बुधवार, 25 जनवरी 2012

नटराज !


*
हे अखिल सृष्टि-मंचों के पट के सूत्रधार ,
 जीवन-लय के चिर नृत्य-निरत  नट कलाधार !
जागृत कर  जड़ीभूत संसृति,  दे मंत्र स्वरित,
चित्-भावों में हो सकल कलायें अन्तर्हित !
*
वह विगत-राग तेजोद्दीप्त तन धवल कान्त,
भस्मालेपित हे पिंगलाक्ष, शोभित नितान्त .
उच्छलित सुरसरी जटा-जूट नव-चंद्र खचित
अवतरण शक्ति का अनघ दीप्ति सहचारिणिवत्
*
दिपता त्रिपुण्ड, आभामय मस्तक पर प्रशस्त
आवरण दे रहा सृष्टि-उत्स  को  अधोवस्त्र.
यह महा प्रभामंडल,ज्वालामय अग्नि-चक्र ,
कर रहा निरंतर भस्म अहंता , मोह-तमस् .
*
दक्षिणोर्ध्व हस्त  में डमरु नाद का शब्द- यंत्र,
जिसकी स्वर लहरी से  झंकृत दिक्काल तंत्र ,
वामोर्ध सृष्टि-संवाहक जीवन-अग्नि  धार
सच-शुभ-सुन्दर करता कलुषित  मनसिज विकार .
*
मंगल विधान दाहिना अधो-कर  अभय दान,
हे महाकाल ,धर  भूत -भविष्यत् का विधान !
कर नष्ट  अशिव  उत्थित कर  में  साधे त्रिशूल,
 थिरकन में क्षिति की उर्वरता फल-अन्न-मूल.
*
 कुण्डलिन- सर्प दीपित तन पर लिपटे अथर्व
  ऊर्जा विस्फोट अपरिमित ब्रह्मांडों के दिव,
 इस  महा- सृष्टि के संचालक   नर्तक -नट विभु
नियतात्म,मुंडमाली ,विरूप ,चंडेश्वर, शुभ !
*
श्लथ पड़ा चरण-तल अपस्मार निष्कल मृतवत् ,
दूजा पग कर उत्तिष्ठ , ऊर्ध्व- आरोहण  हित   ,
 अगणित आभा-मंडल बन-मिट ,पल परिवर्तित
 हो दिव्यरूप उज्ज्वल आनन्द-कला  में रत
*
नटराज ,ताल -लय-मुद्रा-मय जग जीवन-क्रम ,
परब्रह्म आदि तुम ,तुम अनादि हे विधेयात्म,
भोगी-योगी निर्ग्रंथ निरंजन ,चिदानन्द.
तुम शिव ,तुम भव , हे कालकंठ ,तुम वह्नि नयन !
*
नटराज ,अनवरत-नर्तन ,महा-सृष्टि का क्रम ,
हो महातांडव या कि लास्य-लय-मय जीवन .
तुम परम ज्योतिमय,शुभ्र ,निरंजन ,विगत-काम
धर अनघ,  निरामय चरण ,कोटिशः लो प्रणाम !
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7 टिप्‍पणियां:

  1. क्या कहूँ प्रतिभा जी रचना के लिए..और क्या कहूँ भगवान शिव के लिए?? दोनों पर ही कहने योग्य नहीं मैं।
    इतना कहूँगी कि अंतिम पंक्तियों तक आते आते आँखें भर आयीं...यूँ भी भगवान् शिव को बचपन से अपने बहुत समीप रखती आई हूँ मैं..उन पर लिखा सब सूर्य सा है मुझे...

    प्रणाम ही कर सकती हूँ केवल ...भगवान् शिवजी को...रचना को..आपकी लेखनी को..!!

    बड़े दिनों बाद कहीं पर सबसे पहले अपने विचार लिख रही हूँ...:):)

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  2. बहुत सुन्दर रचना और भावपूर्ण अभिव्यक्ति |
    कभी मेरे ब्लॉग पर भी आइये |
    आशा

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  3. शकुन्तला बहादुर25 जनवरी 2012 को 7:13 pm

    नटराज के सर्वांग रूप को प्रत्यक्ष करती ,भक्तिपूर्ण उद्गारों से ओतप्रोत
    ये अद्भुत् अभिव्यक्ति मन पर छा गई। सरस,कमनीय भाषा ने काव्य
    के सौंदर्य को द्विगुणित कर दिया है। अति सुन्दर !!
    आपके काव्य-कौशल को नमन!!!

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  4. आशा जी ,
    कई बार आपके पास जाना चाहा .पर यह सूचना अंकित दिखाई दी -

    आपके द्वारा अनुरोधित Blogger प्रोफ़ाइल प्रदर्शित नहीं हो सकता. अनेक Blogger उपयोगकर्ता अभी तक अपने प्रोफ़ाइल सार्वजनिक रूप से साझा करने के लिए चुने नहीं गए.
    पहुँचने का मार्ग बतायें .

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  5. अद्भुत, ऊँचे स्वर में बोल बोल कर पढ़ी यह, साहित्यिक आनन्द आ गया।

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  6. Oh my God! Ek baar break mein padhi...jaise man hee man zor zor se matrochaar karta hai koi vaise...fir fir padhungi tab aapko likhungi Pratibha ji. Abhi kotish naman lein apne liye aur natraaj ke liye!
    Sadar shar
    ...Bus ek aur baat...zara nazar utaar leejiye apni lekhni ki aaj!

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  7. अत्यंत सरस!
    मन दीप्त है, अतीव हर्षित।
    अहा! क्या काव्य, क्या भाषा, क्या शैली!
    नमन!

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