शुक्रवार, 17 फ़रवरी 2017

मौसम की वर्दी

*

तुम बार-बार क्यों लौट  रही हो सर्दी ,
कोहरा तो भाग गया , दे अपनी अर्जी.
*
गद्दे रजाइयाँ सभी खा चुके धूपें ,
बक्से में जाने से बस थोड़ा चूके
हमने भी अपनी जाकेट धो कर धर दी,
तुमने यों आकर कैसी मुश्किल कर दी.
*
ये तीन महीने बीते सी-सी करते,
अब जाकर तन के बोझ हुए थे हलके,
सुबहों  में जल्दी लगा जागने सूरज,
नदियाँ प्रसन्न हो गईं हटा कर चादर.    
फैलाओ अब मत  अपनी दहशतगर्दी.
*
शिवरात्रि आ रही पीने दो ठंडाई, 
घोटेंगे भाँग सिलों पर लोग-लुगाई .
तुम नाक बहाती, खाँसी-खुर्रा लेकर ,
क्यों घूम रही हो यहाँ लगाती चक्कर,
आराम करो, मत लादो अपनी मर्ज़ी. 
*
दिन बड़ा हो गया आने को है होली ,
मौसम में जैसे घुली भाँग की गोली.
त्योहारों को ऐसे मत धता बताओ, 
बुढ़िया माई,कंबल  ओढ़ो सो जाओ,

मौसम भी बदल चुका है अपनी वर्दी!
*


12 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी रचना बहुत सुन्दर है। हम चाहते हैं की आपकी इस पोस्ट को ओर भी लोग पढे । इसलिए आपकी पोस्ट को "पाँच लिंको का आनंद पर लिंक कर रहे है आप भी कल रविवार 19 फरवरी 2017 को ब्लाग पर जरूर पधारे ।
    चर्चाकार
    "ज्ञान द्रष्टा - Best Hindi Motivational Blog

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  2. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, "एयरमेल हुआ १०६ साल का “ , मे आप की पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  3. सुन्दर शब्द रचना
    http://savanxxx.blogspot.in

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  4. शानदार पोस्ट ... बहुत ही बढ़िया लगा पढ़कर .... Thanks for sharing such a nice article!! :) :)

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  5. मैं तो इस पलटवार से अभी तक जूझ रहा हूँ, मम्मी! खाँसी और सर्दी ने बेहाल कर रखा है (जबकि आपने इसका कोई ज़िक्र नहीं किया). हफ्ते भर की दवा के बाद, खाँसी कम हुई, पर नाक और आवाज़ अभी तक बंद है!
    ये ठण्ड का लौटना स्वास्थ्य के लिए बड़ा हानिकारक है!!

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  6. मैं तो इस पलटवार से अभी तक जूझ रहा हूँ, मम्मी! खाँसी और सर्दी ने बेहाल कर रखा है (जबकि आपने इसका कोई ज़िक्र नहीं किया). हफ्ते भर की दवा के बाद, खाँसी कम हुई, पर नाक और आवाज़ अभी तक बंद है!
    ये ठण्ड का लौटना स्वास्थ्य के लिए बड़ा हानिकारक है!!

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  7. यहाँ तो लगातार होती बरसात के कारण ठंड बढ़ गयी है..असम में सर्दियों के बाद सीधे बरसात का मौसम आ जाता है..

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  8. वाह ... सर्दी के अनोखे खेल को व्यंगात्मक और काव्य सरोबर भाव से आलोकित कर दिया आपने ... ये आंखमिचौली का खेल सच में मजा खराब कर रहा है ...

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  9. आपकी प्रोफ़ाइल तक सिर्फ इसलिए आ गया कि आपने किसी ब्लॉग के कमेण्ट में 'शृंखला' ठीक लिखा था। आजकल उतना ही काफ़ी हो जाता है किसी की प्रोफ़ाइल तक आने के लिए। आकर पता चला कि कितना अच्छा निर्णय था। यूँ तो आपकी सभी कवितायें अच्छी लग रही हैं, लेकिन ये सर्दी वाली ख़ास भायी। सीधे-सरल शब्दों में मज़ेदार सा लिख दिया है।

    वैसे अभी सोच रहा हूँ, भाँग होता है या भांग? ये तो भाङ्ग वाला ही उच्चारण होगा न?

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