गुरुवार, 13 जनवरी 2011

एक नचारी - नोंक-झोंक.

'पति खा के धतूरा ,पी के भंगा ,भीख माँगो रहो अधनंगा ,

ऊपर से मचाये हुडदंगा , ये सिरचढ़ी गंगा !'

फुलाये मुँह पारवती !
*

'मेरे ससुरे से सँभली न गंगा ,मनमानी है विकट तरंगा ,

मेरी साली है, तेरी ही बहिना ,देख कहनी -अकहनी मत कहना !

समुन्दर को दे आऊँगा !'
*

'रहे भूत पिशाचन संगा ,तन चढा भसम का रंगा ,

और ऊपर लपेटे भुजंगा ,फिरे है ज्यों मलंगा !'

सोच में है पारवती !
*

'तू माँस-सुरा* पे राजी ,मेरे भोजन पे कोप करे देवी .

मैंने भसम किया था अनंगा ,पर धार लिया तुझे अंगा !

शंका न कर पारवती !'
*

'जग पलता पा मेरी भिक्षा ,मैं तो योगी हूँ ,कोई ना इच्छा ,

ये भूत औट परेत कहाँ जायें ,सारी धरती को इनसे बचाये ,

भसम गति देही की !'
*

बस तू ही है मेरी भवानी ,तू ही तन में में औ' मन में समानी ,

फिर काहे को भुलानी भरम में ,सारी सृष्टि है तेरी शरण में !

कुढ़े काहे को पारवती !'
*

'मैं तो जनम-जनम शिव तेरी ,और कोई भी साध नहीं मेरी !

जो है जगती का तारनहारा , पार कैसे मैं पाऊँ तुम्हारा !'

मगन हुई पारवती !
*
(* शाक्तमत में सुरा&;मांस विहित है)

बुधवार, 29 दिसंबर 2010

अंतर - घट

*
कितनी आवाज़ करते बजते हैं

खोखले शब्द .

जैसे रिक्त पात्र ज़रा टकराहट में

अपनी ही झनझनाहट से डोल जाए ,

दूसरे को लक्ष्य बनाते

स्वयं को तोल जाए .
*

भनकती -टनकती आवाजें ,

अपने ही कंपनों से आकुल,

उद्विग्न,चोट करती हुई

आवेश सघन.

*

अहं की बाधा तोड़ ,

अपने से आगे ,निकले होते

तो टोकरा भर शिकायते व्यंग्य ,कटूक्तियाँ

चुभन के दंश न होते .

हो आत्म ही असंयत डँवाडोल,

मन की उन्मुक्त

पुकार कैसे जागे !

*

काश होता स्वयं में आपूर्ण

अंतर-घट,

सार्थक, प्रेरक, ग्रहणीय ,

गहन-गंभीर स्वर उभरते,

स्नेह की छलक भरे .

वह रूप

कितना महनीय होता !

*



रविवार, 12 दिसंबर 2010

कवि से -

*

तिमिर स्तर कर पार ,मनमय कोष भास्वर

दीप्तिमय हर शब्द,ज्योतित पंक्तियाँ धर ,

कवि, तुम्हारे छंद, आरण्यक-स्वरों में

उदित ऊषाकाल के ऊर्जिल किरण- शर !

*

अक्षरित हो भू- पटल पर उभर आएँ

गमक भर-भऱ शिखर ,गुंजन द्रोणियों में

कवि ,तुम्हारे स्वरों से आश्वस्ति पा,

दुष्काल को भी अब लगेगें स्वप्न आने ,

हो गए हैं शब्द जो दिक्-काल व्यापी,

अजित अपरामेय अनुप्रेरित अनश्वर !

*

पहुँच पाये जब जहाँ तक यह सँदेशा

अनसुने कब तक रहेंगे ये प्रबोधन !

और कब तक नयन मीलित ही रहेंगे,

स्वच्छ निर्मल कर धरा जो सत्य-दर्पण

चेत को झकझोरते वे मंत्र फूँको ,

आज वैतालिक, कि जग जाए चराचर .

