    मछली के रूप में स्वयं मनुष्य को ही पाया....भवसागर में दीन मीन के जैसा मनुष्य भी तो यही सब अनुभव करता है.......और अंत में वही ant....

    'ओ रे पागल ,जहाँ रम रहा आज तू
    जाने कितने वहाँ बस चुके हैं कभी !'

    बहुत अच्छे भाव हैं...andaaz-a-bayaan भी badhiyaan है pratibha ji........badhaayi...!!

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