मंगलवार, 3 मार्च 2015

हारा नहीं है ..

*
रथ के टूटे पहिये से 
 कब तक लड़ोगे वसुषेण?
*
कवच-कुंडल हीन लड़ रहा है वह.
हार नहीं मानेगा ! 
मृत-पुत्र हित मातृत्व  जाग उठा कुन्ती का
विक्षत  देह गोद में भर ली .
जीवन भर  तरसा था  जिसके लिए मन, 
 बोधहीन तन को नहीं ग्रहण !
*
वह नहीं है अब !
होता तो कहता -
 नहीं चाहिये तुम्हारी  करुणा,
 व्यर्थ पड़ी रहेगी .
 लौटा ले जाओ ,
 बाँट देना उन सब को !
*
अब यहाँ  नहीं है ,
पर वह मरा नहीं है .
 ऐसे पुरुष कभी नहीं मरते !
वह हारा नहीं ,
अन्याय का मारा है -
थक कर रणभूमि में सो गया है!
*


18 टिप्‍पणियां:

  1. वाकई , यह हार नहीं है ।

    विचारोत्तेजक भाव

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  2. हारते तो वह हैं जिनका चरित्र दुर्बल हो ... मानस दुर्बल हो ...
    कर्ण जैसे शूरवीर को लक्ष्य ले कर लिखी बेजोड़ रचना ... ओजस्वी रचना ...

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  3. सच, वह हारा नहीं, बल्कि अन्याय का मारा है।
    ओजस्वी कविता।

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  4. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 5-3-2015 को चर्चा मंच पर हम कहाँ जा रहे हैं { चर्चा - 1908 } पर दिया जाएगा
    धन्यवाद

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  5. सुन्दर व सार्थक प्रस्तुति..
    होली की हार्दिक शुभकामनाएँ।

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  6. कर्ण की पीड़ा को शब्द देते कितने युग हो गये हैं..पर उसके साथ हुए अन्याय का प्रतिकार नहीं हो पाता...शायद यही उसके लिए सही था..

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  7. सुन्दर एवं मर्मस्पर्शी रचना.
    होली की हार्दिक शुभकामनायें.

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  8. वीर-शिरोमणि कर्ण के लिए ऐसी रचनाएँ कम ही देखने मिली हैं .सचमुच वह अन्याय के हाथों मारा गया .अन्याय चाहे कुंती द्वारा हुआ या भीष्म और कृष्ण के द्वारा ..या फिर स्वयं अपने ही द्वारा . होली का पर्व आपकी लेखनी में और मन में और भी गहरे रंग भरे .

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  9. बेहद उम्‍दा रचना। एक एक शब्‍द अपनी सार्थकता खुद बयां कर रहा है।

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  10. चरित्र की दृढ़ता कभी हारती नहीं

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  11. युद्ध क हारा नहीं, भाग्य का मारा ...

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  12. आयुर्वेदा, होम्योपैथी, प्राकृतिक चिकित्सा, योगा, लेडीज ब्यूटी तथा मानव शरीर
    http://www.jkhealthworld.com/hindi/
    आपकी रचना बहुत अच्छी है। Health World यहां पर स्वास्थ्य से संबंधित कई प्रकार की जानकारियां दी गई है। जिसमें आपको सभी प्रकार के पेड़-पौधों, जड़ी-बूटियों तथा वनस्पतियों आदि के बारे में विस्तृत जानकारी पढ़ने को मिलेगा। जनकल्याण की भावना से इसे Share करें या आप इसको अपने Blog or Website पर Link करें।

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    1. शकुन्तला बहादुर1 अप्रैल 2015 को 4:43 pm

      हरेकृष्ण जी , रोमन के कारण बिगड़े अपने प्राचीन ग्रंथों को यदि हम हिन्दी में भी वही रूप अपना लेंगे तो कालान्तर में वही अशुद्ध रूप रह जाएगा । सभी "वेद" को वेदा और आयुर्वेदा कहने लगेंगे । अत: हमें सावधान रहना होगा ।

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  13. शकुन्तला बहादुर1 अप्रैल 2015 को 4:32 pm

    अतीव मार्मिक किन्तु सशक्त अभिव्यक्ति , जिसमें कर्ण का स्वाभिमान और कुन्ती का पराजित मातृत्व ध्वनित हो रहा है । तेजस्वी और वर्चस्वी कर्ण के भाग्य ने उसका साथ नहीं दिया - यही विधि की विडम्बना है ।

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