*

शुक्रवार, 19 नवंबर 2010

सायुज्य

*


लौट जाएँगे सभी आरोप ,

मुझको छू न पा ,

उस छोर मँडराते हुए .

तुम निरे आवेश के पशु

तप्त भाषा घुट तुम्हीं में ,

बर्फ़ बन घुल

दे विफलता बोध.

*

बहुत अस्थिर ,

बदलते पल-पल

बहुत अक्षम ,बिचारे ,

जब न संयम ,

धुआँ बन कर,

घेर लेंगे ये सुलगते हर्फ़

क्या करेंगे तर्क सारे अनविचारे.

*

सिर्फ़ मनःविलास की ललकार .

अहंकारों की उपज जो

चाहता स्वामित्व का अधिकार ,

रे मदान्ध ,किसे दिखाता रोष

मैं नहीं लाचार .

है मुझे यह युद्ध भी स्वीकार .

*

झेलती प्रतिघात मैं

सब बूझ लूँगी ,

सिर पटकता जो विवश आक्रोश ,

खूँदते धरती विवश

डिडकारते ,भरते कराहें

बल दिखा धिक्कारता

तेरी विमति की मंडली से जूझ लूंगी .

*

और ,दूषण लगाना आसान कितना,

आत्म मुग्ध,स्व-वंदना के राग गाकर

अरे दुर्मद,

कौन से पट को हटाना चाहता तू .

देख पाए किस तरह

चिर- आवृता मूला प्रकृति मैं

दृष्टि का विस्फोट ,अंध अशील तू

तत्क्षण विवृत हो पंचभूतों में मिलेगा

*

देख रुक कर -

और पी लूँ मद कि कि हों रक्ताभ लोचन ,

हो कि यह उन्माद गहरा ,और पी लूँ

और पी लूँ क्योंकि पशु पर वार करते ,

कहीं करुणा जाग कर धर दे न पहरा.

गमक जाए राग, आनन पर लपट सा ,

दे सकूँ बलि कर निरंश निपात पशु-तन

*

गरलपायी ,कामजित् भूतेश

मेरी साधना,

केवल सदा- शिव हेतु,

यह जन्मान्तरों तक व्रत पलेगा .

किस तरह हो शक्ति, पशुता को समर्पित ,

कराली भयदायिनी का

शिेवेतर उपचारणा के हेतु

यह अनु- क्रम चलेगा .

*

रूप से विस्मित-विमोहित ,

विभ्रमित-सा चाहता सामीप्य

तेरी लालसा पूरी करूँगी

अंततः हो कर सदय

सायुज्य दे सम्मुख धरूँगी

पक्ष हों प्रत्यक्ष दोनों

महिष-मानुष तू रहे

प्रत्यक्ष करता भूमिका,

दृष्टान्त-सा प्रस्तुत करूँगी

*

मंच की हर वेदिका पर

अर्धमानव- वपु धरे,

तेरा अहं बलिपशु बना,

प्रतिबद्ध हो.

तेजोमयी के साथ

तमसाकार अब प्रत्यक्ष हो .

*

निरूपण मेरा जहाँ ,

तू रह उपस्थित,

देख ले संसार ,मूला प्रकृति का ऋत.

मातृशक्ति समक्ष ,

लालायित ,विमोहित विवश नर पशु

तेजहत, असमर्थ होगा.

जहाँ मैं चिद्रूपिणी, ओ महिषमति

विद्रूप बन तू भी रहेगा .

