बुधवार, 8 मार्च 2017

नारी


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मरणमय देह लेकर मैं तुम्हारी अंशिका हूँ, माँ 
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अनेकों  नाम  अनगिन रूप धर  मैं ही प्रवर्धित हूँ 
जहाँ तक क्रमित संततियाँ वहाँ तक मैं प्रवर्तित हूँ .
अनेकों पात्र रच-रच मैं जगत के मंच पर धरती ,
हुई अनुस्यूत सब में ही पृथक् अस्तित्व धर कर भी,
तुम्हारी लोल लीला की अनुकृत मंचिका हूँ, माँ !  
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बना नारीत्व को गरुआ ,अधिक गुण-सूत्र दे तुमने ,
तुम्हारे भाव हैं सारे जगत के नाट्य प्रकरण में .
तुम्हारी दिव्यता के निदर्शन की भूमिका पा कर ,
तुम्हारी छाँह धरती पर पड़ी जिस रूप में आकर
उसी चिद्रूप की मैं मृण्मयी अनुरंजिका हूँ, माँ !
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सृजन का भार दे तुमने हृदय में मोह ममता भर ,
लचक भर झूम कर झुकना सिखाया है फलित हो कर.
विसर्जित हो रही हर बार सर्जन के विहित क्रम में,
अधिक विस्तार पाने को स्वयं का अतिक्रमण करने,.
तुम्हारी सृष्टि-वीणा की लघुत्तम तंत्रिका हूँ,माँ ! 
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4 टिप्‍पणियां:

  1. वाह बहुत सुन्दर। महिला दिवस की शुभकामनाएं।

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  2. नारी जीवन की गुरुता और वात्सल्यमयी ममता का दिग्दर्शन कराती सुंदर भावपूर्ण रचना..महिला दिवस पर आपको हार्दिक शुभकामनायें !

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  3. नारी के ममतामयी रूप का जो आपने चित्रण किया है, वो अद्भुत है. अनंत है....

    बेहद ही खूबसूरत पोस्ट.

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  4. नारी मन के भाव और माँ के प्रति लिखे शब्द अध्बुध हैं ... सीधे दिल को छूते हैं .... वात्सल्य के भावों को बाखूबी लिखा है आपने ... नमन आपकी लेखनी को ...

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