बुधवार, 5 सितंबर 2012

शिक्षक-दिवस के बाद -

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मंजु ने आवाज़ दी ,'अरे, डॉ.राय,
पिछले साल तो आपने वाक्आउट दिया कराय !
कहा कि पेपर जा रहा आउट ऑफ़ द कोर्स,
एकदम है ये बेतुका लड़कों को कर फ़ोर्स ।'
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चलते-चलते रुक गये एकदम .डॉ राय
'हम क्यों जुम्मेदार हैं ,हमने दी थी राय !
लड़कों ने हल्ला किया हमने समझी बात ,
वहाँ बेतुके प्रश्न थे ,कुछ बिल्कुल बकवास ।'
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'तब फिर तो इस बार वे होंगे ही संतुष्ट ,
पेपर जो था  आपका ,सिद्ध हो गया इष्ट .'
'तो वह भी सुन लीजिये वह भी किस्सा एक .
डॉ.मंजु, खुश हुये हम लड़कों को देख.'
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पूछा -' क्यों कैसा रहा पेपर अबकी बार ?'
'कौन हरामी था, किया सेट पेपर बेकार '?
दूजा बोला 'परीक्षक साला खाकर भंग,
सारे कोश्चन चर गया,जो चेप्टर के संग.
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भाषा थी बदली हुई ,समझ आय क्या ख़ाक,?
गधा ,नलायक दे गया हम लोगों को शॉक .'
उठा ठहाका एक फिर, मानी हमने हार .
इस पीढ़ी का किस तरह हो पाये उद्धार !
*
(उपरोक्त में  कुछ शब्दों  पर आपत्ति हो सकती है ,पर वे मेरे अपने नहीं है.उनका प्रयोग ,एक सच है ,जिसे सामने ला देना ही उचित लगा .)
*
 प्रतिभा सक्सेना .

10 टिप्‍पणियां:

  1. आज की पीढ़ी की यही भाषा है .... आपने बिलकुल सही लिखा है ... बहुत बढ़िया

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  2. अक्सर ऐसा ही होता है जब हम नाकाम होते हैं और उसका मूल कारन या असफलता हम खुद स्वीकार नहीं कर पाते .असफलता को दुसरे के सर मढ़ देते हैं . mata ji pranam .SATY KO UDDGHATIT KARANE KA DHANYAWAD .

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  3. आज की भाषा में आज के लोगों को समझाने के लिये।

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  4. शकुन्तला बहादुर10 सितंबर 2012 को 8:15 pm

    आज के छात्रों की मानसिकता और तदनुरूप भाषा के द्वारा सत्य का
    सहज स्वाभाविक और सच्चा चित्रण है।

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  5. जिस जेनेरेशन की बात की गई है, उसके अनुरूप भाषा का गठन इस कविता में जान फूंकता है।

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  6. सही है इन लोगों का क्या हो सकता है ।

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