गुरुवार, 18 अप्रैल 2013

वर्ण-विकृतियाँ .

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बावन आखर थे यहाँ ,अब गायब हैं चार,(ऋृ,लृ,लृ+ृ,ष)
सुध लेवा कोई नहीं ,कइस लोक-व्यवहार !
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कुछ वर्णों का रूप तो दिया और में ढाल,
ष या  श,ख जो  कहो , एक रूप  तत्काल. (लषन को लखन और विष्णु को विश्णु कहते हैं )
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श्र का रूप विकृत किया ,जोड़ी और रकार,('श्रृंगार' कर दिया )
अब कैसे उच्चरोगे ,श पर दो-दो भार .(सिर्फ़ ृ का काम  था - शृ)
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ऋषि कर गए बन-गमन ,हमें दे गये चिह्न,
लोग  बिगाड़े दे रहे बन कर परम प्रवीण !(लोग गृह-घर-  को  ग्रह -आकाशीय पिण्ड- लिखते हैं
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क्या पा लोगे विद्व-जन,खो कर पञ्चम वर्ण,
ध्वनियों के उच्चार का अनुशासन  कर भंग . (पञ्चम वर्ण की जगह ,अनुस्वार प्रयोग बड़ा गड़बड़ कर देता है)
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उच्चारण होगा वही ,मानो भले न मित्र,
जो सदियों से सिद्ध था ,अब क्यों हुआ विचित्र!
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अरे, ज़रा तुम देख लो ,शासन   का अभिमान,
रोल-गोल मुँह आ घुसा सिर पर टोपा तान !(ऑ)
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हुआ आक्रमण देश पर ,चले नये व्यवहार,(क़.ख़.ग़)
गर-गर खर-खर कर रहे , उठती गले खखार.
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पग में रोड़े आ पड़े फिसल गये दो-चार, (क़,ख़,ग़)
गला गरगरा कर करो अब उनका उच्चार!
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 लुढ़के- रड़के दो जने ,ड.ढ गूमड़दार, (ड़,और ढ़ हो गए )
सारा ढंग बदल गया,  जैसे ठेठ गँवार.
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कंकड़ पग में यों पड़े, गये लड़खड़ा वर्ण ,
क़ख़ग़ के साथ ही बिगड़ गये कुछ अन्य .
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ज फ भी तो छूत के ऐसे हुए शिकार,(ज़,फ़)
ज़ोर दिखा कर  फूल को  'फ़ूल' किया  लाचार.
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जो कुछ सिद्ध ,विहित रहा ,अब हो गया निषिद्ध
भाषा का दुर्भाग्य यह , रहा न शुद्ध-अशुद्ध.
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यहाँ बेतुकी गलतियाँ ,छूट न जाएँ मित्र,
देखें अगली पीढ़ियाँ, हँसी बनेगी नित्य !
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22 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत अच्छा लगा पढ़कर. सचमुच वर्ण-विकार खूब खटकते हैं. चन्द्र-बिंदु भी गायब है. और रही सही कसर को गूगल ट्रांसलिटरेशन के द्वारा पूरा किया जा रहा है. नयी पीढ़ी तो इसी पर भरोसा करेगी.

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  2. भाषा के विकार को कहते बहुत सुंदर दोहे ....

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  3. बहुत बढ़िया प्रतिभा जी....
    मजा..अरे नहीं "मज़ा" आ गया
    :-)
    आभार इस शानदार पोस्ट के लिए..

    सादर
    अनु

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  4. वाह..आपकी पैनी नजर से कुछ बचता नहीं..रोचक और ज्ञानवर्धक प्रस्तुति !

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  5. आपके दोहों ने तो आज की चालू हिंदी को आईना दिखा दिया . बहुत सटीक दोहों से एक एक अक्षर को विश्लेषित कर बता दिया कि हमने भाषा को क्या का क्या कर दिया है? रही सही कसर हमारे टीवी ने पूरी कर दी . इतना गलत डिस्प्ले देखने को मिल जाता है कि शर्म आने लगती है.

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  6. अरे गज़ब हैं आप तो...क्या नजर है और क्या कौशल.

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  7. बदलते भाषा के स्वरुप पर बहुत सुन्दर और सटीक दोहे..

