शुक्रवार, 9 नवंबर 2012

सागर के नाम -

*
लिख रही अविराम सरिता,
नेह के संदेश .
पंक्तियों पर पंक्ति लहराती बही जाती
कि पूरा पृष्ठ भर दे  .
यह सिहरती लिपि तुम्हारे लिये ,प्रिय.
संदेश के ये सिक्त आखर .
*
क्या पता कितना हवा सोखे ,
उडा ले जाय .
वर्तुलों में घूमते इस भँवर-जल के
जाल में रह जाय.
उमड़ती अभिव्यक्तियाँ
 तट की बरज पा
 रेत-घासों में बिखर खो जायँ !
*
राह मेरी-
 पत्थरों से
सतत टकराती बिछलती,
विवश सी ढलती-सँभलती .
नियति कितना, कहाँ  भटकाये.
नाम से मेरे कभी पहुँचे ,न पहुँचे
और ही जल -राशि में रल जाय !
या कि बाढ़ों में बहक
सब अर्थमयता ,व्यर्थ  यों उड़ जाय !
*
लिख रही अविराम ,अनथक
इन सजल लिपि-अंकनों में,
 ले , तुम्हारा नाम !
शेष  कुछ तो रहे तब तक ,
 जहाँ बिखरी पंक्तियाँ
 उद्दाम फेनिल के अतल छू ,
लेश हो ,निहितार्थ का पर्याय !
*

12 टिप्‍पणियां:

  1. वाह क्या बात है आपको दीपावली की शुभकामना

    उत्तर देंहटाएं
  2. राह मेरी-
    पत्थरों से
    सतत टकराती बिछलती,
    विवश सी ढलती-सँभलती .
    नियति कितना, कहाँ भटकाये.
    नाम से मेरे कभी पहुँचे ,न पहुँचे
    और ही जल -राशि में रल जाय !
    या कि बाढ़ों में बहक
    सब अर्थमयता ,व्यर्थ यों उड़ जाय !

    माताजी प्रणाम अद्भुत लाइन दीपावली की शुभकामनाएं

    उत्तर देंहटाएं
  3. लिख रही अविराम ,अनथक
    इन सजल लिपि-अंकनों में,
    ले , तुम्हारा नाम !
    शेष कुछ तो रहे तब तक ,
    जहाँ बिखरी पंक्तियाँ
    उद्दाम फेनिल के अतल छू ,
    लेश हो ,निहितार्थ का पर्याय ! ... अविस्मर्णीय भाव ...

    उत्तर देंहटाएं
  4. प्रणाम आपको !
    दीपावली मंगलमय हो...

    उत्तर देंहटाएं
  5. मैं तो आपकी रचनाओं में प्रयुक्त शब्दों की खूबसूरती में ही खो जाती हूँ.

    उत्तर देंहटाएं
  6. बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
    आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि-
    आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार (11-11-2012) के चर्चा मंच-1060 (मुहब्बत का सूरज) पर भी होगी!
    सूचनार्थ...!

    उत्तर देंहटाएं
  7. राह का बढ़ना सम्हलना,
    पत्थरों को क्या पता सब,
    बने वे अवरोध फिरते,
    तदपि रहता स्फुरित जग।

    उत्तर देंहटाएं
  8. आपको पढ़कर मन आनंद से भर जाता है..

    उत्तर देंहटाएं