*

रविवार, 24 अक्टूबर 2010

व्याप्ति-

*
विषम क्षणों में
 उचाट हो टेर उठता
अंतस्थ आत्म जब
सर्व व्याप्त परमात्म को,
एक स्निग्घ बोध जाग जाता  अनायास -
कि कहीं कुछ और नहीं ,
बस एक सत्ता
अपने आप में
लघु नहीं, संपूर्ण मैं .
*
आत्म में निवसित बाह्य-निरपेक्ष.
सारे बोध, भावना ,विचारणा ,संकल्पना ,
व्यवधानरहित ,
सम्पूर्ण मानसिक सत्ता एकात्म!
अवरोध हीन
वर्जना रहित.
*
सतत चैतन्य
स्थिर ,अचल ,उदग्र
अनुपम ऋत की पारणा ज्यों,
मेरा निजत्व .
जैसे रची हुई सारी सृष्टि
मेरे भीतर -बाहर,
आत्म-निहित और सर्वत्र .
*
एक ही तार की झंकार
कभी वेदना -उल्लास कभी विराग-राग .
उस व्याप्ति मैं ,
कहीं नहीं कोई और
किसी का मानना-जानना
कोई अर्थ नहीं रखता जहाँ
विराट् चैतन्य से समाहित ,
*
अत्यल्प अवधि को भले ,
समाधि स्वरूपा ,
मुझ में लयलीन
अपरूप दिव्य,
ओ,मेरी व्याप्ति
प्रणाम तुम्हें !

*

बुधवार, 22 सितंबर 2010

अनिर्वच

लहर लेती बह रही

शिप्रा अभी मेरे हृदय में .

नयन में जल बन समाया,

साँस में सौरभ बसाया ,

वही कल-कल नाद

अविरल गान बन कर उमड़ता.

देखो, नहीं सूखी .

*

कह रही वह

मैं नहीं सूखी ,

तुम्हीं ,जीवन-रसों से दूर हो,

उस चिर-पिपासित हरिण से

जो श्लथ-थकित होता विकल

पर दौड़ती तृष्णा कहीं थमती नहीं.

कान दे सुन लो कि शिप्रा कह रही है -

मैं नहीं सूखी , चुके तुम ,

बोध कुंठित हो गए ,

रूखे हुए मन,

चुक गई संवेदनाएँ.

*

एक दिन बह आयगा जल ,

एक दिन पत्थर पिघल

कर ही रहेंगे ,

यह नदी की राह सूखी नहीं,

मेरे अश्रु जल से सिंच रही ,

अविराम शिप्रा बह रही है .

*

जन्म मेरा और ,

शिप्रा के यही तट-घाट होंगे ,

शरद्-पूनो फिर दियों से झलमलाए,

द्रोणियों धर दीप लहरों में बहा ,

कुलनारियाँ ,आँचल पसार असीस पायें .

कौन रोकेगा मुझे,

मैं हूं चिरंतन ,

वह अनिर्वच कह रही है .

*

शनिवार, 18 सितंबर 2010

संबंध

*
नदी की तरह निस्स्वार्थ बहते हैं .

वही सहज होते हैं
.
अपनी मौजों में,अपने ढंग से

अपने रंग में लीन ,

रहते हैं संबध.

*

भुनाने की कोशिशें.

और अहं के ढेले फेंक ,

लहरें उठाने का चाव

बाधित कर देगा प्रवाह.

पारदर्शिता खो गँदला जाएगा.

निर्मल जल.

कीचड़ जमे तल में .

कैसे रहे प्रवाह तरल -सरल.

*

क्षेपकों की संरचना

घने वाग्जाल ,

ओझल जल-विवर

डुबोने वाले भँवर

जिनका कोई उपचार नहीं.

खा जाए चक्कर

पर उबरती है धारा,

खोजती अपना किनारा.

*

बाध्यता नहीं कि,

आत्मसात करे उन अग्राह्य अणुओं को ,

धारा का स्वभाव अपनी ढलान बहना,

संबंध का निभाव परस्पर समझना.

उछाला गया आवेग

निष्फल आक्रोश ,

इसी तट बिखेर

रुख मोड़ ,

तोड़ देगी हर कारा.

*

शिरोधार्य हैं पथ -प्रवाह में मिली

अविकृत पुष्प-पत्राँजलियाँ ,

प्रतिदान की अपेक्षा बिना

पाए निस्पृह नेह-क्षण,

जिन्हें लहराँचल में सँजोए

बह जाएगी आगे

संबंधों की धारा.

*