गुरुवार, 12 नवंबर 2009

ओ,अंतर्यामी

मैंने क्या किया ?
कुछ नहीं किया मैंने ,तुम अर्जुन ,तुम दुर्योधन ,
द्रौपदी अश्वत्थामा और व्याध भी तुम्हीं !
सूत्रधार और कर्णधार सब कुछ तुम्ही तो हो
तुम्ही ने रचा सारा महाभारत
और झेलते रहे सारे शाप ,संताप ,
सबके हृदय का उत्ताप !
*
मुझसे क्या पूछते हो मेरे कर्मों का हिसाब !
सब पहले ही लिख चुके थे तुम
एक एक खाना भर चुके थे !
मुझे ला छोड़ा बना कर मात्र एक पात्र ,
अपने इस महानाट्य का ,ओ नटनागर !
मुझे तो पूरी इबारत भी पता नहीं थी ,न आदि न अंत !
एक एक वाक्य ,थमाते गये तुम
पढ़ती गई मै !
*
निमित्त मात्र हूँ मैं तो !
रखे बैठे हो पूरी किताब!
अब पूछो मत !
नहीं ,
नहीं दोहरा पाऊँगी अब !
*
ओ,अंतर्यामी ,
छोड़ दिया है मैंने
अपने को तुम्हारे हाथों में !
पूछो कुछ मत,
जो चाहो ,करो !

2 टिप्‍पणियां:

  1. आज मैं और मौसी इस पर बात कर ही रहे थे....कि क्यूँ भगवानजी ने ये सब जीवन मृत्यु वगैरह बनाया.......और फिर अवतार ले लेकर...धरती पर आ आकर गीता में कहते हैं..कि ,''..मेरी शरण में आओ..मेरी शरण में आओ..मैं ही तुम्हे मुक्ति दूंगा....'' mukti hi pana hai to itta prapanch..kyun....??
    क्या ये मात्र एक क्रीडा है..ishwar ke मनोरंजन का साधन?? :o

    ''सूत्रधार और कर्णधार सब कुछ तुम्ही तो हो
    तुम्ही ने रचा सारा महाभारत ''

    एकदम सच है..!mera full support in lines ko..

    'सब पहले ही लिख चुके थे तुम
    एक एक खाना भर चुके थे !
    मुझे ला छोड़ा बना कर मात्र एक पात्र '

    ..और इस पात्र को निभाने में कितनी कसोटियों से गुज़रना पड़ता है...:(
    भगवानजी तो कह देते हैं के तटस्थ होकर कर्म करो....(आपकी लालित्यम की पोस्ट 'पांचाली से ये शब्द लिए..'')...मगर मैं अपने पर स्थिति रखकर सोचूँ...तो क्या मैं अपनी माँ से तटस्थ हो सकती हूँ...:o...??koi bhi apne mool kartavyon se kaise tatasth ho sakta hai...even meera ko bhi bhagwan ne apne kartavya nirvaah karne ke liye kaha tha.......:(

    ओ,अंतर्यामी ,
    छोड़ दिया है मैंने
    अपने को तुम्हारे हाथों में !
    पूछो कुछ मत,
    जो चाहो ,करो

    मैं भी कभी कभी निराशा में यही सोचती हूँ प्रतिभा जी..मगर ऐसा संभव कहाँ.....अगर हो सकता ऐसा...तो फिर क्या बात थी..? लोग अबाध बहे जाते परिस्थितयों में.....भगवानजी को उतना आनंद नहीं आता संसार के खेल में.......:/

    बहरहाल..ये मेरा दिमाग से लिखा गया comment है...:) दिल से तो मैं भी अपने आप को उपरवाले परमपिता के हाथों सौंप दिया करती हूँ......जो करेंगे अच्छा होगा...ऐसा सोचकर..:)
    कहीं पढ़ा था...तर्क से प्रभु नहीं मिलते...बुद्धि को छोड़ कर ही भक्ति की जा सकती है.....bas padha hi hai..aatmsaat karne ke prayatn mein hoon..:)

    खैर......
    आपकी इस कविता के पूरे समर्थन में हूँ.....और अंतिम पद की प्रार्थना में भी हाथ जोड़े खड़ी हूँ..:)
    आभार इस कविता को लिखने के लिए.....

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  2. शकुन्तला बहादुर16 अगस्त 2011 को 11:28 am

    मन डूब गया इस निःस्पृह भावपूर्ण समर्पण की अभिव्यक्ति में।
    कुछ कह पाने का सामर्थ्य नहीं रह गया है। अतः निश्शब्द ही रहूँगी।

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