बुधवार, 4 नवंबर 2009

धरोहर -

शताब्दियाँ फटक-पछोर कर सँवारती रहीं जिसे,
युग-युगान्तर ठोंकते-बजाते परखते रहे ,
कसी जाती ,निखरती रही
निरंतर नये परिवेश के साथ,
और लोकमन चंदन- सा माथे चढाये रहा ,
दिग्दिगन्त महक उठता जिस सुवास से ,
पाई है हमने जो धरोहर ,
- हमारी संस्कृति !
अगली पीढ़ी को सौंपे बिना
शान्ति कहाँ ,मुक्ति कहाँ !
*
एक ही कथा है
जिसके भन्न-भिन्न पात्र हैं हम ।
एक ही विरासत !
और यहाँ भी सारा हिन्दुस्तान सिमट आया ,
धारे अपना वहीं वेष !
*
यहाँ भी -
दुर्गा - लक्ष्मी और गणपति रुचिपूर्वक रचनेवाली ,
और समारोह पूर्वक विसर्जित करनेवाली
अपने देश की माटी हर बरस जता जाती -
जीवन-मृत्यु दो छोर हैं
समभाव से ग्रहण करो !
सृजन को जीवन का उल्लास
और विसर्जन को उत्सव बनाना ही
है -जीवन का मूल राग !
*
यहाँ की चकाचौंध जिसे भरमा ले दौड़ती भागती बिखरन ही उसके हाथ
आई , तृप्ति तो मुझे कहीं नज़र नहीं आती ।
इस नई दुनिया की ,आँखों को चौंधियाती चमक देखो, कितने दिन की
पर सहस्राब्दियों की कसौटी पर कसी
पुराने की अस्लियत अंततः सामने आ ही जाती है ।
पर जीवन का जो अंश वहाँ छोड़ आये
उसकी कमी हममें से किसे नहीं सताती ।
कभी अकेले में ,
किसकी आँख नहीं भऱ आती ।
*
जब यहाँ होती हूँ ,
अपना देश चारों ओर देख लेती हूँ ,
और वही दृष्टि इन सब आँखों में देख
एक गहरा संतोष मन को आश्वस्ति से भर जाता है ।
*

6 टिप्‍पणियां:

  1. नत हूँ- प्रणत हूँ, उसके बिना मुक्ति कहाँ?
    आभारी हूँ उस क्षण का जब आपको तनिक जानने का गौरव मिला.
    रश्मियों का उजास, गँगा की धार सा है यह लेखन, अधिक कह सकूँ इतना सामर्थ्यवान नहीं हूँ.

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  2. सृजन को जीवन का उल्लास
    और विसर्जन को उत्सव बनाना ही
    है -जीवन का मूल राग !

    जी...एकदम सटीक कहा आपने :).......मेरी गहरी दोस्त कनाडा में रहती है...2005 के बाद से एक दूसरे को मिले नहीं चूंकि उसके परिवार ने सदा के लिए भारत छोड़ दिया सो उसका आना नहीं हुआ..मगर बात होती है घंटों घंटों......जब एक गाना आया था फिल्म 'नमस्ते लंदन' का...''कहने को साथ अपने एक दुनिया चलती है.पर छुपके इस दिल में तन्हाई पलती है...''......तब उसने कहा था ,'' तरु वाकई ये शायद हम सारे हिंदुस्तानियों की पारिभाषित व्यथा है.....जो बाहर रह रहे हैं....''

    आज आपकी कविता पढ़ी..आँखें नम हो आयीं....कुछ मेरी दोस्त की बातें याद आतीं रहीं..कुछ वो पीड़ा महसूस होती रही..जो मेरी दोस्त ..या आप या और लोग महसूस करते होंगे..:(

    ''और वही दृष्टि इन सब आँखों में देख
    एक गहरा संतोष मन को आश्वस्ति से भर जाता है ।''

    ..बहुत बहुत बढियां बात कही है प्रतिभा जी...मन भर आया फिर से मगर ख़ुशी से :)...अपना तो अपना...दूसरों के नैनों में भी वही जल वही व्यथा और वही देशप्रेम आपने स्पष्ट किया......

    ढेर सा आभार ऐसी कविता के लिए..:)

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  3. शकुन्तला बहादुर16 अगस्त 2011 को 11:45 am

    अतिशयता की सीमा को पार कर गई सुन्दर मार्मिक अभिव्यक्ति
    मेरी पलकें भिगो गई। मेरी अनुभूतियों को आपने दर्पण दिखा दिया।
    भूल नहीं पाऊँगी,याद सदा आएगी,
    देश की माटी,देश की संस्कृति ,
    बार बार मुझे रुला जाएगी।

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  4. जब यहाँ होती हूँ ,
    अपना देश चारों ओर देख लेती हूँ ,
    और वही दृष्टि इन सब आँखों में देख
    एक गहरा संतोष मन को आश्वस्ति से भर जाता है ।

    बेहतरीन पंक्तियाँ हैं।

    सादर

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  5. धन्यवाद इस सुंदर रचना के लिये...

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