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  8. आपने हिन्दी भाषा का दर्द बयान कर दिया। हिन्दी भाषा के साथ दुराचार हो रहा है उसके लिए हिन्दी भाषी और तथाकथित अंग्रेजियत का चश्मा लगाए तथाकथित हिन्दी प्रेमी हैं। वर्णों की जानकारी हिन्दी बोलने वाले कितने लोगों को होगी यह तो राम जाने।
    आपने जो विषय उठाया वह समीचीन है और उस पर चर्चा होनी चाहिए। हिन्दी की प्रतिष्ठा बचाने की आवश्यकता है।
    ऐसे विषय पर रचना लिखने के लिए आपका साधुवाद!
    सादर!

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  9. आभार ...आगे से ध्यान में रहेगा, अच्छा ज्ञान मिला

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  10. माता जी मेरे लिये संग्रहणीय आप की ममता बनी रही मातृभाषा पर मेल करेंगी इस आशा में ...प्रणाम

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  11. शकुन्तला बहादुर19 अप्रैल 2013 को 11:54 pm


    शुद्ध अगर ध्वनियाँ रहें, भाषा होगी शिष्ट ।
    वर्ण-विकृतियाँ बन गईं,दोहों में विशिष्ट ।।
    सूक्ष्म-दृष्टि से प्रतिभा जी ने,भाषा का कल्याण किया।
    सरस मधुर दोहों के द्वारा,हिन्दी का सम्मान किया ।।
    मेरे मन की बातें कह दी हैं प्रतिभा ने।
    मुग्ध किया है मुझको विदुषी की मेधा ने।।

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  12. आपकी यह कला पूर्ण अप्रतिम् रचना 'निर्झर टाइम्स' पर लिंक की गई है।कृपया http://nirjhar-times.blogspot.com पर अवलोकन करें।आपकी प्रतिक्रिया सादर आमंत्रित है।

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  13. बहुत बढ़िया.......अक्सर सरकारी बोर्ड पर कृपया की जगह कृप्या ..कार्ड्स पर श्रीमती की जगह श्रीमति...वधू की जगह वधु ....उषा की जगह ऊषा ...पढ़ने को मिलता है

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  14. सच कहा ... जब हम पढते थे तो ५२ अक्षर ही थे भाषा में पर अब ... मेरी बेटी जो १०वीं में है उनको हिंदी में ५२ वर्ण नहीं पढ़ाते ... वो इस बातको नहीं मानती ...
    हिंदी के जितना दुरूपयोग आज के दौर में हो रहा है उतना कभी नहीं हुआ ...

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  15. दोहों के माध्यम से भाषा के विकृत होते स्वरूप पर पैना ध्यानाकर्षण.

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  16. nukte wale dohe to zabardast hain..maine kabbi bhi nai socha tha k is tarah se padhungi is cheez ko...yadhyapi school college me bahut highlight kiya hai nukte samet gale se bolne kee koshish kar kar ke..:-)
    baharhaal.....jitni rochakta se hindi kee samsya prastut hui hai uske liye to main qayal ho gayi pratibha jee....sanjeedgi se dekhti hoon aur sochti hoon..to sach me gehre chubhti hai hindi kee sthiti.Rekha ji kee baat se ekdum sehmat hoon..maine bhi anek baar dekha hai k bade bade tathakathit raashtreeya channels par hindi shabdon kee kitni adhik truti jab tab nazar aa jaati hai..aur wo bhi baqaayda bade bade font me.
    samvedansheelta kitni zyada aham hai na jeewan ke har kshetra mein! apni bhasha se hriday se jud paaye agar koi to us bahsha kee itni durgati hona bahut mushkil hai.(Jackie Chan ne ek baar aisa hi kuch bahut achha kaha tha..mere dhyaan se unki baat nikal gayi bas aashay yaad reh gaya :(..jo ki ye tha ki ''aap swayam hi apne maatrabhasha ko uska samman de sakte hain..films ke sandarbh me unhone ye baat kahi thi..ki apni films me apni bhasha ko mehatv diya jana chahiye...'' humare desh me ulta hi hai..actors/actress kabhi kabhi aise dialogue bolte hain jaise unhe khud hi nai pata ki woh keh kya rahein hain :) )

    aabhaar dher sa pratibha ji is post hetu :)
    ummeed hai main jo anjaane me ya jaane me bhi galtiyaan kar jaati hoon hindi me..unka ab bahut adhik dhyaan rkahungi..shuruaat to khud se hi hoti hai na :) bahut bahut aabhri hoon!!

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