शनिवार, 2 फ़रवरी 2013

जैसे तुम!

*
चाहती हूँ स्वीकृति -
कि मैं हूँ एक व्यक्ति
अभिव्यक्ति सहित .
उन्हीं क्षमताओं दुर्बलताओं सँग आई हूँ ,
बुद्धि-संवेगों की वही भेंट पाई हूँ ,
 जैसे तुम !
*
कितनी मुश्किलें,
पर फिर भी यहीं खड़ी हूँ .
 जीवन की डोर थाम ,
आर-पार लगातार गिरी और चढ़ी हूँ .
एक दीर्घ स्वर और धार कर आई
वही गाँठ बाँध धारे हूँ !
 हल्की हूँ तन से
मन से बहुत भारी हूँ .
नारी हूँ !
*
कभी भुक्ति ,कभी मुक्ति,
शांति-भ्रांति या कि अहं ,
भागते हो घबरा कर
अपने लिये तुम.
अपने नहीं ,
अपनों के लिये हारी हूँ.
नारी हूँ !
 *
थोड़ा- सा अधिक और -
 कुंठित मत होना !
ममता के सूत कात घनताएँ वहने को ,
सृजन की उठा-पटक,
 दारुण-पल सहने को ,
सहज  नहीं मरती ,
कठोर जान लाई हूँ !
व्यक्ति-अभिव्यक्ति सभी ,
नहीं परछाईँ हूँ !
जैसे तुम !
*

33 टिप्‍पणियां:

  1. waah....
    बेहतरीन भाव...

    हल्की हूँ तन से
    मन से बहुत भारी हूँ .
    नारी हूँ !
    बहुत सुन्दर...
    सादर
    अनु

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  2. सर्वप्रथम इस शक्ति का स्वयं में अनुभूति तब समक्ष प्रस्तुति अति आवश्यक है.

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  3. व्यक्ति-अभिव्यक्ति सभी ,
    नहीं परछाईँ हूँ !

    ....बहुत सुन्दर भावपूर्ण प्रभावी अभिव्यक्ति....

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  4. दोनों की अपनी बातें हैं,
    संग रहें तो शक्ति,
    बढ़ते बन आसक्ति,
    रक्तिम विरही वेला,
    आशाओं का मेला,
    दिन से क्यों तपती रातें हैं,
    दोनों की अपनी बाते हैं।

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  5. हल्की हूँ तन से
    मन से बहुत भारी हूँ ...

    सच है ...

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  6. वाह!
    आपकी यह प्रविष्टि कल दिनांक 04-02-2013 को चर्चामंच-1145 पर लिंक की जा रही है। सादर सूचनार्थ

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  7. अपने नहीं ,
    अपनों के लिये हारी हूँ.
    नारी हूँ !
    उत्कृष्ट रचना ..... नारी मन के गहरे भाव ....

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  8. अपनों के लिये हारी हूँ.
    नारी हूँ !
    ye panktiyan lajavaab ...

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  9. प्रभावी प्रस्तुति |
    शुभकामनायें आदरेया ||

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  10. व्यक्ति-अभिव्यक्ति सभी ,
    नहीं परछाईँ हूँ !

    बहुत सुंदर पंक्तियाँ...नारी मन को उकेरती हुईं..

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  11. अपने नहीं ,
    अपनों के लिये हारी हूँ.
    नारी हूँ !

    विचार और भाव का सशक्त सम्प्रेषण .

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  12. कानून ने बराबर माना, समाज (पुरुष) को भी अपनी सोच बदलना होगा...

    मैं हूँ एक व्यक्ति
    अभिव्यक्ति सहित .
    उन्हीं क्षमताओं दुर्बलताओं सँग आई हूँ ,
    बुद्धि-संवेगों की वही भेंट पाई हूँ ,
    जैसे तुम !

    शुभकामनाएँ.

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  13. गहन विचारों की सशक्त अभिव्यक्ति |
    आशा

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  14. वैसे ही जैसे तुम ...
    स्वीकार तो ऐसे हो होना चाहिए ... मन की अभिलाषा को प्रभावी शब्दों में उकेरा है ...

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  15. सृजन की उठा-पटक,
    दारुण-पल सहने को ,
    सहज नहीं मरती ,
    कठोर जान लाई हूँ !
    व्यक्ति-अभिव्यक्ति सभी ,
    नहीं परछाईँ हूँ !
    जैसे तुम !
    नारी के हृदय को खोल कर रख दिया है .... बहुत सुंदर रचना

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  16. शकुन्तला बहादुर6 फ़रवरी 2013 को 6:00 pm

    मैं हूँ एक व्यक्ति
    अभिव्यक्ति सहित .
    उन्हीं क्षमताओं दुर्बलताओं सँग आई हूँ ,
    बुद्धि-संवेगों की वही भेंट पाई हूँ ,
    जैसे तुम !- ओजस्वी वाणी !
    नारी की अस्मिता को जगाती,उसको अपनी शक्ति का अहसास कराती और
    सामाजिक मान्यताओं को ललकारती एक सशक्त अभिव्यक्ति,जो मन पर
    गहरा प्रभाव छोड़ती है। इसमें प्रतिभा जी ने नारी-मन की गहराइयों में छिपी भावनाओं को बड़ी ही सुन्दरता एवं सहजता से उकेरा है। साधुवाद!!

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  17. कभी भुक्ति ,कभी मुक्ति,
    शांति-भ्रांति या कि अहं ,
    भागते हो घबरा कर
    अपने लिये तुम.
    अपने नहीं ,
    अपनों के लिये हारी हूँ.
    नारी हूँ !

    बहुत गहनता लिए उत्कृष्ट रचना ! बहुत ही सुन्दर !

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  18. बहुत-बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति ! दिल को छू गयी ....
    ~सादर!!!

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  19. सुन्दर रचना सुन्दर अभिव्यक्ति

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  20. साधारण सी दिखने वाली बात भी कितनी कठिन हो जाती है ...

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  21. वाह बहुत सुन्दर प्रस्तुति

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