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शुक्रवार, 11 मार्च 2011

मुक्त कर दो अब मुझे -

*
कब से ,

छटपटा रही हूँ

कुचली हुई विरूप देह के पंजर में .

रोम-रोम जकड़ा

वहीं के वहीं जड़ीभूत

आहत मन ,

पल-पल तड़पते

प्राणों की रगड़.

*

सैंतीस साल !

दारुण यंत्रणा ,

सच पर अड़ने का ,

नारी होकर नर के आगे

न झुकने का दुस्साहस .

परिणाम ?

*

परिणाम ?

यही -मैं ,

कभी रही थी -

अरुणा शानबाग.

आज उदाहरण मात्र !

टू़टी -फूटी खंडित देह की कारा ,

वही  भयंकर भूमिका

निश्चेत, जकड़ा  मन ,

न जीवन न मृत्यु,

अहर्निश ,असह्य !

*

उदाहरण बनी पड़ी हूँ ,

सँजोओगे कब तक ,

मानवी देह का उपहास ?

या नारीत्व ही एक शाप !

सिमटी-लिपटी ममी हूँ ,

या ज़िन्दा लाश ?

*

दे दो अब छुटकारा !

मत बाँधे रहो

साँसों की जर्जर डोर ,

कटे इस जनम का पाप,

बस मुक्त कर दो ,

मुक्त कर दो अब मुझे !

*