बुधवार, 24 अक्तूबर 2012

कहाँ हो !


कहाँ हो ,घनश्याम मन मोहन कहाँ हो !
*
हो कहाँ विषण्ण मन के पार्थ-सारथि,
कर रही  विचलित विरत-पथ हो भ्रमित मति .
देह के दुख -व्याध ,अंतर की तपन के,
 शान्ति-चंदन,नंद के नंदन ,कहाँ हो !
कहाँ हो घनश्याम ,जीवन- धन कहाँ हो !
*
ले चलो उस लोक ,जाग्रत हो वृन्दावन ,
शाप-पाप धुलें जनम भर के  अपावन, 
वासनाएं घुल चलें जिस श्याम रँग में ,
हे परम विश्रान्तियों के क्षण कहां हो !
कहाँ हो घनश्याम !
*
अवधि बीतेगी तुम्हारा नाम लेते ,
रेत के मृगजलाशय में प्यास बोते ,
मोरपंखी घन-घटा शीतल सुरंजन,
विकल नयनों के अमल अंजन कहाँ हो ! 
*
कहाँ हो हे कृष्ण,प्राप्य परम कहाँ हो ! !
कहाँ हो घनश्याम !!!

22 टिप्‍पणियां:

  1. कहाँ गए घनश्याम ..??

    मंगल कामनाएं आपको !

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  2. हारे को हरिनाम, चलने की ख्वाहिश में भी हरिनाम

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  3. वाह....
    बहुत सुन्दर ...

    सादर
    अनु

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  4. अवधि बीतेगी तुम्हारा नाम लेते ,
    रेत के मृगजलाशय में प्यास बोते ,
    मोरपंखी घन-घटा शीतल सुरंजन,
    विकल नयनों के अमल अंजन कहाँ हो !

    माता जी प्रणाम . हरि को भजै सो हरि का होय .
    अद्भुत अनोखा भगवत प्रेम

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  5. कोई भी युग हो
    जहाँ भी अर्जुन है
    वही कृष्ण आज भी उपलब्ध है !

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  6. मनमोहक अभिव्यक्ति..... सुंदर शब्द संयोजन

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  7. दृग मेरे पथरा चले
    कदम भी लड़खड़ा रहे
    हौंसलो की सांस टूटी,
    अब तो आ जाओ
    कोई भी रूप भरकर सांवरे !

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  8. अवधि बीतेगी तुम्हारा नाम लेते ,
    रेत के मृगजलाशय में प्यास बोते ,
    मोरपंखी घन-घटा शीतल सुरंजन,
    विकल नयनों के अमल अंजन कहाँ हो !
    man se ki gayee pukaar

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  9. सादर अभिवादन!
    --
    बहुत अच्छी प्रस्तुति!
    इस प्रविष्टी की चर्चा कल शनिवार (27-10-2012) के चर्चा मंच पर भी होगी!
    सूचनार्थ!

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  10. शकुन्तला बहादुर26 अक्तूबर 2012 को 7:08 pm

    "ले चलो उस लोक----------हे परम विश्रान्तियों के क्षण कहाँ हो ! कहाँ हो घनश्याम !
    भक्ति में डूबी ये पुकार मन को भाव-विभोर कर देती है । सुन्दर भावांजलि के लिये साधुवाद !

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  11. बहुत मनोहर शीतल काव्य एक भाव रचता सा ..

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  12. हो कहाँ विषण्ण मन के पार्थ-सारथि,
    कर रही विचलित विरत-पथ हो भ्रमित मति .
    देह के दुख -व्याध ,अंतर की तपन के,

    लगता है कष्टों से व्याकुल जन मन की पुकार को आपने अपने शब्द दे दिए हैं । अच्छी रचना।

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  13. अवधि बीतेगी तुम्हारा नाम लेते ,
    रेत के मृगजलाशय में प्यास बोते ,
    मोरपंखी घन-घटा शीतल सुरंजन,
    विकल नयनों के अमल अंजन कहाँ हो


    कविता अच्छी लगी एवं अभिव्यक्ति का सलीका भी प्रभावित कर गया।। मेरे नए पोस्ट पर आपका इंतजार रहेगा। धन्यवाद।

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  14. आदरणीया प्रतिभा जी

    बहुत दिनों बाद पढ़ने का अवकाश मिल पाया है। आपके ब्लॉग से सुन्दर और कोई जगह नहीं है पढ़ने की। अभी देखा कितनी ही नई प्रेरणादायक कवितायें विद्यमान हैं। आज यहाँ से कुछ लेकर जाऊँगा।

    सादर
    प्रताप

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  15. अवधि बीतेगी तुम्हारा नाम लेते ,
    रेत के मृगजलाशय में प्यास बोते ,
    मोरपंखी घन-घटा शीतल सुरंजन,
    विकल नयनों के अमल अंजन कहाँ हो


    बेहद सुंदर मनभावन रचना । आर्त भाव छलक रहे हैं ।

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